स्क्रीन के जाल में फँसता जीवन

वर्तमान में हम आधुनिक टेक्नोलॉजी से लैस एक ऐसा कृत्रिम जीवन जी रहे हैं, जो वास्तविकता से बहुत दूर है। जैसे सिगरेट का धुआँ माहौल को ज़हरीला बना देता है, वैसे ही टीवी पर आने वाले ढेरों कार्पाम घंटों बैठकर देखना सिगरेट के धुएँ में साँस लेने के बराबर है। ऐसा करना खतरे से खाली नहीं, खासकर बच्चों के लिए जो अपनी माँ से ज्यादा टीवी और कंप्यूटर के नजदीक हैं।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, टीवी 21वीं सदी का नया अभिभावक बन गया है, जो जनता के सोच-विचार को ढालता है। टीवी में दिखाए जाने वाले जुर्म और हिंसा से संबंधित कार्यक्रमों की जाँच से यह पता चला है कि खून-खराबा से भरपूर दृश्यों को देखते रहने से एक बच्चे की सीखने की काबिलियत और ज़िंदगी में कुछ कर दिखाने का इरादा कमजोर हो जाता है और वह दूसरों का दर्द महसूस नहीं कर पाता।

यह सब सुनने व पढ़ने के पश्चात किसी के भी मन में स्वाभाविक यह प्रश्न उठेगा कि क्या सचमुच टीवी के रूप में हमने अपने घर में मौत का सामान जुटा रखा है? नहीं! ऐसी कोई बात नहीं है, किन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं है कि हम लगातार बैठकर टीवी देखते रहें। हम शोधकर्ताओं के सुझावों को अपनी जीवनशैली की प्रक्रिया से जोड़ कर देखेंगे तो हमारे लिए उसमे छुपे संदेश को समझना आसान होगा।

पुरानी आदतें, बेहतर सेहत

मसलन, हमारे पूर्वजों के समय टीवी या अन्य तकनीकी साधन उपलब्ध नहीं थे तब भी वे लोग आज की पीढ़ी के मुकाबले अधिक स्वस्थ और सुखी थे, क्योंकि वे अपनी दिनचर्या संतुलित तरीके से गुजारते थे, जिससे उनका शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य उच्च का बना रहता था। यदि हम उनके मुकाबले में अपना वर्तमान देखें तो पता चलेगा कि हमारी दुर्दशा के मुख्य कारक कौन-से हैं। हममें से कितने लोग मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी को छोड़कर दिन में दो घंटा शारीरिक श्रम करते होंगे?

हम अपने शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए क्या करते हैं? हमें यह समझना चाहिए कि टीवी देखना कोई बुरी बात नहीं है, किन्तु इसके साथ यह भी ज्ञात होना चहिए कि उससे हमारी शारीरिक गतिविधियाँ कम हो जाती हैं, जो हमारे लिए खतरे की घंटी है। आधुनिक शहरों में ऐसी शामें नहीं दिखती हैं, जब चार पड़ोसी साथ मिल कर टहलने या चाय की चुस्कियों पर दुनियाभर के मसलों पर बहस करते थे।

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राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंज

याद रखें, टीवी देखना एक तरफा सड़क समान है, जो हमें अपने अंत की ओर नजदीक ले जाती है। इसलिए बेहतरी इसी में है कि दिल बहलाने के लिए टीवी की बजाय कोई ऐसी गतिविधियों से खुद को जोड़ा जाए, जो हमारे भीतर के तनाव को कम करे, तो देर किस बात की? छोड़िए रिमोट और निकलिए घर से बाहर, खुद के लिए ना सही, पर अपने परिवार और अपने दिल के खातिर ही सही!

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