नई क्राइम फिल्में आखिर पुरानी कहानियों में क्यों बन रही हैं?

सीसीटीवी कैमरा व डिजिटल फुटप्रिंट्स के इस दौर में बड़े पर्दे (पीन) पर परफेक्ट अपराध की रचना करना कठिन हो गया है। इसलिए फिल्मकारों ने इससे बचने का एक अच्छा तरीका यह निकाला है कि समय में पीछे चला जाये, जब जगह-जगह सीसीटीवी कैमरा नहीं लगे होते थे।
यही वजह है कि 2025 की हिट फिल्म सराय की कहानी को 2003 में सेट किया गया, जिसमें दर्शकों को 1997 की हत्या की कहानी सुनायी गई या 2023 की तमिल फिल्म पोर थोज्हिल में 2010 की सीरियल हत्याओं की गुत्थी को सुलझाया गया। आजकल जो क्राइम थ्रिलर बनायी जा रही हैं, उनमें एक खास पैटर्न को अपनाया जा रहा है।
अतीत में सेट कहानियाँ दर्शकों से भावनात्मक रूप से जोड़ती हैं
उनकी कहानियों को पूर्णत अतीत में सेट किया जा रहा है या हीरो उस अपराध की गुत्थी सुलझा रहा है जो दशकों पहले हुआ हो। कुछ भी वर्तमान से संबंधित नहीं है। यह समय में यात्रा करने का तरीका प्रभावी उपाय प्रतीत हो रहा है टेक्नोलॉजी आधारित कहानी सुनाने की एकरूपता को तोड़ने के लिए।

अतीत को लिंचपिन (धुरी की कील) के तौरपर प्रयोग किया जा रहा है जो दर्शकों को भावनात्मक रूप से कहानी से जोड़ता है। हम टॉम एंड जेरी से इसलिए नहीं जुड़ते हैं कि वह जाने-पहचाने से लगते हैं या उनकी हरकतें सरल हैं बल्कि इसलिए जुड़ते हैं, क्योंकि चूहे-बिल्ली का फॉर्मेट दर्शकों में गहरी छाप छोड़े हुए है। दरअसल, घंटों का सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद या मोबाइल फ़ोन के ज़रिये खलनायक को आसानी से ट्रैक करने पर न तो मुख्य किरदार हीरो-सा लगेगा और न ही फिल्म देखने में दर्शकों को मज़ा आयेगा।
अतीत की सेटिंग कहानी के कैनवास को विस्तृत कर देती है, विशेषकर इसलिए कि वह पुरानी यादों से भरी परिचितता के पर्दे में ढकी होती है। कहानी को अतीत में सेट करने से अपराध व किरदारों को नज़ाकत भी मिल जाती है। ऐसा पटकथा लेखक सब जॉन का कहना है, जिनके श्रेष्ठ कामों में शामिल हैं तमिल में गुना (1991) व मलयालम में चनकयान (1989)।
अतीत की घटनाएँ हीरो और खलनायक की कहानी को दिलचस्प बनाती हैं
सैंकड़ों लेखकों को रील संसार का मार्ग दिखाने वाले जॉन का कहना है, विषयात्मक नाटक का चलन आजकल बहुत कम हो गया है। आज अधिकतर अपराध ड्रग्स या एंग्जायटी की वजह से आरंभ होते हैं। इसलिए अतीत के आकर्षण की आवश्यकता होती है ताकि किरदारों की पहेली में नई परतें जोड़ी जा सकें, विशेषकर खलनायक में जो कहानी को गति प्रदान करता है। अपराध फिल्मों में खलनायक ही मुख्य किरदार होता है। हीरो तो बस उस प्लाट को जोड़ता है जोकि अपराधी का होता है।

पुलिसकर्मी से फिल्मकार बने शाही कबीर ने 2025 में क्राइम थ्रिलर रोंथ की पटकथा लिखी थी, जिसमें ऐसे दो पुलिस अधिकारियों की कहानी है, जिनके ज़िम्मे रात में गश्त लगाना है। कबीर कहते हैं, हीरो को स्थापित करने और दर्शक उससे हमदर्दी करें, इसमें समय लगता है। अंत में यह तो हो नहीं सकता कि विज्ञान व टेक्नोलॉजी केस को हल करें। पहेली को तो हीरो को ही हल करना पड़ेगा ताकि दर्शक संतुष्ट हो सकें।
राज्य की निगरानी में जो संसार है, उसे पर्दे पर दिखाने की सीमाएं हैं, जिससे बचने के लिए अतीत अवसर प्रदान करता है कहानी में अधिक घुमाव देने व उसे दिलचस्प बनाने के लिए। अगर प्लाट वर्तमान हाई-टेक में सेट किया जायेगा तो हीरो कृत्रिम लगेगा; क्योंकि उसे तो अपना केस सिफर से बनाना होता है। कबीर के अनुसार, दशकों पुराने केस को प्रस्तुत करने से, जब आज की तरह के डिजिटल टूल्स नहीं थे, दर्शकों में कहानी के प्रति दिलचस्पी कायम रहती है।
क्राइम थ्रिलर में अतीत और हाई-टेक दोनों ही कहानी को जोड़ते हैं
आज की स्थिति यह है कि निगरानी देशव्यापी हो गई है। या तो सीसीटीवी आपको देख रहा है या फ़ोन आपको सुन रहा है। जबकि थ्रिलर के लिए अपराध एकांत में किया गया होना चाहिए, जिसे आधुनिक टूल्स देख न रहे हों। इसे करने का एक तरीका यह है कि कहानी को अतीत में सेट किया जाये। दर्शक भी अपना दिमाग इस्तेमाल करें और पहेली को हल करने के लिए कहानी से जुड़ जायें। ऐसा निर्देशक मोहन राजा का कहना है।
लेकिन उनसे भिन्न मत भी हैं। मसलन, निर्देशक पीएस मिथरण का कहना है, जिस तरह जांच के तरीके अधिक विज्ञान आधारित होते जा रहे हैं, उसी तरह अपराधी भी एआई, फ़ोन मिररिंग और अन्य हाई-टेक तरीके अपना रहे हैं। यह अवसर है एक ऐसा काल्पनिक संसार बनाने का जिसके अपने नियम, इतिहास, भूगोल व संस्कृति हों ताकि वह विश्वसनीय लगे और दर्शक उसमें डूब जायें।
क्राइम फिक्शन लिखने के लिए बहुत होमवर्क करना पड़ता है और निरंतर खुद को अपडेट भी करना होता है ताकि दर्शकों को कुछ अलग व दिलचस्प दिया जा सके। क्राइम थ्रिलर लेखकों को पुलिस व फॉरेंसिक अधिकारियों से जानकारी हासिल करनी होती है ताकि जासूसी की नवीनतम तकनीक मालूम हो सकें।
डी.जे.नंदन
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