युद्धों को रोकने में नाकाम होती विश्व व्यवस्था
इजराइल के अलावा इस युद्ध से ईरान और अरब देशों को नुकसान हो रहा है, इसलिए ये मामला पूरी तरह से मुस्लिम हितों का बन गया है। इसके अलावा इस युद्ध की भारी कीमत गरीब मुस्लिम देशों को चुकानी पड़ेगी, इसलिए ये मुद्दा मुस्लिम हितों से जुड़ गया है। ऐसे में ओआईसी का कुछ न कर पाना, उसके अस्तित्व पर सवाल खड़े करता है। हो सकता है कि अमेरिका इस युद्ध से निकल जाए क्योंकि अमेरिका में डोनल्ड ट्रंप का विरोध बढ़ता जा रहा है। सवाल यह है कि क्या ईरान और इजराइल रुक जाएंगे। दोनों देशों को देखकर ऐसा नहीं लगता है कि ये रुकने वाले हैं।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दुनिया ने युद्धों से बचने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ का निर्माण किया था। अपनी स्थापना की शुरुआत में ये संगठन कुछ हद तक कामयाब होता दिखाई दे रहा था। वास्तव में यह शांति इस संगठन की वजह से नहीं थी बल्कि दो शक्तिशाली वैश्विक ध्रुवों के कारण थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ दो सुपर पावर बन कर सामने आए। धीरे-धीरे विश्व इन दोनों शक्ति केंद्रों में बंट गया जिसके बाद इनके बीच सीधा युद्ध नहीं हुआ लेकिन एक संघर्ष चलता रहा जिसे दुनिया शीत-युद्ध के नाम से जानती है।
संयुक्त राष्ट्र संघ में भी अमेरिका और सोवियत संघ के कारण एक संतुलन बना रहा लेकिन 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका एकमात्र विश्वशक्ति बन गया। तबसे लेकर अमेरिका पूरी दुनिया को अपने तरीके से चला रहा है। अमेरिका और उसके सहयोगी पश्चिमी देश मिलकर पूरी वैश्विक व्यवस्था को चला रहे हैं। अमेरिका की दादागिरी इतनी ज्यादा हो गई है कि वो संयुक्त राष्ट्र संघ को अपने उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने लगा है। देखा जाए तो बात केवल संयुक्त राष्ट्र संघ की भी नहीं है, अमेरिका ने लगभग विश्व की सभी संस्थाओं पर कब्जा कर लिया है। इसके कारण ही कई देशों ने अलग से अंतरराष्ट्रीय संगठन और मंचों का निर्माण किया है।
वैश्विक व्यवस्था कमजोर, ताकत के आधार पर फैसले
विभिन्न देशों द्वारा यूएनओ के विकल्प के रूप में बनाये गए संगठन क्या अपनी कोई भूमिका वैश्विक व्यवस्था में निभा रहे हैं। यह सवाल इसलिए खड़ा हुआ है क्योंकि अमेरिका-इजराइल और ईरान के युद्ध ने पूरी दुनिया के लिए संकट खड़ा कर दिया है। इस संकट के समय यूएनओ तो गायब है ही लेकिन दूसरे संगठन भी दिखाई नहीं दे रहे हैं। इस युद्ध के कारण पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट आने वाला है और सिर्फ इसका इंतजार किया जा रहा है।
ऐसा लग रहा है कि कोई वैश्विक व्यवस्था बची ही नहीं है, जिसकी जो मर्जी है, वो कर रहा है। दोनों पक्ष अपनी ताकत का पूरा इस्तेमाल कर रहे हैं, इसका दुनिया पर क्या असर होगा, इसकी कोई परवाह नहीं कर रहा। देखा जाए तो दुनिया एक जंगल बन चुकी है, जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाली व्यवस्था काम कर रही है। अगर अन्य संगठनों की बात करें तो मुख्य रूप से ब्रिक्स, एससीओ, जी-20 और ओआईसी ताकतवर संगठनों के रूप में सामने आते हैं। इस युद्ध को रोकने की बात तो दूर, इससे होने वाले दुष्प्रभावों को कम करने की कोशिश भी कहीं दिखाई नहीं दे रही है।
यह भी पढ़ें… ईरान-भारत का मित्र या शत्रु ?
