खतरनाक है जाति और मजहब की सियासत
आज की तारीख में राजनीति में अब व्यक्ति की योग्यता का आधार उनकी राजनीतिक कुशलता नहीं बल्कि जातिगत और मजहबी सदस्यता भर रह गया है। आश्चर्य की बात यह कि जिन राजनीतिक दलों ने राजनीति में जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाकर अपनी पहचान निर्मित की, वे भी आज जाति की ही राजनीति करते देखे जा रहे हैं। उसका नतीजा यह है कि राजनीतिक दलों के लिए जाति व्यवस्था एक उपयोगी संस्था के रूप में तब्दील हो चुकी है जिसका वे भरपूर दोहन कर रहे हैं। लेकिन इसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ रहा है।
देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) का पंजीकरण रद्द करने की अनुरोध वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह कहा जाना सर्वथा उचित है कि जातिगत आधार पर निर्भरता वाले राजनीतिक दल देश के लिए खतरनाक हैं। गौर करें तो सर्वोच्च अदालत की यह टिप्पणी ऐसे समय में आयी है, जब सियासी दलों द्वारा जातिगत और मजहबी गोलबंदी को खुलकर धार दिया जा रहा है।
याद होगा गत वर्ष पहले भी सर्वोच्च न्यायालय ने जाति, धर्म, भाषा और समुदाय की आड़ में कुत्सित सियासत को जनप्रतिनिधित्व की धारा 123 (3) का उल्लंघन करार देते हुए कहा था कि चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया है और इसे इसी रूप में बनाए रखना होगा। तब समझा गया था कि देश के सियासतदान जाति व मजहब के नाम पर वोट की सियासत बंद करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उल्टे हालात पहले से भी बदतर हुए हैं। अकसर देखा जाता है कि जब भी देश में चुनाव आता है राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए जाति, धर्म, भाषा और समुदाय के नाम पर वोट मांगना शुरू कर देते हैं।
चुनावी राजनीति में मजहब-जाति की खतरनाक चाल
उनकी मजहबी व जातिवादी राजनीति से न केवल ध्रुवीकरण को बढ़ावा मिलता है बल्कि कई बार तो तनाव व हिंसा का माहौल भी उत्पन्न होता है। देश के सियासी दल सत्ता संधान के निमित्त मजहब और जाति अस्मिता के सवाल को किस तरह उछालकर जातियों की गोलबंदी कर व्यवस्था का जातीयकरण करते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। सर्वोच्च अदालत की टिप्पणी के बाद अब भी उम्मीद करना बेमानी ही होगा कि राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए अपने भाषणों में और अपील के जरिए धर्म, जाति व समुदाय के लोगों को लुभाने और उनका ध्रुवीकरण कराने की हिमाकत नहीं करेंगे।
सच तो यह है कि वे अब भी रुकने वाले नहीं हैं। जबकि सभी राजनीतिक दल इस सच्चाई से भली-भांति अवगत हैं कि वोटयुक्ति के लिए मजहबी लासेबाजी से देश अनगिनत बार चुनावी दंगे की भेंट चढ़ चुका है। सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है। हजारों करोड़ की संपत्ति नष्ट हो चुकी है। हद तो तब हो जाती है जब राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव जीतने के लिए मजहबी लोगों को आगे कर अपने पक्ष में फतवा जारी कराया जाता है। अपने चुनावी घोषणापत्रों में मजहबी आधार पर आरक्षण का वादा किया जाता है। जबकि उन्हें अच्छी तरह पता है कि यह संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है।
संविधान के अनुच्छेद 15 व 16 (4) में स्पष्ट उल्लेख है कि शैक्षणिक और सामाजिक पिछड़ापन ही आरक्षण का आधार हो सकता है, न कि मजहब। यही नहीं वे कभी सवर्णों के लिए तो कभी पिछड़ों के लिए आरक्षण की मांग करते हैं। हद तो तब होती है जब राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए मजहब और जाति को आधार बनाकर दलीय उम्मीदवार तय करते हैं। इस मामले में सभी दलों का रवैया एक जैसा है।
चुनावी राजनीति में जाति-मजहब का बढ़ता दबदबा
