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आकाश से एक संवाद

शाम की ढलती हुई बेला थी। मैं अपनी छत पर आराम कुर्सी पर लेटा हुआ था। मेरी दृष्टि ऊपर तनी उस अनंत नीलिमा पर टिकी थी ! न कोई आकार, न कोई सीमा, और न ही कोई हलचल। बस एक विराट शून्य। मन में सहज ही प्रश्न उठा कि स्वयं इतना खाली है, उससे क्या संवाद किया जाए? जिज्ञासा तीव्र से तीव्रतर होती चली गई और कब मेरा चित्त उस नीले विस्तार पर केंद्रित होकर उसमें एकाकार हो गया, पता ही नहीं चला।

तभी अंतर्मन के किसी कोने से एक आवाज आई- शून्य रिक्त नहीं है, यह तो अनंत संभावनाओं से भरा है। इसी बोध के साथ आकाश से मेरा एक मौन संवाद शुरू हो गया। मैंने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए पहला प्रश्न किया- हे व्योम ! संसार का हर शोर, हर मधुर संगीत और हर हृदयवेधी चीख तुम्हारे ही विस्तार में स्पंदित होती है। फिर भी तुम स्वयं इतने खामोश कैसे रह लेते हो? तुम्हारे भीतर यह गहन सन्नाटा क्यों पसरा है? क्या यह एक अद्भुत विरोधाभास नहीं है कि ध्वनि का आधार होकर भी तुम मौन हो ?

मौन में अनंत संभावनाएँ : आकाश का दर्शन

आकाश का उत्तर किसी बाहरी स्वर में नहीं, बल्कि मेरे अंतर्मन में एक शांत विचार की तरह उतरा, मानो उस विराट सन्नाटे ने ही स्वयं को शब्दों में ढाल लिया हो- ‘सुनो जिज्ञासु ! जिसे तुम मेरा सन्नाटा समझ रहे हो न, वह तो वास्तव में मेरी असीमता और पूर्णता का एक विस्तार है। जरा सोचो, अगर प्याला पहले से ही पानी से भरा है, तो उसमें और अधिक जल कैसे समा सकता है? मैं शून्य हूँ, इसीलिए मैं सबको ग्रहों, नक्षत्रों, बादलों और यहाँ तक कि तुम्हारी साँसों को भी स्थान दे पाता हूँ। मेरा रिक्त होना ही मेरा होना है और यही मेरी सबसे बड़ी सार्थकता है।’

अब आकाश को सुनने के लिए मेरा अन्तर्मन मौन हो गया। आकाश ने एक और गहरा सत्य उद्घाटित करते हुए कहा- ‘मेरा मौन ही वह धरातल है, जिस पर सृष्टि का हर नाद और हर स्पंदन जन्म लेता है। मैं उस कोरे कागज़ की तरह हूँ, जो स्वयं मौन रहकर भी हर शब्द को अस्तित्व प्रदान करता है। मेरा सन्नाटा कोई अभाव नहीं, बल्कि वह अनंत संभावना है, जहाँ से हर ध्वनि प्रकट होती है और अंततः मुझी में विलीन हो जाती है।’ आज आकाश ने जीवन का एक व्यावहारिक सूत्र दिया- ‘देखो मेरे भीतर काले बादल आते हैं, प्रचंड आंधियाँ चलती हैं और सूर्य का ताप भी होता है, लेकिन क्या कभी काले बादलों से, आँधियों से मैं मैला हुआ ? क्या मैं कभी तूफानों से या ताप से विचलित हुआ ? नहीं! मैं केवल एक साक्षी भाव में रहता हूँ।

आकाश से सीख : शांति और मुक्त आत्मा का साक्षी भाव

मैं सबको आश्रय देता हूँ, पर किसी से बंधता नहीं। मेरा यह शून्य तुम्हें यही कहता है कि तुम भी अपने अंदर एक ऐसा आकाश निर्मित करो, जहाँ सुख-दुःख के बादल आएँ और चले जाएँ, पर तुम्हारी आत्मा का नीला विस्तार सदैव अछूता और निश्चल रहे।’ आकाश से यह मौन संवाद समाप्त होते-होते मेरे विचारों का कोलाहल भी धीरे-धीरे शांत होकर किसी गहरे सन्नाटे में विलीन हो गया।

डॉ. मधुसूदन शर्मा

मुझे समझ में आ गया कि हम जीवन भर बाहर की परिस्थितियों को बदलने में लगे रहते हैं, कभी शोर को शांत करने, दुःख को हटाने तो कभी सुख को थामे रखने में। पर आकाश सिखाता है कि वास्तविक जीवन परिस्थितियों को रोकना नहीं, बल्कि उन्हें भोले भाव से देखने में है। आकाश कभी बादलों को रोकता नहीं, बस उन्हें आने-जाने देता है। वैसे ही हमें भी भावनाओं और घटनाओं को साक्षी भाव से देखने की कला सीखनी चाहिए। आज शाम मैंने जाना कि शांति बाहर नहीं, भीतर के शून्य में बसती है और जो इस शून्य से मित्रता कर लेता है, वही वास्तव में मुक्त हो जाता है।

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