सहयोग है भविष्य की शक्ति
सर्व शास्त्र शिरोमणि श्रीमद भगवद् गीता में कहा गया हैं- परस्पर भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ। अर्थात परस्पर सहयोग की भावना रखने से ही सर्व की उन्नति एवं कल्याण होगा। विश्व भर में भारत को सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध देश माना जाता है, क्योंकि यहाँ ऋषियों-मुनियों द्वारा समस्त जनों को परोपकार:पुण्याय, पापाय परपीडनम् का उपदेश दिया है अर्थात परोपकार ही पुण्य है और दूसरों को दुःख देना व पीड़ा पहुंचाना ही पाप है।
अत एक-दूसरे से स्नेह एवं सहयोग की भावना रखते हुए, मिल-जुलकर चलने में ही सर्व का भला एवं सुख समाया है। हम सभी बहुत तेज गति से बदल रहे विश्व में जी रहे हैं, जहाँ हर पल कुछ न कुछ अवांछित व अकल्पनीय घट रहा है। ऐसे में हम सभी के सामने एक विकट प्रश्न उठता है कि क्या ऐसी अनिश्चिंतताओं से भरपूर दुनिया में जीवित रहने के लिए हम सक्षम हैं?
दुनिया भर में चल रही मौजूदा तनाव की परिस्थितियों को देखते हुए आज कोई भी देश यह दावा नहीं कर सकता कि अन्य देशों में कुछ भी हो रहा है, परन्तु हम तो प्रगति कर रहे हैं। क्या यह व्यावहारिक रूप से संभव है? नहीं! शास्त्रज्ञ मनीषियों ने समाज की तुलना शरीर से की है, जिस प्रकार शरीर को आरोग्य पूर्ण और गतिशील बनाने के लिए सभी अंगों का स्वस्थ होना आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार से समाज का संगठित और शक्तिशाली स्वरूप लोगों की खुशहाली, सुख, शांति, पारस्परिक सहयोग तथा एकता का उत्तरदायित्व बखूबी निभाता है।
वैश्विक सहयोग और मानवता से ही बनेगा सुरक्षित भविष्य
अत हमें भलीभांति समझना चाहिए कि विश्व बंधुत्व की भावना समूचे मानवीय सृष्टि के व्यापक हित में है, क्योंकि लगातार बदलते परिवेश में बेहतर तितिक्षा के साथ जीवित रहने के लिए हमें एक वैश्विक सहयोग आंदोलन की जरूरत है। वर्तमान हमारे समक्ष योग्यतम की उत्तरजीविता का प्रश्न नहीं है, अपितु मूल चुनौती हर प्रकार की कठिन परिस्थितियों के बीच हम सभी एक साथ कैसे रहें।
इसीलिए, मानवीय, नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को साथ लेकर विकास करना उचित व सुरक्षित है। सुनने में यह बात मुश्किल लग सकती है, किन्तु यह नामुमकिन बिल्कुल नहीं है। वर्तमान समग्र विश्व समान समस्याओं से जूझ रहा है, जिसका हल केवल एक ही शब्द में समाया हुआ है- सहयोग। याद रहे! आने वाले समय में किसी भी देश की शक्ति को उसके सैन्य या आर्थिक शक्ति द्वारा आंका नहीं जाएगा, बल्कि आध्यात्मिक शक्ति द्वारा अधिग्रहित अनुकूलन क्षमता के आधार पर उसकी शक्तियों का आंकलन किया जाएगा।
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बड़ी संख्या में खड़ी गगनचुंबी इमारतों वाला देश कभी भी विश्व का शासक नहीं बन पाएगा, इसके बजाय वह देश जो उदात्त आदर्शों और एक मजबूत मूल्य प्रणाली की नींव पर खड़ा होगा, जो मानवता की सेवा के लिए सक्षम होगा, निस्संदेह वह विश्व पर राज्य करेगा। तो चलिए, आज से परमार्थ दुःख को अपना दुःख मानते हुए, अपने और पराये का भेद मिटाकर वैश्विक सहयोग की भावना को अपने भीतर जागृत कर एक अहिंसात्मक एवं सुरक्षित और शांतिमय विश्व का निर्माण करें।
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