भारतीय नववर्षों का सांस्कृतिक संगम – गुड़ी पाड़वा, उगादी, चेतीचंद और नवरेह
गुड़ी पाड़वा, उगादी, नवरेह और चेतीचंद, दरअसल ये अलग-अलग समाजों में मनाये जाने वाले भारतीय नववर्षों का समुच्चय है। इनमें गुड़ी पाड़वा प्रमुख है, जो आस्था और संस्कृति के मिले-जुले प्रतीक के रूप में महाराष्ट्र और गुजरात में प्रमुखता से मनाया जाता है। यह और इसके साथ मनाये जाने वाले सभी पर्व दरअसल भारतीय महादेश के अलग-अलग हिस्सों में नववर्ष जैसी शुरूआत के आस्था पर्व हैं। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गुड़ी पाड़वा का पर्व मनाया जाता है, जिस दिन देश के सभी हिस्सों में चैत्र मास के नवरात्रों का प्रारंभ होता है। भारतीय पंचांग के मुताबिक यह वह दिन होता है जब नए संवत्सर की शुरूआत होती है।

साल 2026 में अलग-अलग क्षेत्रों में मनाये जाने वाले ये सभी सांस्कृतिक पर्व 19 मार्च 2026 को मनाये जाएंगे और इसी दिन से हिंदू पंचांग के मुताबिक विक्रम संवत का नया वर्ष शुरू होगा, जो अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। वैसे गुड़ी पाड़वा का बहुत व्यापक धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। माना जाता है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इसलिए यह सृष्टि के आरंभ दिन के कारण भी नववर्ष और नवजीवन का प्रतीक दिन है।
विजय ध्वज के रूप में गुड़ी फहराने की परंपरा
एक अन्य कथा के मुताबिक इसी दिन भगवान राम की अयोध्या वापसी हुई थी और रावण पर विजय की स्मृति ने अयोध्या के लोगों ने घरों के बाहर विजय ध्वज फहराये थे, जो आगे चलकर गुड़ी के रूप में प्रचलित हो गए। महाराष्ट्र में गुड़ी पाड़वा को इसी दिन के प्रतीक के रूप में देखते हैं। इसलिए लोग घरों के बाहर पांरपरिक विजय ध्वज यानी गुड़ी फहराते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस दिन घर के बाहर यह गुड़ी अर्थात विजय ध्वज फहराने से जीवन की तमाम नकारात्मक शक्तियां घर से दूर रहती हैं।

महाराष्ट्र में विशेषकर महिलाएं इस दिन नौवारी साड़ी पहनकर और पारंपरिक रूप से सज-धजकर इस पर्व को मनाती हैं। कई जगहों पर इस दिन सांस्कृतिक जुलूस निकलते हैं, जिनमें लोकनृत्य और लोकसंगीत की धूम होती है। महाराष्ट्र और गुजरात के अलावा गोवा और कोंकण क्षेत्र में भी गुड़ी पाड़वा का न केवल धार्मिक, बल्कि विस्तृत सांस्कृतिक महत्व है। जबकि कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में इसी दिन गुड़ी पाड़वा की तरह उगादी का पर्व मनाया जाता है, कश्मीर में विशेषकर कश्मीरी पंडित इस दिन नवरेह का पर्व मनाते हैं, जबकि सिंधी समुदाय इस दिन को चेतीचंद के रूप में मनाता है।
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विविध पर्व एक ही सांस्कृतिक इंद्रधनुष के हिस्से
बहरहाल, ये अलग-अलग सांस्कृतिक पर्व एक ही सांस्कृतिक इंद्रधनुष के हिस्से होते हैं। जहां तक गुड़ी पाड़वा की बात है तो इसे गुड़ी स्थापित करने की परंपरा के रूप में मनाया जाता है। गुड़ी वास्तव में एक विशेष प्रकार का ध्वज होता है, जिसे घर के बाहर ऊंचे स्थान पर लगा दिया जाता है। इसे बनाने के लिए बांस की लंबी लकड़ी ली जाती है और उसके ऊपर रंगीन रेशमी कपड़ा बांधा जाता है। इस कपड़े के ऊपर चांदी या तांबे का कलश उलटा रखकर फूलों और नीम, आम की पत्तियों से उसे सजाया जाता है तथा इसे घर के प्रवेश द्वार या खिड़की के पास लगाया जाता है। यह विजय, समृद्धि और शुभ्रता का प्रतीक होता है।

महाराष्ट्र में इस दिन जो पकवान खास तौरपर बनते हैं, उनमें पूरनपोली, श्रीखंड और साबूदाना की विभिन्न डिशें होती हैं। लोग इन विशेष पकवानों के साथ मंदिरों में जाकर पूजा करते हैं और इस दिन की शुरूआत नए व शुभ कार्यों से करते हैं। कुल मिलाकर गुड़ी पाड़वा घर के बाहर लगाए जाने वाले गुड़ी यानी विजय ध्वज का प्रतीक होता है। यह इसलिए घर के बाहर लगाया जाता है ताकि साल की शुरूआत बेहद सकारात्मक हो और पूरे साल आशा, उत्साह का संचार बना रहे।
धीरज बसाक
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