ग़र आज मंटो होते…!

(शख्सियत)

ग़र मंटो होते तो…! निहायत ही अजीब-सी बात। फ़र्ज़ कीजिये कि आज मंटो होते तो…? मंटो होते तो क्या होता?
वे क्या करते? ज़माना उनके साथ कैसा सलूक करता? क्या उन्हें वैसे ही अदालतों के चक्कर लगाने होते, जैसे उन्होंने लाहौर में लगाये थे? या फिर उन्हें बेहतर ज़िंदगी नसीब होती? हुकूमत उन पर कोड़े बरसाती या तवज्जो देती? मंटो होते तो क्या उन्होंने उन्हें बख़्शा होता, जिनके चेहरे मुखौटों के पीछे छिपे होते हैं और जो अपनी उंगलियों को इस मकसद से जेबों में डाल लेते हैं कि उन पर लगे खून के धब्बे लोगों को नज़र न आयें…।

मंटो ज़्यादा दिन न जिये। कुल जमा 42 साल, आठ महीने और सात दिन। सआदत हसन मंटो नामक शख़्स 11 मई, सन् 1912 से 18 जनवरी, सन् 1955 के दरम्यान हमारे बीच रहा। इस दरम्यान उसने कई शहरों की खाक छानी। अ़फसाने लिखे। गिरफ़्तार हुआ। पागलखाने में रहा। उम्र का घोड़ा बेतहाशा दौड़ता रहा। बगटुट। लगातार। उसे घुटने टेकना गवारा न था। साल के शुरुआती महीने की एक सर्द सुबह उसने डबल पेग मांगा, जुम्बिश ली और उस घने कोहरे में लुप्त हो गया, जहां से वापसी कभी मुमकिन नहीं होती।

आज का वक़्त कठिन और मुश्किल है, लेकिन वह वक़्त भी आसां न था, जब मंटो इस दारे-फ़ानी में थे। वह विदेशी हुकूमत का ख़ौफनाक दौर था और वे सारी दुश्वारियां थीं, जो आज भी हैं। मंटो आज होता तो कुछ ज़्यादा ही फामंद, परेशान और मुसीबतज़दा होता। वज़ह यह कि मंटो कश्मीरी भी था और पंजाबी भी। वह कश्मीरी-पंजाबी था। पैदाइश पंजाब की और जड़ें कश्मीर में। उसके पुरखे कश्मीरी थे; कश्मीरी पंडित।

जिन किस्तबाशी पंडितों ने इस्लाम कुबूल किया, वे मंटो कहलाये। मंटो शब्द भी कश्मीरी ज़ुबान का है। मंटो यानी मंट यानी डेढ़ सेर का बट्टा। मंटो को बार-बार लगता था कि वह एक हातू है, काशूर (कश्मीरी) है। उसे ताज्जुब होता कि उसके पुरखों ने घाटी छोड़कर क्यों पंजाब की ओर रुख किया था?

मंटो के मिजाज़ को देखें और अंदाजा लगाएं कि मंटो आज किस हालत में होते और क्या करते? लिखना मंटो का शगल न था। वह उनकी बेचैनी थी। जीने की शर्त थी। ज़रूरत थी। लिहाज़ा ज़ाहिर है कि वे लिखते और खूब लिखते। लिखे बिना वे रह नहीं सकते थे, फलत: जम्मू-कश्मीर उनका कथानक होता। उन्होंने कश्मीरी पंडितों की त्रासदी पर भी लिखा होता और कश्मीरी युवकों के गुमराह होने और वहां की दहशतगर्दी पर भी।

वे चिनार के दरख़्तों के साथ-साथ कश्मीरियों के जज़्बात की भी बात करते और उन्हें लानतें भेजते, जो ज़मीं पर मौजूद इस जन्नत की बर्बादी और वहां के कोहराम के लिए ज़िम्मेदार हैं। इस कत्लोगारत के अभ्यस्त वहशी लोगों के साथ उनकी कलम वही सलूक करती, जो गुनहगारों के साथ किया जाता है। उनकी नज़रों में दंगा-फ़साद करने वाले हिन्दू या मुसलमान न होकर दंगाई व फसादी थे, जिनका इंसानियत से कोई वास्ता न था। देश के आज़ाद होने पर उन्होंने लिखा था: हिन्दुस्तान आज़ाद हो गया था।

पाकिस्तान अस्तित्व में आते ही आज़ाद हो गया था। इंसान राज्यों का गुलाम था: हठधर्मी का गुलाम। मज़हबी जुनून का गुलाम। पशुता और बर्बरता का गुलाम। मंटो को हैरत होती थी कि यह कैसी आज़ादी है, जो त़कसीम के साथ आयी है। जिन्ना ने त़कसीम की बात की। पाकिस्तान बना। वहां आज कौन खुश है? न बलूची और न ही मुहाज़िर। पाकिस्तान अपने बोये की फसल काट रहा है। मंटो भी पाकिस्तान चले गये थे।

