स्वयं के अनुसार निर्भय और निर्विकार रहना ही मुक्ति : सद्गुरु रमेशजी
हैदराबाद, भीतरी-बाहरी व्यक्तियों, वस्तुओं या परिस्थितियों से प्रभावित न होते हुए स्व यानि स्वयं अर्थात् आत्म के अनुसार निर्भय और निर्विकार रहना ही मुक्ति है। उक्त उद्गार सद्गुरु रमेशजी ने जनवाड़ा स्थित पूर्णानंद केंद्र में रिपब्लिक डे विशेष सत्संग में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जैसे 26 जनवरी, 1930 को ही राष्ट्रीय नेशनल कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज की घोषणा कर दी थी, इसी तरह हमें भी अभी और इसी पल हम पूर्ण रूप से मुक्त हैं यह ज्ञान धारण कर इसकी घोषणा करनी चाहिए।
घोषणा करने का अर्थ है कि हमारे मन, बुद्धि, आचार-विचार- व्यवहार और भाव में मुक्ति बसने लगी है। वास्तविकता यह है कि हम सब मुक्त ही हैं, गुरु केवल हमारा ध्यान इस और दिलाते हैं कि हम संसार के ऊँच-नीच, सुख-दुःख, पाप-पुण्य, सही-गलत से नजर हटाकर अपनी दिव्यता पर ध्यान दें और उसका लाभ लें।
रमेशजी ने कहा कि सामान्य रूप से हमारे जीवन में निन्यानबे प्रतिशत सब अच्छा ही रहता है, लेकिन एक प्रतिशत यदि हमारा स्वास्थ्य प्रतिकूल है या धन की कमी है अथवा कोई अन्य परेशानी है, तो हम पूरा समय उसी पर फोकस करके सोचते रहते हैं और परमात्मा ने हमें जितनी अच्छी जिंदगी दी है, उसके लिए कभी उसका आभार प्रकट नहीं करते। प्रकृति के नियम के अनुसार हम जो सोचते रहते हैं, हमारे जीवन में वैसा-वैसा होता जाता है इसलिए हमें अपनी मुक्ति हेतु एक संविधान को जीवन में उतरना होगा। देश की पहले मुक्ति हुई, फिर संविधान बना, लेकिन मनुष्य संविधान से ही आत्मज्ञान पा सकता है और हमारे उद्धार के लिए संविधान लिखते और सिखाते हैं सद्गुरु।
रमेशजी ने निदिध्यासन को आत्मज्ञान का पहला सूत्र बताया
रमेशजी ने कहा कि आत्मज्ञान के संविधान का पहला सूत्र है निदिध्यासन। इसका अर्थ है कि हमारा मन, शरीर, बुद्धि, इंद्रियाँ, विचार-भाव आदि जो भी कुछ कर रहे हैं, वह मैं नहीं कर रहा, मैं तो शुद्ध चेतना हूँ, प्रतिपल इसमें सजग रहना है। सत्संग या ज्ञान के श्रवण, मनन और चिंतन से आत्मा या चेतना का निदिध्यासन होता है। दैनिक क्रियाओं जैसे भोजन करते समय हम सोचें कि मैं नहीं बल्कि यह शरीर खाना खा रहा है, मन विचार कर रहा है, बुद्धि सोच रही है, इंद्रियाँ अपना-अपना कार्य कर रही हैं, मैं कुछ नहीं कर रहा।
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संविधान का दूसरा सूत्र है जो आपको चाहिए वह आप दूसरों को दीजिए, जैसे धन, मान-सम्मान, प्रशंसा, सुख-सुविधा सहायता आदि। अपने जीवन का रिमोट भीतरी मन, बुद्धि, विचार या बाहरी व्यक्ति, वस्तु और परिस्थिति को मत दीजिए। बस मौन स्वराज का आनंद लीजिए। अवसर पर गुरु माँ ने संविधान में समभाव, स्वतंत्रता, स्वराज और बंधुत्व के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। आत्मज्ञान या मुक्ति के नारों, मन और बुद्धि की परेड का लाभ लेते हुए सभी साधकों ने मुक्ति का आनंद उठाया।
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