चांदनी रातें दोस्तोवस्की की कथा को निर्देशक पूर्वा नरेश ने बनाया जीवंत

सुप्रसिद्ध सोवियत लेखक दोस्तोवस्की की वर्ष 1848 में लिखी कहानी व्हाइट नाइटस् (स़फेद रातें) को मुंबई की नाट्य निर्देशक पूर्वा नरेश ने चांदनी रातें के नाम से रंगमंच पर प्रस्तुत किया, जो इस वर्ष आयोजित भारत रंग महोत्सव में भी आमंत्रित थी। 8 फरवरी को नई दिल्ली के कमानी प्रेक्षागृह में इस नाटक को देखना मेरे लिए अब तक के रंगमंचीय अनुभव में एक नया सोपान था।
ब व कारंथ, रतन थियम, बंशी कौल, फ्रिटज वेनेविट्ज के नाटकों को देखने के अनेक वर्षों बाद पूर्वा नरेश के इस नाटक को देखना एक ऐसी प्रतिभाशाली रंग निर्देशक के रंगमंच के खूबसूरत दृश्यबंधों, दुर्लभ प्रकाश योजना, अपूर्व रंग संगीत, सभी कलाकारों के अद्वितीय अभिनय और कमाल के रंग-संयोजन को देखना था। पूर्वा नरेश की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे अपनी रंग प्रतिभा से स्पेस को एक कल्पना लोक में बदलने का जादू जानती हैं।
घृणा और युद्ध के विरुद्ध प्रेम का सशक्त संदेश
सेंट पिटर्सबर्ग और नदी के पुल को ही नहीं, स्पेस के एक-एक कोने को भी वे मानवीय हरकतों, जादुई प्रकाश-संयोजन और कर्णप्रिय गीत-संगीत तथा नयनाभिराम नृत्य के माध्यम से जीवंत बना देती हैं। चांदनी रातें नाटक सेंट पिटर्सबर्ग की उन रातों पर आधारित है, जहां सूर्यास्त न होने से जादुई प्रकाश रहता है। इसका नायक अपनी कल्पनाओं में जीता है, जबकि नायिका नास्तेनका स्वर्ण रातों में अपने पुराने प्रेमी का इंतज़ार करती है। दोनों अपनी एकतरफा प्रेम-कहानियां साझा करते हैं और एक-दूसरे के प्रति भावनात्मक प्रेम में बंध जाते हैं, लेकिन अंत में उसका प्रेमी लौट आता है और नायक फिर से एकाकी रह जाता है।
अंत में नायक का यह कथन जो एक तरह से समाज के लिए एक संदेश की तरह है- प्रेम से युद्ध को पूरी तरह से समाप्त तो नहीं किया जा सकता, किंतु प्रेम युद्ध की त्रासदी को सहन करने की शक्ति प्रदान करता है। इस संपूर्ण नाटक के केंद्र में केवल प्रेम है। यह नाटक एक तरह से प्रेम का संदेश देने वाला है। घृणा के विरुद्ध प्रेम, युद्ध के विरुद्ध प्रेम। पूर्वा नरेश की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वे इस कहानी की आत्मा की रक्षा करती हैं और सम-सामयिक विश्व राजनीति से भी इसे संबद्ध करने का प्रयास करती है।
प्रॉप्स और दृश्य संयोजन में पूर्वा नरेश की दक्षता
पूर्वा नरेश इस नाटक में विनोद कुमार शुक्ल की कविता हताशा में एक आदमी बैठ गया था के साथ अशोक वाजपेयी, केदारनाथ सिंह तथा नरेश सक्सेना की कविताओं को भी संगुफित करना नहीं भूलती हैं। वे अपने नाटकों में प्रॉप्स का बेहतर इस्तेमाल करना जानती हैं। नदी, पुल, खंडहर, बरसात के दृश्यों को बखूबी मंच पर प्रदर्शित करने की कला में भी अपनी दक्षता का परिचय देती हैं।
इस नाटक में छतरी का रूपक भी अपने नए रूपों में नाटक की कथावस्तु में महत्वपूर्ण योगदान देता है। इसके अतिरिक्त ओपेरा और जगह-जगह रशियन भाषा का प्रयोग करके दोस्तोवस्की की सृजनात्मकता को एक नया आयाम प्रदान करने की कोशिश करती हैं। पूर्वा नरेश ने अपने इस नाटक से सिद्ध कर दिया है कि वे वर्तमान हिन्दी रंगमंच की सबसे श्रेष्ठ रंग-निर्देशिका हैं।
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