हनुमान गुणगान
प्रभात की प्रथम अरुणिमा में
जब आकाश के कपोलों पर
सिंदूरी आभा उतरती है
वहीं कहीं गूँज उठती है-
अटल विश्वास की ध्वनि
पवनपुत्र के चरणों से।
वह शक्ति नहीं, केवल बल की,
वह साहस नहीं, केवल रण की,
वह तो है विनय का विस्तार,
जो पर्वत उठाकर भी
हृदय में नम्रता सँजोए रखता है।
अंजनी के आँगन से निकला
एक दीपक-सा तेज,
जिसने भय के अंधकार को
आकाश भर उजाला कर दिया।
समुद्र की लहरों ने देखा
जब विश्वास ने छलाँग लगाई
सीमा रेखाएँ लघु हो गईं
और संकल्प विशाल।
वह नाम नहीं
एक चलती हुई प्रेरणा है
वह रूप नहीं
एक जागती हुई चेतना है।
जहाँ श्रम पसीना बनकर गिरता है
वहीं हनुमान की भक्ति
सुगंध बनकर उठती है।
राम के प्रति अटूट समर्पण
जैसे नदी का सागर में विलय
न अपना यश, न अपना मान
केवल सेवा का नीरव गान।
यही तो है वह ऊँचाई
जहाँ विजय भी विनम्र हो जाती है।
आज भी जब मन डगमगाता है
और राहें धुंध से भर जाती हैं
तब भीतर से कोई स्वर कहता है-
उठो, विश्वास बनो, प्रयास बनो,
और हृदय में दीप-सा जल उठता है
साहस बने श्वास हमारी
सेवा बने पहचान
विनय बने आभूषण जीवन का
यही तुम्हारा वरदान।
पवनसुत! इस युग के मन में भी
वही उजियारा भर दो
हर हृदय कह उठे
जय-जय हनुमान, जय-जय हनुमान!!!

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