भारत में स्वतंत्रता आंदोलन ने जब जोर पकड़ा तो ऐसा लगा कि कुछ वर्षों में जाति-व्यवस्था का प्रभाव पूर्णतया समाप्त हो जाएगा। लेकिन सन् 1957 के आम चुनाव के बाद देश ने महसूस किया कि भारत में जातिगत भावनाएं एक बार पुनः उभरने लगी है। अनेक क्षेत्रों में इनके बढ़ते हुए प्रभाव से देश की राजनीति के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है। गौर करें तो राजनीति में जाति के बढ़ते हुए प्रभाव की यह आरंभिक स्थिति थी लेकिन आज जैसे-जैसे हमारी राजनीति दूषित हो रही है उसी अनुपात में जाति और मजहब का ध्रुवीकरण भी तेज हो रहा है।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में मजहब और जाति को इसके दो पक्षों के रूप में समझा जा सकता है-एक इसका सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष है जो दिन-प्रतिदिन कमजोर होता जा रहा है। दूसरा पक्ष राजनीतिक पक्ष है जो अपनी पूरी ताकत से मजहब और जाति के प्रभाव को बनाए रखने का जतन हो रहा है। हालांकि देश का जनमानस मजहब और जातीय ध्रुवीकरण के विपरीत एक साथ मिल-जुलकर रहना चाहता है। लेकिन चुनाव के दरम्यान राजनीतिक दल प्रत्येक व्यक्ति को याद दिलाते नजर आते हैं कि वह अपने ही मजहब और जाति के हित में किसी उम्मीदवार को वोट दें।
इसी का नतीजा है कि मजहब और जाति व्यवस्था ने मजहबवाद और जातिवाद का रूप लेकर सामाजिक व राजनीतिक जीवन को विघटित किया है। यदि पिछले आम चुनावों पर ध्यान टिकाए जाएं तो राज्य तथा केंद्र स्तर पर विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा अपने जिन उम्मीदवारों को चुनाव के लिए मैदान में उतारा गया उनमें से 75 फीसदी से भी अधिक के चयन का आधार उनकी जाति और मजहब थी।
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राजनीति में जाति, मजहब और भाषा का वर्चस्व
आज की तारीख में राजनीति में अब व्यक्ति की योग्यता का आधार उनकी राजनीतिक कुशलता नहीं बल्कि जातिगत और मजहबी सदस्यता भर रह गया है। आश्चर्य की बात यह कि जिन राजनीतिक दलों ने राजनीति में जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाकर अपनी पहचान निर्मित की, वे भी आज जाति की ही राजनीति करते देखे जा रहे हैं। उसका नतीजा यह है कि राजनीतिक दलों के लिए जाति व्यवस्था एक उपयोगी संस्था के रूप में तब्दील हो चुकी है जिसका वे भरपूर दोहन कर रहे हैं। लेकिन इसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ रहा है।
प्रजातंत्र के लिए गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। काका कालेलकर ने राजनीति में जातिवाद को देश के लिए खतरा बताते हुए लिखा था कि जातिवाद एक अंधी तथा उच्च सत्ता प्राप्त वफादारी है जो कि स्वस्थ न्याय के सामाजिक स्तर, समानता और व्यापक भाईचारे को तिलांजलि देती है। जाति की विद्रुप सियासत का ही नतीजा है कि आज संपूर्ण देश जातियों का खौलता हुआ कुंड बन चुका है और समूची व्यवस्था का जातीयकरण हो रहा है।
जातिवादी राजनीति ने भारतीय समाज को टुकड़े-टुकड़े में विभक्त कर दिया है और सभी जातियां एक-दूसरे को शक की नजर से देख रही हैं। दरअसल व्यवस्था के जातीयकरण ने सत्ता में दुबारा वापसी की इस हद तक गारंटी दे दी है कि सभी सियासी दल जातिवादी राजनीति को खाद-पानी मुहैया कराने पर आमादा हैं। धर्म व जाति की घटिया राजनीति की तरह भाषा को लेकर भी देशतोड़क राजनीति की जा रही है। महाराष्ट्र इसका ताजा उदाहरण है जहां गैर मराठियों का भाषा के नाम पर उत्पीड़न हो रहा है। भाषा पर कुत्सित सियासत का ही नतीजा है कि आज भारत में भाषावाद की समस्या भयंकर रूप धारण कर ली है।
भाषा की राजनीति और राष्ट्रहित पर प्रभाव
भाषा की सियासत का प्रतिफल रहा कि असम में भीषण रक्तपात हुआ वहीं बंगाल में हिंदी के विरोध में बंगाली भाषा को लेकर वितंडा खड़ा हुआ। इसी तरह पंजाब में पंजाबी तथा हिंदी की समस्या ने सामाजिक तनाव में वृद्धि की। दक्षिण भारत में तो कई राजनीतिक दलों ने भाषावाद की आग में रोटियां सेंककर अपनी सियासत चमकायी और हिंदी के विरुद्ध जबरदस्त मोर्चाबंदी की। 1965 में जब हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिश की गयी तो गैर हिंदी भाषी राज्यों का पारा चढ़ गया। हिंदी विरोधी तेवर ने तो तमिलनाडु को हिलाकर रख दिया था।

आज भी जब तमिलनाडु में हिंदी या संस्कृत को लाने की हल्की-सी सुगबुगाहट होती है तमिलनाडु के सियासी दल भड़क जाते हैं और भाषा के सवाल पर सियासत साधना शुरू कर देते हैं। उन्हें भाषा की अस्मिता पर लोगों से वोट मांगने का मौका मिल जाता है। यह स्थिति ठीक नहीं है। इससे कुल मिलाकर देश का ही नुकसान हो रहा है। उचित होगा कि देश के सभी सियासी दल जाति, मजहब और भाषा की सियासत को तिलांजलि देकर जनसरोकारी मसले पर अपनी आवाज को धार दें। उन्हें समझना होगा कि कोई भी जातिगत और मजहबी भावना राष्ट्र के भविष्य से बढ़कर नहीं है।
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