भगवान के वराह रूप की करें पूजा

तिथि मुहूर्त

विक्रम पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि 13 अप्रैल, सोमवार की रात 1 बजकर 17 मिनट पर शुरु हो रही है, जो 14 अप्रैल, मंगलवार की रात 1 बजकर 8 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर एकादशी का व्रत 13 अप्रैल, सोमवार को रखा जाएगा।

पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरुथिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक दृष्टि से इस एकादशी का महत्व अन्य एकादशियों से कहीं अधिक माना गया है। यह न केवल पापों का नाश करती है, बल्कि मनुष्य को सौभाग्य का कवच भी प्रदान करती है।

इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके व्रत का संकल्प लें। सुबह का समय भगवान विष्णु की पूजा के लिए सबसे उत्तम माना गया है। इस दौरान भक्त पूरे श्रद्धा भाव से पूजा-अर्चना करते हैं, जिससे उन्हें विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

पूजा विधि

वरुथिनी एकादशी की सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। स्वच्छ पीले रंग के परिधान धारण करें। एक चौकी पर भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें। भगवान को अक्षत, फल, पीले फूल और चंदन आदि अर्पित करें। धूप और दीप से भगवान की आरती करें।एकादशी की पूजा में सबसे महत्वपूर्ण तुलसी दल माना जाता है।

विष्णु पुराण के अनुसार, श्रीहरि की पूजा तब तक पूरी नहीं होती जब तक उन्हें तुलसी अर्पित न की जाए। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का लगातार जाप करने से मानसिक एकाग्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है। शाम के समय भगवान के सामने घी का दीपक जलाकर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना लाभकारी सिद्ध होता है।

व्रत नियम

एकादशी व्रतधारी को चावल, छोले, काले चने, दाल, सुपारी, शहद और मांसाहारी भोजन का सेवन करना निषेध माना गया है। अपने विचारों को शुद्ध रखना चाहिए। क्रोध, झूठ और नकारात्मक सोच से बचना चाहिए। दान-पुण्य करना चाहिए।

धार्मिक महत्व

वरुथिनी एकादशी को बहुत ही पुण्यदायी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग मिलता है। यह व्रत जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाने वाला माना गया है। कहा जाता है कि इस एकादशी का फल हजारों वर्षों की तपस्या के बराबर होता है।

व्रत कथा

प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर राजा मांधाता का शासन था। वह अत्यंत दानशील तथा तपस्वी थे। एक बार वह जंगल में तपस्या कर रहे थे। एक जंगली भालू आकर राजा का पैर चबाने लगा, लेकिन राजा अपनी तपस्या में लीन रहे। कुछ देर बाद वह भालू राजा को घसीटकर जंगल के भीतर ले गया। राजा बहुत घबराया, मगर उसने भालू पर क्रोध या हिंसा न करके भगवान विष्णु से प्रार्थना की।

उसकी पुकार सुनकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और अपने चक्र से भालू का वध कर डाला। वह भालू राजा का पैर खा चुका था। इससे राजा बहुत शोकाकुल हुए। दुःखी राजा से भगवान विष्णु बोले, ‘हे वत्स ! शोक मत करो। तुम मथुरा जाओ और वरुथिनी एकादशी का व्रत रखकर मेरे वराह रूप की पूजा करो।

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उसके प्रभाव से तुम पुनः सुदृढ़ अंगों वाले हो जाओगे। पूर्व जन्म के अपराध के कारण भालू ने तुम्हें काटा है।’ भगवान की आज्ञा मानकर राजा मांधाता मथुरा गए। वहाँ श्रद्धापूर्वक वरुथिनी एकादशी का व्रत किया, जिसके प्रभाव से शीघ्र ही सुंदर और संपूर्ण अंगों वाला हो गया। इसी एकादशी व्रत के प्रभाव से राजा मांधाता स्वर्ग के अधिकारी बन गए थे।

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