क्या लिएंडर पेस का भाजपा में आना ममता के लिए चुनौती बनेगा ?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बाहरी और भीतरी का पुराना खेल एक बार फिर शुरू हो गया है लेकिन इस बार दांव उल्टा पड़ता दिख रहा है। जैसे ही महान टेनिस खिलाड़ी और ओलंपिक मेडल विजेता लिएंडर पेस भाजपा में शामिल हुए, टीएमसी ने उन्हें बाहरी (बोहिरगातो) कहना शुरू कर दिया। 30 मार्च 2026 को दिल्ली में भाजपा का दामन थामने वाले पेस का टीएमसी ने सोशल मीडिया पर खूब मजाक उड़ाया।

जानकारों के अनुसार टीएमसी के इस हमले से उसकी खुद की दोहरी सोच की पोल खुल गई है। जिस पेस को आज टीएमसी बाहरी बता रही है, वे न केवल बंगाल की महान विरासत का हिस्सा हैं बल्कि कुछ समय पहले तक टीएमसी के खास अपने भी थे। जब तक वे टीएमसी में थे, तब तक बंगाली और अपने थे और अब भाजपा में जाते ही बाहरी और पराए हो गए।

लिएंडर पेस राजनीति में कोई नए खिलाड़ी नहीं हैं। साल 2021 में खुद ममता बनर्जी ने उन्हें बड़े सम्मान के साथ टीएमसी में शामिल किया था। उस वक्त टीएमसी के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से बड़े-बड़े ट्वीट करके उनका स्वागत किया गया और उन्हें बंगाल का गौरव बताया गया था। यहाँ तक कि गोवा के चुनावों में टीएमसी ने लिएंडर पेस को अपना सबसे बड़ा चेहरा बनाकर उनसे खूब प्रचार भी करवाया।

2021 में अपने, 2026 में ‘बाहरी’ कैसे बने पेस ?

लोग मजे लेते हुए पूछ रहे हैं कि क्या 2021 में लिएंडर पेस पक्के बंगाली थे और 2026 में भाजपा चुनते ही अचानक बाहरी हो गए? यह साफ दिखाता है कि टीएमसी इस वक्त कितनी घबराई हुई है और उनके पास पेस का कोई ठोस जवाब नहीं है। तभी तो ऐसी बहकी-बहकी बातें की जा रही है। जानकारों की मानें तो टीएमसी का बाहरी-बाहरी का राग तब पूरी तरह फेल हो जाता है, जब हम उनके अपने नेताओं की लिस्ट देखते हैं।

सोशल मीडिया पर लोग पुराने और नए ट्वीट्स शेयर करके टीएमसी से कड़े सवाल पूछ रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि जो पार्टी गुजरात के यूसुफ पठान, बिहार के शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आजाद और साकेत गोखले जैसे नेताओं को बाहर से लाकर बंगाल में चुनाव लड़ाती है, वो लिएंडर पेस को बाहरी कैसे बोल सकती है? यूसुफ पठान गुजरात के हैं और शत्रुघ्न सिन्हा बिहार के। उनका बंगाल के जन्म या संस्कृति से कोई पुराना रिश्ता तक नहीं है, फिर भी टीएमसी उन्हें अपना मानती है।

यह साफ तौर पर पार्टी का दोहरा चेहरा है। वोट के लिए बाहर के लोग भी अपने हो जाते हैं लेकिन बंगाल की मिट्टी के बेटे ने जैसे ही भाजपा चुनी, उसे पराया बना दिया गया। यह दोगलापन अब जनता को अच्छी तरह समझ आ गया है। लिएंडर पेस को बाहरी कहना असल में बंगाल की संस्कृति और इतिहास का अपमान है। पेस बंगाल के सबसे महान कवियों में से एक, माइकल मधुसूदन दत्त के परिवार से ताल्लुक रखते हैं।

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कोलकाता में जन्मे पेस ने बताई अपनी बंगाली पहचान

लिएंडर पेस की माँ खुद बंगाल की ही रहने वाली थीं और पेस का जन्म भी कोलकाता में ही हुआ था। अपनी जड़ों पर गर्व करते हुए पेस ने भाजपा मुख्यालय में साफ कहा, मैं एक शानदार बंगाली विरासत में पैदा हुआ हूँ। अब जिस इंसान की रगों में बंगाल के इतने बड़े साहित्यकार का खून दौड़ रहा हो, उसे टीएमसी के कुछ लोग बाहरी बता रहे हैं। यह दिखाता है कि टीएमसी के पास अब कोई ठोस मुद्दा नहीं बचा है और वे बस राजनीति के लिए किसी का भी अपमान कर रहे हैं।

-रामस्वरूप रावतसरे
रामस्वरूप रावतसरे

लिएंडर पेस ने स्पष्ट किया है कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खेलो इंडिया विजन और खेल शिक्षा के जरिए बंगाल के युवाओं को सशक्त बनाने आए हैं। जहाँ भाजपा पेस के जरिए बंगाल को मॉडर्न स्पोर्ट्स हब बनाने की बात कर रही है, वहीं टीएमसी अभी भी बाहरी-भीतरी के पुराने और खोखले मुद्दे में फँसी हुई है। 2026 के चुनाव से पहले पेस का भाजपा में आना एक बड़ा संदेश है कि अब बंगाल का युवा पहचान की संकुचित राजनीति के बजाय विकास और राष्ट्रीय गौरव को चुन रहा है। टीएमसी का यह दोहरा चेहरा अब उनके लिए ही गले की हड्डी बन गया है। लिएंडर पेस का भाजपा में आना टीएमसी के लिए बहुत बड़ी क्षति बताया जा रहा है। लेकिन पेस बंगाल में भाजपा के लिए कितने सही साबित होंगे, यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

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