पूर्वी भारत की पहली रेलवे की असाधारण यात्रा की कहानी
चर्चित पुस्तक रेल्स थ्रू राज: द ईस्ट इंडियन रेलवे (1841-1861) प्राथमिक ऐतिहासिक स्त्रातों पर आधारित है तथा ब्रिटिश काल में भारतीय रेलवे के विकास को तथ्यात्मक विश्लेषण एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक सामान्य पाठकों के साथ-साथ इतिहास एवं रेलवे विषयक शोधकर्ताओं के लिए भी अत्यंत उपयोगी होगी। इस पुस्तक के लेखक व रेल डिब्बा कारखाना, कपूरथला के महाप्रबंधक पी. के. मिश्रा भारतीय रेलवे के इतिहास व ईस्ट इंडियन रेलवे और उसे स्थापित करने वाली ईस्ट इंडियन रेलवे कंपनी के जन्म और विकास पर आधारित अपनी इस पुस्तक का परिचय देते हुए बताते हैं कि इसमें में 19वीं सदी के विभिन्न अभिलेखागारों से लिए गए विवरणों का सहारा लिया गया है।
मिश्रा बताते हैं, उद्घाटन यात्रा से पहले ही ईआईआर ने 29 जून 1854 को हावड़ा से पांडुआ तक केवल इंजन के परीक्षण से बंगाल में लोगों की जिज्ञासा जगा दी थी। इसके बाद 6 जुलाई को उसी मार्ग पर एक इंजन द्वारा एक अकेले डिब्बे को खींचते हुए प्रायोगिक दौड़ की गई। विरासत संरक्षण के प्रबल समर्थक मिश्रा ने पीटीआई को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि भारत में ईआईआर के बीज 1853 में रेलवे के आगमन से पहले ही बो दिए गए थे। 1 जून 1845 को लंदन और कलकत्ता (अब कोलकाता) में कार्यालय वाली एक संयुक्त स्टॉक कंपनी के रूप में ईस्ट इंडियन रेलवे कंपनी की स्थापना की गई थी।
कंपनी की स्थापना से पहले औपनिवेशिक नौकरशाही के पहाड़ हटाने पड़े और भूमि अधिग्रहण तथा लॉजिस्टिक समस्याओं में हुई देरी के कारण संभवत ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे (जी आई पी आर) ने ईआईआर पर बढ़त बना ली और भारत की पहली रेलवे बन गई। उन्होंने बताया, बंगाल प्रेसीडेंसी में ईआईआर की धीमी प्रगति पर स्थानीय समाचारपत्रों और जन टिप्पणीकारों ने तीखी प्रतिक्रियाँए दी थीं। मिश्रा लिखते हैं कि कलकत्ता के प्रेस ने देरी के लिए ईआईआर और उसके प्रवर्तकों को दोषी ठहराया, यहाँ तक कि कुछ ने इसे काल्पनिक परियोजना तक कह दिया।
वे 13 मई 1854 को प्रकाशित दिल्ली गजट की एक आलोचनात्मक रिपोर्ट का हवाला देते हैं, जिसमें लिखा था, उक्त रेलवे का उद्घाटन महारानी के जन्मदिन पर होना था, परंतु अब यह स्वाभाविक रूप से स्थगित कर दिया गया है, और इसमें तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी की भी आलोचना की गई थी। ईआईआर: द इनॉगुरल जर्नी (1854) अध्याय में मिश्रा लिखते हैं- 1854 की शुरुआत तक कलकत्ता और हुगली के बीच की शांत पड़ी पटरियाँ चमक रही थीं। पूरी तरह तैयार, फिर भी निपिय, और आगे वे जोड़ते हैं, -लाइन और पुल तैयार थे, लेकिन इंजन अभी पहुँचे नहीं थे।
इंजनों का पहला जत्था इंग्लैंड से ऑस्ट्रेलिया होते हुए केडगरी जहाज से कलकत्ता पहुँचा। उस समय पर्याप्त सुविधाओं के अभाव में हावड़ा में इतने विशाल लोहे के दानवों को उतारना तत्काल नवाचार की एक बड़ी सफलता थी। ईआईआर की सफलता ने न केवल ईस्ट इंडिया कंपनी का ध्यान आकर्षित किया, बल्कि आम लोगों की कल्पना को भी प्रेरित किया। इसके परिणामस्वरूप ट्रेन के आगमन का जश्न मनाते हुए बंगला भाषा में एक लोकप्रिय सड़क गीत भी रचा गया। करीब 340 पृष्ठों की यह गहन शोध पर आधारित इस पुस्तक में अध्याय कालापामिक रूप से व्यवस्थित हैं और प्रत्येक अध्याय के नाम के साथ ईआईआर जुड़ा है।

पुस्तक एक रेल यात्रा की तरह आगे बढ़ती है। हर अध्याय पटरियों के किनारे एक पड़ाव जैसा प्रतीत होता है। पुस्तक के लिए अपने शोध के दौरान मिश्रा ने मुख्य रूप से कलकत्ता विश्वविद्यालय पुस्तकालय, पश्चिम बंगाल राज्य अभिलेखागार, एशियाटिक सोसाइटी और कोलकाता स्थित ब्रिटिश लाइब्रेरी के भंडारों के साथ-साथ दिल्ली और अन्य स्थानों पर भारतीय रेल के अभिलेखागारों तथा विभिन्न ऑनलाइन संसाधनों का सहारा लिया है।
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