संसदीय राजनीति का नया हथियार
लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में विपक्ष ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हटाने का नोटिस जमा किया है। इंडिया गठबंधन के साथ आम आदमी पार्टी के सांसदों ने मिलकर कुल 193 हस्ताक्षर (लोकसभा में 130 प्लस राज्यसभा में 63) जुटाए हैं। यह संख्या न्यूनतम आवश्यकता (लोकसभा 100, राज्यसभा 50) से कहीं अधिक है। टीएमसी की अगुवाई में यह कदम लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ख़ारिज होने के ठीक बाद आया है।
इसमें पद पर पक्षपातपूर्ण एवं भेदभावपूर्ण आचरण, चुनावी धोखाधड़ी की जाँच में जानबूझकर बाधा, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के ज़रिए बिहार और पश्चिम बंगाल में लाखों मतदाताओं (ख़ासकर ग़रीब, अल्पसंख्यक और प्रवासी) को मताधिकार से वंचित करना तथा सत्ताधारी दल को प्रत्यक्ष फायदा पहुँचाना जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। संवैधानिक दृष्टि से यह प्रस्ताव गंभीर परीक्षा है।
संविधान चुनाव आयोग को पूर्ण स्वतंत्रता देता है और निर्वाचन प्रक्रिया को मूल संरचना का हिस्सा मानता है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त हटाने की प्रक्रिया को जानबूझकर अति कठिन बनाया गया, ताकि राजनीतिक दबाव से संस्था बची रहे। याद रहे कि 2023 के मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति) अधिनियम ने नियुक्ति प्रक्रिया में मुख्य न्यायाधीश की भूमिका कम कर दी थी, जिसकी विपक्ष ने पहले से आलोचना की थी। अब हटाने का यह कदम उसी असंतुलन का परिणाम लगता है।
विपक्ष का आरोप: फैसलों से सत्तापक्ष को मिला फायदा
विपक्ष का कहना है कि एसआईआर प्रक्रिया में दस्तावेजों का बोझ ग़रीब मतदाताओं पर पड़ा, जिससे बिहार विधानसभा चुनाव 2025 और पश्चिम बंगाल 2026 से पहले अनेक नाम कटे। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप कर आधार को वैध प्रमाण मानने और अपील तंत्र बनाने का आदेश दिया। फिर भी विपक्ष का मानना है कि मुख्य आयुक्त ने जाँच में बाधा डाली और फैसले सत्तापक्ष को फायदेमंद रहे। उसके अनुसार, यह नागरिकता परीक्षा नहीं, बल्कि संवैधानिक कर्तव्य का उल्लंघन है। वह इसे लोकतंत्र पर हमला बताता है। आम नागरिक को लगता है कि ये आरोप राजनीतिक तो ज़रूर हैं, लेकिन शायद पूरी तरह निराधार भी नहीं!
इसके बावजूद, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का यह नोटिस प्रतीकात्मक से अधिक ख़तरनाक प्रतीत होता है। सत्तारुढ़ एनडीए के पास स्पष्ट बहुमत है, इसलिए प्रस्ताव का पास होना असंभव है। फिर भी यह संसद को राजनीतिक मंच बनाता है और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है – भले ही आरोप साबित न हों। जनता का विश्वास एक बार डगमगाया तो लोकतंत्र की नींव हिल जाएगी। सयाने बता रहे हैं कि 75 वर्षों में कभी ऐसा नहीं हुआ, 2009 में एक चुनाव आयुक्त के खिलाफ सिफारिश हुई थी, लेकिन संसद तक नहीं पहुँची।
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विपक्ष का अंतिम हथियार: मुख्य निर्वाचन आयुक्त हटाने का नोटिस
आज विपक्ष अंतिम हथियार इस्तेमाल कर रहा है, जबकि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पहले से ही सक्रिय है। बेहतर होता कि विपक्ष न्यायिक रास्ता अपनाता – जनहित याचिका दायर कर या सार्वजनिक डेटा माँगकर। संसदीय महाभियोग का ड्रामा संस्था को कमज़ोर करता है, मज़बूत नहीं। समस्या गहरी है। 2024 के बाद से चुनाव आयोग पर पक्षपात के आरोप लगातार बढ़े हैं।
नियुक्ति की प्रक्रिया में सुधार और मतदाता सूची की पारदर्शिता ज़रूरी है। विपक्ष को चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का सख्ती से पालन कराए और जनता के सामने तथ्य रखे। सत्ता पक्ष को भी आरोपों को सीधे ख़ारिज करने के बजाय स्वतंत्र जाँच का स्वागत करना चाहिए। कुल मिलाकर, यह प्रस्ताव संवैधानिक नैतिकता की परीक्षा है। यदि विपक्ष मात्र राजनीति कर रहा है तो यह चुनाव आयोग जैसी संस्था को राजनीतिक अखाड़ा बना देगा। मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर हमला आसान है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि स्वतंत्र निर्वाचन प्रक्रिया देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पूँजी है। बेहतर हो कि दोनों ही पक्ष इसे राजनीतिक हथियार बनाने से बाज आएँ!
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