पाकिस्तान में भी सबसे रौनकदार, खूबसूरत और अदब के मरकज़ लाहौर, मगर वहां उन्हें न खुशी मिली और न सुकूं। वे हिन्दुस्तान लौटने के लिए तरसने लगे। पाकिस्तान का माहौल उन्हें रास नहीं आया। उन्होंने गर्दिश और पीड़ा के उन दिनों में इस्मत चुगतई को ख़त लिखा था कि वे उनके बम्बई लौटने का कोई रास्ता निकालें। काश, यह मुमकिन होता तो शायद मंटो कुछ बरस और जीते और हमें उनकी कलम से कुछ और नायाब कहानियां नसीब होतीं।

स्याह हकीकत को बयां करती कहानियां

ग़ौर करें कि मंटो ने वहां ‘खोल दो’, ‘ठंडा गोश्त’ और ‘टोबा टेकसिंह’ जैसी कहानियां लिखीं, जिन्हें उनके जीवनीकार नरेन्द्र मोहन ‘पागल बना देने वाले माहौल में अकेला पड़ते जाने की कहानियां’ करार देते हैं। मंटो टोबा को क्रूर सत्ता के बरक्स खड़ा करते हैं। ‘नो मैन्स लैंड’ में उसका पछाड़ खाकर गिरना मज़हबी ज़ुनूं से उपजे दो राष्ट्रों के बेमतलब और फ़ितरती सिद्धांत के सामने प्रश्नचिह्न लगाता है। बंटवारे और कश्मीर से जुड़े पहलुओं के लिहाज़ से ‘आखिरी सैल्यूट’ और ‘टिटवाल का कुत्ता’ भी गौरतलब हैं। इनमें मंटो का नज़रिया भी देखा जा सकता है। जम्हूरियत, कश्मीरियत और इंसानियत के आज के ज़ुमले और तकाजे के लिहाज़ से यह देखना सचमुच दिलचस्प होता कि मंटो आज क्या लिखते? यह इसलिए भी कि स्याह हकीकत को बयां करती उनकी कहानियों का ‘मैसेज’ नेक ख्यालों से रौशन हुआ करता था।

इसमें दो राय नहीं कि मंटो का मज़हब इंसानियत था। वही उनका दीनो-ईमान था। हर तरह की त़कसीम के खिल़ाफ खड़े मंटो निश्चित ही अलगाववादियों को पसंद नहीं आते। यही वह मोड़ है, जहां मंटो और भी ज़्यादा प्रासंगिक हो जाते और लोग उनके लिखे और कहे का बेसब्री से इंतज़ार करते। ताज्जुब नहीं ग़र मंटो इस मुसलसल जंग में जलावतन कश्मीरी पंडितों के साथ खड़े नज़र आते और अपनी कलम को दहशतगर्द अलगाववादियों की बंदूकों के खिल़ाफ हथियार की मानिंद इस्तेमाल करते।

मंटो को सवालात नेजे की तरह चुभते थे। उसका किनारा करने या कन्नी काटने में यकीन न था। वे नंगी सच्चाइयों की चट्टानों और दीवारों से, इस बात की िफा किये बिना सीधे टकराते थे कि उनके माथे पर गुम्मड़ निकल आयेगा या ज़िस्म लहूलुहान हो जायेगा। हिन्दुस्तान में दंगों की दहशत से घबरा कर वे बड़ी उलझन में हिन्दुस्तान से पाकिस्तान पहुंचे थे।

आज दोनों मुल्कों के हालात क्या हैं? पाकिस्तान अभी भी गये-गुज़रे ज़माने -मध्ययुगीन मानसिकता में जी रहा है। वह अल्लाह, अमेरिका और आर्मी के रहमोकरम पर है। वह अपने ही अंतर्विरोधों से घिर चुका है। वह पाव्यूह के ऐसे भीतरी पा में पहुंच गया है, जहां उसके लिए बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा है। और हिन्दुस्तान? यहां भी अजीब मंज़र है।

प्रश्नों के उत्तर भविष्य के बजाय अतीत में तलाशे जा रहे हैं। संकीर्ण, प्रतिगामी और पुनरुत्थानवादी ताकतें सिर उठा रही हैं। वक्त ऐसा है कि कथानकों और किरदारों की कमी नहीं है। पहले से अधिक कथानक और पहले से अधिक किरदार। चंट, चालाक और हिंस्र। पहले से अधिक आडम्बर। पहले से अधिक शो और शोशेबाजी। मुखौटे ऐसे कि असली चेहरे से लगें। तीर चलें, मगर तरकश न दिखे और तीर भी सादे नहीं, ज़हरबुझे।

