!! प्रेम न हाट बिकाय !!
चौदह फरवरी – वैलेंटाइन डे! लेकिन ये कोई नई फालतू की होली नहीं, बल्कि एक पुरानी रोमन पार्टी का रीमेक है। सुनो, तीसरी शताब्दी में रोम में एक साहसी पादरी थे, सेंट वैलेंटाइन। सम्राट क्लॉडियस द्वितीय ने कहा, शादी बंद! अविवाहित सैनिक ही असली शेर होते हैं, शादीशुदा तो घर की चिंता में लाइन कूद जाते हैं! लेकिन वैलेंटाइन महोदय ने सोचा, अरे, प्यार पर बैन? मैं तो गुपचुप शादियाँ करवाऊँगा! रात के अँधेरे में सैनिकों का विवाह करवाते रहे। लेकिन पकड़े गए। जेल में डाल दिए गए।
जेलर की बेटी से इश्क हो गया, तो आखिरी चिट्ठी लिखी -फ्रॉम योर वैलेंटाइन! और बस, 14 फरवरी को सिर कलम! फिर भी कुछ सयाने इसे ल्यूपरकेलिया पर्व का चुराया संस्करण मानते हैं। फरवरी में बकरे-कुत्ते की बलि! नंगे होकर महिलाओं को चाबुक मारना – ताकि फर्टिलिटी बढ़े! पोप गेलासियस ने इसे बर्बर से क्रिश्चियन बना दिया – एक दिन प्यार के नाम! मध्य युग में चॉसर को ख़याल आया कि फरवरी में पक्षी जोड़ी बनाते हैं, तो इंसान क्यों पीछे रहें? बस, 18वीं सदी में इंग्लैंड ने कार्ड्स-चॉकलेट का बिजनेस चला दिया। वही अब सप्ताह भर का वैश्विक प्रेम व्यापार अनुष्ठान बन गया है। हम भारतीय भी पीछे नहीं। न प्यार के इजहार में, न प्रेमी युगलों पर लाठियाँ भाँजने में!
वेदों से आधुनिक दौर तक प्रेम की बदलती परंपरा
अभी एक बाबाजी बने प्रोफेसर बता रहे थे, हमारी प्रेम-परंपरा तो वेदों से चली आ रही है। उर्वशी तो स्वर्ग से धरती पर आ गई थी और अपने राधा-कृष्ण तो परम प्रेममय हैं ही! लेकिन आज की दुनिया में प्रेम कतई निरापद नहीं रह गया है। पर किशोरावस्था को इसकी परवाह कब रही है। सोशल मीडिया पर परिचय हुआ कि वैलेंटाइन वीक आ गया। लिव-इन चालू। अहं टकरा गए, तो ब्रेक-अप। थोड़ी देर हुई तो फ्रिज में 35 टुकड़े जमे मिलेंगे।
और थोड़ी देर हो गई तो नीले ड्रम में सद्गति! बड़ा भयावह हो गया है न प्रेम मेरे भारत में आज? बाबाजी बता रहे हैं कि सब ग्रहों की माया है। वैलेंटाइन तय करने से पहले कुंडली ज़रूर मिलवा लेना। यों इस अनुष्ठान की शुरुआत अब जन्मपत्री डे से करनी पड़ेगी। नहीं जी, इतने से काम नहीं चलेगा। यह 21वीं सदी का भारत है। धर्म, भाषा, जाति, प्रांत, पार्टी और भी न जाने किस-किससे अनापत्ति प्रमाणपत्र लाने होंगे। वरना अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित मोरल पुलिस वाले खुदाई फौजदार पार्कों से लेकर होटलों तक सूँघते फिर रहे हैं – सूँ साँ प्रेम गंध! क्योंकि उन्हें किसी ने कह दिया है कि प्रेम से संस्कृति को खतरा है। भला वे संस्कृति को प्रदूषित होते कैसे देख सकते हैं!
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प्रेम बनाम परंपरा: टकराव की बढ़ती खाई
पर, न तो प्रेम करने वाले बाज़ आते हैं और न ये परंपरा के स्वयंभू संरक्षक देवदूत। लड़का रिंग देता है। लड़की चमकती है। देवदूत देख लेते हैं। एफआईआर हो जाती है – अनैतिक आचरण, संस्कृति पर आघात! परंपरा-भंजन की प्रेरणा देने वाले तमाम मूर्त-अमूर्त उत्प्रेरकों पर हमला। फिल्में पीढ़ियों को बरबाद कर रही हैं! सोशल मीडिया सारे फसाद की जड़ है! आदि-इत्यादि। वैसे सच्ची बात बताएँ तो हम परम पाखंडी हैं।
एक ओर प्रेम एव परो धर्म: का उद्घोष करते हैं और दूसरी ओर प्रेम को अनैतिक घोषित करते भी हमारी आत्मा नहीं सिहरती! कथनी में लोकतंत्र की जय, करनी में लोकतंत्र का क्षय! बातें मुक्ति की, आचरण तानाशाहों सा! प्रेम और स्वतंत्रता के लिए जैसे कहीं जगह ही नहीं बची है। बचे भी तो कैसे, व्यक्ति और समाज के सभी स्तरों पर हम अहं से पीड़ित मनोरोगी जो बन गए हैं। प्रेम की दिव्यता को खोकर अहं के कीचड़ में धँस गए हैं। आज फिर किसी कबीर की ज़रूरत है जो सिखा सके कि प्रेम को बस एक बलिदान चाहिए – अहम का बलिदान! कबीर तो प्रेम करने वाले और प्रेम के दुश्मन दोनों के लिए कह गए हैं न कि-
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रुचै, सीस देइ ले जाय।।
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