वैश्विक राजनीति की शतरंज और भारत की विदेश नीति

भारत-अमेरिका संबंध न तो पूरी तरह आदर्श मित्रता का उदाहरण हैं और न ही पूरी तरह निर्भरता का। यह संबंध परस्पर हितों, रणनीतिक जरूरतों और वैश्विक परिस्थितियों के आधार पर विकसित हो रहे हैं। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह इस साझेदारी से अधिकतम लाभ उठाते हुए अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखे। यदि भारत संतुलित और बहुआयामी विदेश नीति अपनाता है, तो वह किसी भी शक्ति का पिछलग्गू बनने के बजाय एक स्वतंत्र और प्रभावशाली वैश्विक शक्ति के रूप में उभर सकता है।

हाल के वर्षों में वैश्विक राजनीति के बदलते परिदृश्य में भारत की विदेश नीति और विशेष रूप से अमेरिका के साथ उसके संबंधों पर तीखी बहस देखने को मिल रही है। यह बहस तब और तेज हो जाती है जब अंतरराष्ट्रीय घटनाएँ, जैसे पश्चिम एशिया में तनाव, ईरान से जुड़ी परिस्थितियाँ या ऊर्जा बाज़ार में उतार-चढ़ाव सामने आते हैं। इसी संदर्भ में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का यह कथन सामने आता है कि तेल की कीमतें बढ़ने से हम बहुत पैसा बना रहे हैं, तो यह वैश्विक शक्ति राजनीति की वास्तविकता को उजागर करता प्रतीत होता है।

इस कथन को कई लोग इस रूप में देखते हैं कि विश्व राजनीति में कोई भी देश केवल नैतिकता या दोस्ती के आधार पर निर्णय नहीं लेता, बल्कि उसके केंद्र में हमेशा राष्ट्रीय हित और आर्थिक लाभ होता है। इसी दृष्टि से भारत-अमेरिका संबंधों की प्रकृति और दिशा का विश्लेषण करना आवश्यक हो जाता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मूल सिद्धांत यही रहा है कि राष्ट्र अपने हितों के आधार पर संबंध बनाते और बदलते हैं।

इसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों के यथार्थवादी सिद्धांत (रैलिस्म) के रूप में भी जाना जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार मित्रता, साझेदारी और गठबंधन स्थायी नहीं होते; स्थायी केवल राष्ट्रीय हित होते हैं। अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्तियों में से एक है और उसकी विदेश नीति का मूल लक्ष्य अपनी वैश्विक शक्ति, आर्थिक वर्चस्व और रणनीतिक प्रभाव को बनाए रखना रहा है। इसलिए जब अमेरिका किसी क्षेत्रीय संघर्ष, तेल बाजार या वैश्विक व्यापार व्यवस्था में हस्तक्षेप करता है तो उसका उद्देश्य अक्सर अपने हितों की रक्षा करना होता है।

ईरान-अमेरिका तनाव और पश्चिम एशिया की शक्ति राजनीति

पश्चिम एशिया, विशेष रूप से ईरान से जुड़ी घटनाएँ भी इसी शक्ति राजनीति का हिस्सा रही हैं। ईरान और अमेरिका के बीच दशकों से तनावपूर्ण संबंध रहे हैं। ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों का एक बड़ा प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ा है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है बल्कि यह भू-राजनीतिक रणनीति का भी हिस्सा बन जाता है। यदि तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो कुछ देशों को इसका आर्थिक लाभ होता है, जबकि आयात करने वाले देशों को आर्थिक दबाव झेलना पड़ता है। अमेरिका, जो ऊर्जा उत्पादन में भी एक बड़ी शक्ति बन चुका है, कई बार इस स्थिति से लाभान्वित होता दिखाई देता है।

भारत जैसे विकासशील और ऊर्जा-आयात पर निर्भर देश के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील होती है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और इसलिए तेल की कीमतों में वृद्धि सीधे उसके आर्थिक संतुलन को प्रभावित करती है। इसी कारण भारत ने वर्षों तक ईरान और रूस जैसे देशों से अपेक्षाकृत सस्ता तेल खरीदने की रणनीति अपनाई। लेकिन अमेरिका द्वारा ईरान पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद भारत पर भी दबाव पड़ा कि वह ईरान से तेल आयात कम करे।

यह घटना इस तथ्य को रेखांकित करती है कि वैश्विक शक्तियाँ अक्सर अपने राजनीतिक और आर्थिक उद्देश्यों के लिए अन्य देशों की नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश करती हैं। भारत-अमेरिका संबंधों का इतिहास भी उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। शीत युद्ध के दौर में भारत ने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई थी और उस समय अमेरिका के साथ उसके संबंध बहुत गहरे नहीं थे। उस समय भारत की निकटता सोवियत संघ के साथ अधिक थी। लेकिन शीत युद्ध समाप्त होने और सोवियत संघ के विघटन के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति का संतुलन बदल गया।

आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत-अमेरिका सहयोग में तेजी

आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत ने अमेरिका के साथ आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को बढ़ाया। विशेष रूप से 21वीं सदी में दोनों देशों के बीच रक्षा, तकनीक और व्यापार के क्षेत्र में सहयोग तेजी से बढ़ा है। हालांकि इस सहयोग के साथ-साथ संदेह और आलोचनाएँ भी मौजूद हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका भारत को चीन के संतुलन के रूप में देखता है। एशिया में चीन की बढ़ती आर्थिक और सैन्य शक्ति अमेरिका के लिए चुनौती बनती जा रही है।

ऐसे में अमेरिका भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना चाहता है ताकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखा जा सके। दूसरी ओर भारत भी चीन के साथ सीमा विवाद और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा के कारण अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों के साथ सहयोग बढ़ाने में रुचि दिखाता है। लेकिन इस सहयोग का अर्थ यह नहीं है कि दोनों देशों के हित पूरी तरह समान हैं।

व्यापार के क्षेत्र में ही कई बार भारत और अमेरिका के बीच मतभेद देखने को मिलते हैं। अमेरिका कई बार भारत पर बाजार खोलने, आयात शुल्क कम करने और व्यापारिक नियमों में बदलाव करने का दबाव डालता रहा है। दूसरी ओर भारत अपने घरेलू उद्योगों और कृषि क्षेत्र की रक्षा के लिए सावधानी बरतता है। यही कारण है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौतों पर बातचीत अक्सर लंबी और जटिल होती है।

मोदी सरकार की अमेरिका के साथ संबंध मजबूत करने की पहल

भारत की वर्तमान सरकार, जिसका नेतृत्व नरेंद्र मोदी कर रहे हैं, ने अमेरिका के साथ संबंधों को मजबूत करने की दिशा में कई पहल की हैं। रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी, क्वाड जैसे बहुपक्षीय मंच और उच्च स्तरीय कूटनीतिक संवाद इसके उदाहरण हैं। सरकार का तर्क है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत को बहु-आयामी साझेदारियों की आवश्यकता है और अमेरिका के साथ सहयोग से तकनीक, निवेश और सुरक्षा के क्षेत्र में लाभ मिल सकता है।

इसके विपरीत आलोचकों का मानना है कि भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए। उनका कहना है कि यदि भारत किसी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है तो उसकी स्वतंत्र विदेश नीति प्रभावित हो सकती है। भारत की पारंपरिक नीति भी यही रही है कि वह सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे। यही कारण है कि भारत आज भी रूस से रक्षा सहयोग बनाए हुए है, पश्चिम एशिया के देशों से ऊर्जा सहयोग करता है और साथ ही अमेरिका व यूरोप के साथ तकनीकी साझेदारी भी बढ़ा रहा है।

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यह संतुलन और अधिक स्पष्ट रूप से सामने आया। पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखा। भारत ने यह स्पष्ट किया कि उसकी ऊर्जा सुरक्षा उसके राष्ट्रीय हित का हिस्सा है और वह अपने आर्थिक हितों के आधार पर निर्णय लेगा। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत पूरी तरह किसी एक शक्ति के प्रभाव में नहीं है बल्कि अपने हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित नीति अपनाने की कोशिश कर रहा है।

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विदेश नीति पर मीडिया और राजनीति का भावनात्मक विमर्श

मीडिया और राजनीतिक विमर्श में अक्सर विदेश नीति के मुद्दों को अत्यधिक भावनात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाता है। कभी किसी देश को सबसे बड़ा मित्र बताया जाता है तो कभी सबसे बड़ा खतरा। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल होती है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते; परिस्थितियों के अनुसार हित बदलते रहते हैं। इसलिए किसी भी देश के साथ संबंधों को केवल भावनात्मक दृष्टि से नहीं बल्कि रणनीतिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखना आवश्यक है।

भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपनी आर्थिक शक्ति, तकनीकी क्षमता और सैन्य सामर्थ्य को लगातार बढ़ाता रहे। जब किसी देश की आंतरिक शक्ति मजबूत होती है तो वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर अधिक आत्मविश्वास के साथ निर्णय ले सकता है।

नृपेन्द्र अभिषेक नृप
नृपेन्द्र अभिषेक नृप

मजबूत अर्थव्यवस्था, आत्मनिर्भर तकनीक और सक्षम कूटनीति ही किसी भी देश को वैश्विक राजनीति में सम्मानजनक स्थान दिलाती है। भारत-अमेरिका संबंध न तो पूरी तरह आदर्श मित्रता का उदाहरण हैं और न ही पूरी तरह निर्भरता का। यह संबंध परस्पर हितों, रणनीतिक जरूरतों और वैश्विक परिस्थितियों के आधार पर विकसित हो रहे हैं। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह इस साझेदारी से अधिकतम लाभ उठाते हुए अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखे। यदि भारत संतुलित और बहुआयामी विदेश नीति अपनाता है, तो वह किसी भी शक्ति का पिछलग्गू बनने के बजाय एक स्वतंत्र और प्रभावशाली वैश्विक शक्ति के रूप में उभर सकता है।

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