बिला शक कह सकते हैं कि मंटो होते तो बेतरह लिखते। वे दिलचस्प किरदारों के जरिये हमारे वक्त को अपनी कहानियों में निर्भीकतापूर्वक दर्ज़ करते। वे अपने लहू में कलम डुबोकर लिखने से बाज़ न आते…
सवाल उठता है कि ऐसा करते हुए क्या वे इसका खामियाजा भुगतने से बच सकते थे? सीधे प्रश्न का सीधा उत्तर है – नहीं, कतई नहीं। भुगतने से वे तब भी कहां बचे थे? मंटो ने ऑल इंडिया रेडियो के लिए मज़ाकिया ड्रामे लिखे, लेकिन ये नाटक उसके अपने होठों पर पतली-सी मुस्कुराहट भी पैदा न कर सके।

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अबू सईद कुरैशी के मुताबिक अगर पुलिस ने अमृतसर में धरपकड़ की होती तो मंटो में भगत सिंह बनने की पूरी क्षमता थी। वह गली-कूचों में आततायी और ज़ालिम हुक्मूरानों का दर्दनाक अंजाम देखने का ख्वाहिशमंद था। उसने अमृतसर को ही मास्को तसव्वुर कर लिया था। विक्टर ह्यूगो, गोर्की, चेखव, पूश्किन, गोगोल, दोस्तोएव्सकी, बालजाक, आंद्रे ज़ीद और मोपासां जैसों ने उसके ख्यालात को रौशनी दी थी और कलम को चमक और धार। वह ज़ालिम ज़माने और हाकिमों को भला कैसे रास आता!

आज भी उसकी कलम उसकी मुसीबत की जड़ होती। उसका ज़ेरे-बहस होना तय था। स़िर्फ ज़ेरे-बहस ही नहीं, और भी बहुत कुछ ऐसा हो सकता था, जिसका फ़कत अंदाजा लगाया जा सकता है। वह पानसरे और कलबुर्गी से बड़ा लेखक और मुंहफट इंसान था। वह मानता था कि साहित्य का कोई भूगोल नहीं है। इसे नक्शों और खाकों की कैद से जहां तक सम्भव हो बचना चाहिए। मंटो को भला यह कैसे गवारा होता कि कोई उसे सामने या पर्दे के पीछे से अथवा ख़ौफ के जरिये चीज़ें डिक्टेट करे।

ग़ौर करें कि मंटो ने अपने दोस्त गार्गी से कहा था – ‘गार्गी, मैं पाकिस्तान इसलिए जा रहा हूं कि वहां की सियासी हरामजदगियों का पर्दाफाश कर सकूं’। उसकी कहानियों को ऐसे में अगर राजनीतिक पाठ के बरक्स मानवीय पाठ माना जाता है, तो इसमें ग़लत क्या? मंटो की तीन कहानियों – ‘काली सलवार’, ‘धुआं’ और ‘बू’ पर बंटवारे से पहले मुकदमे दायर हुए और बाद में पाकिस्तान में ठंडा गोश्त और ‘ऊपर, नीचे और दरम्यान पर’। उसकी ‘खोल दो’ कहानी की वज़ह से ‘नुकूश’ रिसाले पर छह महीने पाबंदी लगी।

उस पर अश्लीलता के आरोप लगे। तोहमत लगाने वालों में मज़हबी कट्टरपंथी और पाकपरस्त इस्लामी पैरोकार शामिल थे। फहाशी के इल्ज़ाम के चलते उसे बम्बई से लाहौर के फेरे लगाने पड़े। वह बरी हुआ, लेकिन उसने उसकी कीमत चुकायी। उसकी दिक्कत यह थी कि फ्रॉड उसे पसंद न था। वह न तो चीज़ों और चेहरों पर मुलम्मा चढ़ाने में य़कीन रखता था और न ही चरित्रों को लांड्री में भेजने या उन पर कल़फ चढ़ाने अथवा इस्तरी करने में। अब आप अंदाजा लगा लें कि ग़र मंटो होता तो क्या होता? उसकी रूह तब भी बेचैन रहती थी।

वह शुचितावादियों की नज़र में फहशनिगार था। हुकूमत की नज़र में कम्युनिस्ट। कभी वह अदालत के कठघरे में था तो कभी अस्पताल में और कभी पागलखाने में। ज़माने से उसकी ख़फगी हमेशा बनी रही। कहना सही है कि मंटो आज भी ज़िन्दा है। मंटो मरा नहीं करते। कोई कितनी भी ऩफरत क्यों न करे, मंटो से प्यार करनेवाले भी कम नहीं हैं। मंटो में वह कशिश है कि उससे मोहब्बत की जाये। वक्तत ऐसा है कि हमें मंटो चाहिए। वही मंटो। वैसा ही मंटो… मंटो हमारे वक्त की ज़रूरत है, दोस्तों!

डॉ. सुधीर सक्सेना
डॉ. सुधीर सक्सेना

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