समझदारी से समाधान
एक सूफी संत थे। वे चाहते थे कि उनकी मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर उनके तीन शिष्य आपस में न लड़ें। अत उन्होंने एक वसीयत की, जो सबसे वृद्ध शिष्य है, उसे कुल ऊंटों में से आधे ऊंट मिलें। प्रौढ़ शिष्य को एक तिहाई ऊंट तथा सबसे छोटे शिष्य को कुल ऊंटों का नौवां भाग मिले।
सूफी की मृत्यु के बाद वसीयत पढ़ी गई, तो सब अचरज में पड़ गये। वसीयत के अनुसार ऊंटों का बंटवारा हो ही नहीं सकता था। किसी ने कहा, इस वसीयत में जरूर कोई राज़ है। तीनों शिष्य हजरत अली के पास पहुंचे। हजरत अली उनकी समस्या सुनकर पहले मुस्कराये, फिर बोले, इसमें कोई परेशानी की बात नहीं। मैं अपनी ओर से एक ऊंट और मिला देता हूं।
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तब बंटवारा हो जायेगा। फिर अली ने ऊंटों का बंटवारा कर दिया। सबसे वृद्ध शिष्य को 9 ऊंट मिले। दूसरे को कुल ऊंटों का एक तिहाई हिस्सा यानी 6 ऊंट मिले। सबसे छोटे शिष्य को कुल ऊंटों का नौवां हिस्सा अर्थात 2 ऊंट मिले। सत्रह ऊंटों का इस तरह बंटवारा होने के बाद हजरत अली ने अपना ऊंट वापस ले लिया।
राजकिशन नयन
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