युद्ध पर ब्रिक्स और एससीओ की चुप्पी पर सवाल
ब्रिक्स और एससीओ में रूस, चीन और भारत जैसी बड़ी शक्तियां शामिल हैं लेकिन युद्ध को रोकने के लिए दोनों मंचों से कोई आवाज नहीं आयी है। जी-20 देशों में तो लगभग सभी शक्तिशाली देश शामिल हैं लेकिन वो भी चुप है। सबसे बड़ी बात ये है कि लगभग पूरा मिडिल ईस्ट खतरे में आ गया है लेकिन ओआईसी की एक बैठक तक बुलाई नहीं गयी है। जब तक युद्ध शुरू नहीं हुआ था, तब तक तो इस संगठन का चुप रहना समझ आता था, लेकिन इस युद्ध ने जो रूप ले लिया है, इसके बाद भी ये संगठन निष्क्रिय है, ये समझना बहुत मुश्किल है।
इस संगठन में दुनिया के लगभग सभी मुस्लिम देश शामिल हैं लेकिन इन्होंने खामेनेई और उनके सहयोगियों की हत्या का विरोध तक नहीं किया है। अब तो ऐसा लग रहा है कि ईरान का युद्ध अमेरिका और इजराइल से ज्यादा अरब देशों के खिलाफ हो गया है। ईरान अरब देशों की अर्थव्यवस्था खत्म करने में लगा हुआ है। जब तक ईरान अरब देशों के अमेरिकी अड्डों पर हमले कर रहा था, तब तक तो फिर भी ठीक था, लेकिन अब ईरान इन देशों के नागरिक ठिकानों को निशाना बना रहा है, ऐसे में ओआईसी का चुप रहना अचंभित करता है। जिस तरह से ईरानी नेतृत्व क्रूड ऑयल का दाम 200 डॉलर तक ले जाने का दावा कर रहा है, ये मुस्लिम देशों की बड़ी समस्या बन जाएगा।
अमेरिका को झुकाने की रणनीति पर चल रहा ईरान
ईरान की रणनीति अमेरिका को झुकाने की है। वो अपनी जगह सही हो सकता है लेकिन इसके असर से दुनिया में आने वाली बर्बादी से कौन तबाह होगा, इस पर भी तो विचार करने की जरूरत है। ओआईसी मुस्लिम हितों के लिए बनाया गया संगठन है और इस युद्ध से मुस्लिम हितों को बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है। वास्तव में मुस्लिम नेतृत्व ज्यादातर अमेरिका के पक्ष में है लेकिन मुस्लिम समुदाय ईरान के पक्ष में है। इसकी वजह यह है कि ईरान पर हमला किया गया है, इसलिए वो पीड़ित दिखाई दे रहा है।
ईरान जिस तरह से अमेरिका के खिलाफ लड़ रहा है, उससे पूरे मुस्लिम समुदाय में गर्व की भावना पैदा हो गई है। अमेरिका के झुकने से मुस्लिम समुदाय को आत्मिक शांति मिल सकती है, लेकिन तेल की कमी से पैदा होने वाली समस्याओं की मार सबसे गरीब देशों पर पड़ने वाली है और ज्यादातर मुस्लिम देश पहले ही गरीबी की मार झेल रहे हैं। यूएनओ धीरे-धीरे अपना महत्व खोता जा रहा है क्योंकि वहां वही होता है, जो अमेरिका चाहता है लेकिन इसके विकल्प में बने संगठनों का क्या महत्व रह गया है।
क्या ये संगठन सिर्फ बड़े-बड़े आयोजन करने के लिए ही हैं, या जमीन पर भी कुछ असर है। इस युद्ध की मार पूरी दुनिया पर पड़ने वाली है, इसलिए सबको अपना काम करना चाहिए। ब्रिक्स और एससीओ में चीन और रूस शामिल हैं, ये दोनों अपने प्रभाव का इस्तेमाल ईरान को रोकने में कर सकते हैं, वैसे भी ईरान इनका सहयोगी देश है। इस युद्ध में अप्रत्यक्ष रूप में चीन और रूस ईरान की मदद कर रहे हैं, इसमें कुछ भी गलत नहीं है।
युद्ध में अन्य देशों को घसीटने पर ईरान की आलोचना
ईरान की रक्षा करने तक तो ठीक है, लेकिन वो जिस तरह से अन्य देशों को इस युद्ध में घसीट रहा है, उसे तो रोका जाना चाहिए। बेशक अमेरिका से रूस और चीन की दुश्मनी हो, लेकिन अरब देशों के साथ तो ऐसा नहीं है। तेल महंगा होने से रूस को तो फायदा होगा लेकिन चीन के लिए तो ये बड़ी समस्या होने वाली है। ईरान ने अमेरिका की सारी हेकड़ी निकाल दी है, लेकिन वो खुद भी बर्बाद हो रहा है। कुछ भी हो जाये, ईरान युद्ध जीतने वाला नहीं है।
वो सिर्फ इजराइल को नुकसान पहुंचा सकता है। इस संकट की मार अमेरिका और इजराइल से ज्यादा भारत, चीन और दूसरे देशों पर पड़ने वाली है। तेल की कमी से पाकिस्तान में हाहाकार मचा हुआ है। ये पूरी दुनिया में होने वाला है। देखा जाए तो ये युद्ध सिर्फ अमेरिका, इजराइल और ईरान का नहीं रह गया है, ये पूरी दुनिया का युद्ध बन चुका है। अमेरिका को हम कितना भी कोस लें, लेकिन इससे समस्या खत्म होने वाली नहीं है।

ईरान को समझना होगा कि वो इजराइल को खत्म नहीं कर सकता। इजराइल एक परमाणु शक्ति है। अस्तित्व पर संकट आने पर वो परमाणु बम का प्रयोग कर सकता है। इजराइल को समझना होगा कि वो ईरान का जितना नुकसान कर सकता है, वो कर चुका है। अब केवल आम जनता को निशाना बना सकता है। अगर ये संगठन प्रयास करें तो दोनों पक्षों को पीछे हटने के लिए मनाया जा सकता है। दोनों ही पक्षों को इस युद्ध में अपूरणीय क्षति पहुँच रही है। ऐसे में कोशिश करने से ये मामला खत्म भी हो सकता है।
अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।



