एआई कानूनी पेशे के मूल कार्यों की जगह नहीं ले सकती : न्यायमूर्ति विश्वनाथन

नागपुर, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन ने शनिवार को कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) कानूनी पेशे के मूल कार्यों की जगह नहीं ले सकती और एक प्रशिक्षित कानूनी दिमाग हमेशा उस बढ़त को बनाए रखेगा, जिसे किसी भी एल्गोरिदम द्वारा दोहराया नहीं जा सकता।

विश्वनाथन ने नागपुर में महाराष्ट्र राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के चौथे दीक्षांत समारोह में एक सभा को संबोधित किया, जहाँ भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश भूषण गवई विशिष्ट अतिथि थे। प्रौद्योगिकी का जिक्र करते हुए न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने कहा कि 21वीं सदी में वकीलों से प्रौद्योगिकी में नए कौशल विकसित करने की अपेक्षा की जाती है। उन्होंने कहा कि समय बचाने वाली हर जिम्मेदारी को मापना और उसमें महारत हासिल करना जरूरी है, जिससे एक स्वाभाविक सवाल उता है: कानूनी पेशे में एआई की क्या भूमिका है?

न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने कहा कि आप एआई के साथ साझेदारी कर सकते हैं, लेकिन आप एआई को उन मूल कार्यों को बदलने नहीं दे सकते जो आपको करने चाहिए। उन्होंने कहा कि आपको कम से कम बुनियादी तौर पर यह समझना होगा कि ये उपकरण कैसे काम करते हैं। आपको पता होना चाहिए कि त्वरित इंजीनियरिंग क्या है, इसके परिणाम की परख कैसे की जाती है, और यह कब भ्रामक हो रही है, इसका पता कैसे लगाया जाए।

न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने इस बात पर जोर दिया कि एआई मानव कार्यों की जगह नहीं ले सकता और न ही कभी ऐसा कर पाएगा। उन्होंने कहा कि आपको इसकी सीमाओं को भी जानना चाहिए, उदाहरण के लिए, यह जानकारी प्राप्त कर सकता है, लेकिन निर्णय नहीं कर सकता, यह मसौदा तैयार कर सकता है, लेकिन परामर्श नहीं दे सकता। न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने कहा कि अदालत में ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जब वकीलों ने एआई द्वारा उत्पन्न उद्धरणों पर भरोसा किया है जो बाद में काल्पनिक साबित हुए हैं।

एआई के उपयोग में जिम्मेदारी और पेशेवर दक्षता पर जोर

विश्वनाथन ने कहा कि पेशेवर को हुई शर्मिंदगी एक अलग मुद्दा है, लेकिन नुकसान मुवक्किल को हुआ है। न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने आगे कहा कि एक प्रशिक्षित कानूनी दिमाग के पास हमेशा एक ऐसी बढ़त होती है, जिसे कोई एल्गोरिदम दोहरा नहीं सकता। इसी तरह की चिंताओं को दोहराते हुए, उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति ए.एस. चंदूरकर ने भी अपने भाषण के दौरान एआई की भूमिका पर चर्चा की। न्यायमूर्ति चंदूरकर ने टिप्पणी की कि प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब कानूनी पेशे सहित जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित कर रही हैं, और इन्होंने उल्लेखनीय दक्षता और नवाचार का परिचय दिया है।

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न्यायमूर्ति चंदूरकर ने कहा कि हालाँकि, इनसे नई और जटिल चुनौतियाँ भी पेश होती हैं। न्यायमूर्ति चंदूरकर ने कहा कि वर्तमान पीढ़ी प्रौद्योगिकी का बुद्धिमानी और जिम्मेदारी से उपयोग करने के लिए अच्छी स्थिति में है। उन्होंने विधि स्नातकों से आग्रह किया कि वे प्रौद्योगिकी को मूलभूत व्यावसायिक कौशल के विकास का स्थान लेने की अनुमति न दें, जिसमें पढ़ना, तर्क करना, मसौदा तैयार करना और मानवीय सहभागिता की आवश्यकता वाली गतिविधियाँ शामिल होंगी। (भाषा)

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