स्वयं का प्रसन्नचित्त चेहरा

प्रतिदिन कुछ क्षणों के लिए स्वयं के प्रसन्न व सुखी चेहरे का स्मरण करें। अपने जीवन के उन क्षणों को स्मरण करें, जब आपने भगवत के कोई कार्य किए। जब किसी को स्नेह दिया, किसी को थपकी दी, किसी के सुख के लिए अपना सुख त्याग दिया, उन क्षणों की अनुभूति को जगाइए। जैसे ही उस अनुभूति में जाएँगे, उसके साथ जुड़े सारे वर्ण, रस, गंध, स्पर्श को ग्रहण करने का सामर्थ्य आप में आ जाएगा। अपने अंदर के महावीर, राम व रहीम को जाग्रत करें।

यह है, लेश्या परिवर्तन का एक और सरल प्रयोग। हर व्यक्ति अपने जीवन में कभी न कभी ऐसे उत्कृष्ट अनुभव से गुजरता है। उस भाव में आपको पहुंचना है और उस भाव को ग्रहण करना है। उस समय जिनके प्रति आपकी श्रद्धा थी, भक्ति के भाव थे, उन्हें स्मरण करें। भले वे आपके गुरु, इष्टदेव, माता-पिता या अन्य कोई आपके श्रद्धेय हों, उनके चेहरे को मन के समक्ष लाएँ, उनके रूप की एवं वात्सल्य भरे स्पर्श की अनुभूति करें।

सिर्फ सोच नहीं, अनुभूति बदलने से बदलती है मनःस्थिति

अपनी आँखों में उनके रूप का अनुभव करते हुए, गहरी श्वास अंदर लेते समय यह विचार करें कि मैं उनके मधुर रूप, स्पर्श, गंध तथा रस को ग्रहण कर रहा हूँ। उनके आशीर्वाद के शब्द को ग्रहण कर रहा हूँ। जब आप इस ग्रहण की प्रक्रिया से गुजरेंगे, तब आपकी द्रव्य लेश्या के साथ अंदर की भाव लेश्या में परिवर्तन होगा। यही प्रक्रिया ऊर्जा के स्तर पर साधना है।
आप यह प्रयोग अपने क्रोध को शांत करने के लिए भी कर सकते हैं।

जब भी क्रोध आए, आँखें बंद करके स्वयं के प्रसन्न चेहरे का स्मरण करें, इससे आपकी अनुभूति बदल जाएगी। अब आप समझ सकते हैं कि क्रोध मत करो, यह कहने से किसी का क्रोध नहीं थम सकता। कृष्ण लेश्या में मत जाओ। ऐसा कहने से कृष्ण लेश्या बंद नहीं होती है। इसके लिए सही प्रक्रिया की आवश्यकता है। ग्रहणशीलता के विज्ञान को समझे बिना उचित प्रकार से जी नहीं सकते।

अत तीर्थंकर महावीर ने वर्ण, गंध, रस व स्पर्श का महत्व समझाया। उसके पीछे का विज्ञान है कि केवल आकार के बल पर चलेंगे तब तदाकार हो जाएँगे, किन्तु तद्रूप नहीं हो पाएँगे, तद्रूप हुए बिना, तद्गंध हुए बिना, तद्रस हुए बिना अंदर की लेश्या नहीं बदल पाएँगे। एक कलाकार यह बात सरलता से समझ सकता है। यदि राम का रूप धारण करना है, तब वर्ण, गंध, रस व स्पर्श से गुजरना पड़ेगा।

सिर्फ दिखावा नहीं, सच्ची अनुभूति से आता है असली परिवर्तन

सिर्फ बाहर के लक्षणों को धारण करने मात्र से राम का रूप प्राप्त होगा, परंतु राम का स्वरूप नहीं। राम बनना है तो राम का स्वरूप लाना होगा। नाटक में कुछ संवादों को बोलने के लिए कलाकार को भावावेश में जाना होता है, जो उन संवादों के अंदर प्रवेश करता है, तद्रूप होता है, भावों में घुलता है, उसकी कला जीवंत बनती है।

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ध्यानमग्न व्यक्ति, जो लेश्या के माध्यम से आत्मपरिवर्तन कर रहा है।
प्रवीण जैन

केवल शब्द बोलने से कार्य नहीं बनता, उस अनुभूति से गुजरना पड़ता है। लेश्या में वर्ण, गंध, रस और स्पर्श के गुण हैं। इसलिए जहाँ इनमें से एक का संचार होगा, बाकी तीनों का भी होगा। जहाँ आँखों से लेश्या के वर्ण पहुँचेंगे, वहाँ गंध, रस और स्पर्श भी पहुँचेंगे। जहाँ छूने से लेश्या के स्पर्श पहुँचेंगे, वहाँ वर्ण, गंध और रस भी पहुँचेंगे। ऐसा कभी नहीं होता है कि इनमें से कोई एक पहुँचता है, पहुँचते चारों ही है। जब चारों पहुँचेंगे, तब बदलाव अवश्य आएंगे।

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