बारूद का ढेर, शांति की आस और नैतिकता का संकट

अमेरिका और ईरान के बीच अस्थायी युद्धविराम की घोषणा हुई है, तो दुनिया ने राहत की साँस ली है। अपनी-अपनी हार को जीत दिखाने की चालाकी के बीच आई यह शांति फिलहाल उन मिसाइलों को थामने में सफल रही है, जो पिछले कुछ हफ्तों से मध्य-पूर्व के आसमान को लाल कर रही थीं। लेकिन यह शांति जितनी स्वागत योग्य है, उतनी ही भंगुर भी। यह संघर्ष केवल दो राष्ट्रों की सैन्य मुठभेड़ नहीं न! इसे तो आधुनिक युग में युद्ध-नैतिकता और मानवाधिकारों के पूर्ण पतन का भयावह अध्याय कहना भी शायद ही ग़लत हो!

कहना न होगा कि इस युद्ध ने एक बार फिर इस क्रूर सत्य को स्थापित किया है कि जब दो बड़ी ताकतें टकराती हैं, तो सबसे भारी कीमत निर्दोष नागरिक ही चुकाते हैं। हालिया संघर्ष के दौरान सामने आई मानवीय क्षति की खबरें रूह कंपा देने वाली हैं। मात्र 40 दिन के संघर्ष में हजारों की संख्या में नागरिक हताहत हुए हैं। दक्षिणी ईरान के रिहायशी इलाकों और शैक्षणिक संस्थानों पर हुए हमलों ने युद्ध के उस मौलिक सिद्धांत के तो परखच्चे ही उड़ा दिए हैं, जो सैन्य और नागरिक ठिकानों के बीच भेद करने की वकालत करता है।

मानवाधिकार उल्लंघन और सूचनाओं पर प्रतिबंध

मानवाधिकारों का यह हनन केवल बमबारी तक सीमित नहीं रहा; युद्ध की आड़ में सूचनाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों और आंतरिक दमन ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। वहीं, पड़ोसी देशों में मची तबाही और विस्थापन ने इस युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव को स्पष्ट कर दिया है। युद्ध-नैतिकता के नजरिए से देखें तो यह संघर्ष न्यायपूर्ण युद्ध के हर पैमाने पर विफल रहा है।

नागरिक बुनियादी ढांचों – बिजली घर, जल आपूर्ति संयंत्र और परिवहन लाइनों – को सोची-समझी रणनीति के तहत निशाना बनाया गया। किसी भी सभ्य समाज में सैन्य कार्रवाई का उद्देश्य दुश्मन की सैन्य क्षमता को कमजोर करना होता है, न कि उसकी पूरी सभ्यता को अंधकार में धकेलना! दूसरी ओर, जवाबी कार्रवाई के नाम पर दूतावासों को निशाना बनाना और होर्मुज जल-डमरू-मध्य जैसे महत्वपूर्ण वैश्विक व्यापारिक मार्गों को अवरुद्ध करना आर्थिक अनैतिकता की पराकाष्ठा थी।

इसने न केवल युद्ध में शामिल देशों को प्रभावित किया, बल्कि दुनिया के उन सबसे गरीब हिस्सों को भी भुखमरी और महंगाई के गर्त में धकेल दिया, जिनका इस विवाद से कुछ लेना-देना नहीं था – न प्रत्यक्ष, न परोक्ष। इस अविवेकपूर्ण संघर्ष ने वैश्विक समुदाय को जो सबक दिए हैं, वे आने वाले दशकों तक प्रासंगिक रहेंगे। सबसे बड़ा सबक यह है कि बिना किसी स्पष्ट उद्देश्य और एग्जिट प्लान के शुरू किया गया युद्ध केवल शून्य की ओर ले जाता है!

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युद्धविराम: जीत नहीं, रणनीतिक विफलता की स्वीकारोक्ति

यह अस्थायी युद्धविराम किसी पक्ष की विजय का प्रमाण नहीं, बल्कि इस रणनीतिक विफलता की स्वीकारोक्ति है कि बल प्रयोग से जटिल राजनीतिक मसले हल नहीं किए जा सकते! इसके अतिरिक्त, इस संकट ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की असुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की लाचारी को भी उजागर किया है। संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन जब जिद्दी ताकतों के अहंकार के सामने मूक दर्शक बन जाते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय कानूनों की प्रासंगिकता पर सवाल खड़ा होना अनिवार्य है!

अंततः, यह अस्थायी युद्धविराम केवल एक पॉज बटन की तरह है। यदि इस समय का उपयोग ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्र में दीर्घकालिक सुरक्षा चिंताओं के समाधान के लिए नहीं किया गया, तो बारूद के ढेर पर बैठी यह शांति फिर से कभी भी स्वाहा हो सकती है। दुनिया अब और अधिक गलत अनुमानों या सैन्य दुस्साहस का बोझ उठाने की स्थिति में नहीं है। मानवता को यह समझना होगा कि युद्ध कभी अंतिम समाधान नहीं होता; वह केवल नई, अधिक पेचीदा और नफरत भरी समस्याओं का जन्मदाता होता है। दो हफ्ते की शांति का यह छोटा सा झरोखा संवाद की मेज तक पहुंचने का एक दुर्लभ अवसर है, जिसे गंवाना पूरे विश्व के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता है।

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