हर किसी को चाहिए एक सच्चा दोस्त
जिन्हें सभी ‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव …’ कहकर याद करते हैं और जो याद करने पर उसी घड़ी हमारी सेवा में हाज़िर हो जाते हैं। ऐसे मीठे-प्यारे परमपिता, जिन्हें दुःख के समय हम सभी पुकारते हैं, उनके सिवाय इस संसार में अन्य कोई भी वस्तु, वैभव किसी को अंत तक सहारा देने में असमर्थ है तो चलिए फिर, हम सभी अल्पकाल के अनेक मित्रों के बजाय ‘एक परम सहारे परमात्मा’ को अपना ‘परम मित्र’ बनाएं और सदा काल का सुरक्षित सहारा प्राप्त करें।
टूनिया में ऐसा कोई नहीं होगा, जिसके जीवन में मित्र ना उहो। मनुष्य हो या प्राणी सभी के जीवन में निस्संदेह एक ऐसा मित्र जरूर होता है, जो पग पग-पर उसका साथ देता है, भलाई का मार्ग प्रशस्त करता है। इसलिए तो कहते हैं-जिसके जीवन में मित्र ना हो, उसका जीवन अधूरा है। मित्र जीवन के सब रोगों की औषधि होते हैं। जीवन में मित्रता का बहुत महत्व होता है। एक सच्चे मित्र की प्राप्ति ईश्वर का वरदान-सा होती है।
सच्ची दोस्ती की पहचान: निःस्वार्थ प्रेम और विश्वास
संसार में मित्रता निभाने वाले एवं सुख में साथ देने वाले तो बहुत मिल जाते हैं, किन्तु सच्चे मित्र वही होते हैं, जो जीवन की हर परिस्थिति में हमारा साथ निभाते हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हममें से अधिकांश लोगों को मित्र अवश्य मिलते हैं, किन्तु एक अंतरंग और स्थायी मैत्री-संबंध के लिए दोनों दोस्तों में कुछ विशेष गुणों का होना आवश्यक होता है अन्यथा वह मैत्री संबंध अकाल ही समाप्त हो जाता है। क्या हैं वह विशेष गुण, जिनके आधार पर हम अपने जीवन में एक स्थायी मैत्री संबंध का आनंद ले सकते हैं?
धर्म शास्त्रों में सच्चे मित्र की परिभाषा जिन विशेष गुणों के आधार पर की हुई हैं, उनमें सबसे महत्वपूर्ण है- निःस्वार्थ प्रेम। यही सच्चे मित्र का सबसे अहम गुण है और इसके बिना मित्रता संभव ही नहीं है। अतः यह जानना अति आवश्यक है कि जहाँ कुछ लेने की मंशा हो, वहां मित्रता हो ही नहीं सकती, क्योंकि सच्ची मित्रता में मात्र देने का जज्बा ही प्रधान होता है। इसलिए स्वार्थी व्यक्ति कभी भी किसी का सच्चा मित्र बन ही नहीं सकता।
कहते हैं कि एक अच्छी और लंबी एवं स्थायी दोस्ती के लिए विश्वसनीयता और वफ़ादारी अनिवार्य है। एक सच्चा दोस्त वही होता है, जो अपने बोल, व्यवहार और विचारों में प्रामाणिक अर्थात भरोसेमंद हो। व्यावहारिक रूप से कहा जाए, तो उसकी कथनी और करनी में समानता हो। इसलिए वे लोग जो पीठ पीछे हो रही अपने दोस्तों की आलोचना के विरोध में डटकर खड़े नहीं होते या आसानी से अपने दोस्त के खिलाफ फैलाई गई अफवाह और गपशप में कभी किसी के अच्छे मित्र विश्वास करते हैं, ऐसे लोग कभी किसी के अच्छे मित्र बन नहीं पाते हैं।
जब दुनिया साथ छोड़े, परमात्मा सदा संग होते हैं
देखा जाए तो उपरोक्त सभी शर्तों को पूरा करना एक सामान्य इंसान के लिए असंभव है, क्योंकि मनुष्य रूप में पंचतत्वों के अधीन शरीर द्वारा अपना जीवन जीने वाले हम सभी की अपनी सीमाएं होती हैं जिसे लांघकर ऊपर उठना इतना आसान नहीं है। ऐसी परिस्थिति में विवेक यह कहता है कि हमें किसी ऐसी शख्सियत से मित्रता करनी चाहिए, जो सीमारहित हो और जो बंधन मुक्त होकर हमारा सच्चा मित्र बनने की सभी शर्तों को आराम से पूरा कर सके।
ऐसा परम मित्र तो केवल एक सर्वशक्तिमान परमात्मा ही हो सकता है, जो सभी आत्माओं का अविनाशी साथी हैं, जो कभी कैसी भी परिस्थिति में हमारा हाथ व साथ नहीं छोड़ता है, जिन्हें सभी ‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव …’ कहकर याद करते हैं और जो याद करने पर उसी घड़ी हमारी सेवा में हाज़िर हो जाते हैं।

ऐसे मीठे-प्यारे परमपिता, जिन्हें दुःख के समय हम सभी पुकारते हैं, उनके सिवाय इस संसार में अन्य कोई भी वस्तु, वैभव किसी को अंत तक सहारा देने में असमर्थ है तो चलिए फिर, हम सभी अल्पकाल के अनेक मित्रों के बजाय ‘एक परम सहारे परमात्मा’ को अपना ‘परम मित्र’ बनाएं और सदा काल का सुरक्षित सहारा प्राप्त करें।
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