ज्ञान और मैत्री के पर्याय इतिहास पुरुष आचार्य हस्ती

युगमनीषी आचार्य हस्तीमल महाराज भारतीय श्रमण परंपरा के उज्ज्वल नक्षत्र थे। वि. सं. 1967 की पौष शुक्ला चतुर्दशी को राजस्थान के जोधपुर जिले के पीपाड़ शहर में उनका जन्म हुआ। उनके जन्म के दो माह पूर्व ही पिता ओसवालवंशीय केवलचंद बोहरा प्लेग की चपेट में आकर परलोक सिधार गए। इस घटना से उनकी माँ रूपादेवी को इस संसार से विरक्ति हो गई। इसी भाव के साथ उन्होंने बालक हस्तीमल का पालन-पोषण करते हुए धर्म-संस्कार प्रदान किए।

कुछ ही वर्षों के अंतराल में हस्ती के नाना गिरधारीलाल मुणोत तथा दादी नौज्यांबाई का देहांत हो गया। जन्मजात वैरागी बालक हस्ती के चित्त पर इन घटनाओं का गहरा असर हुआ। उनका वैराग्य दृढ़ से दृढ़तर बनता गया। वि.सं. 1977 की माघ शुक्ला द्वितीया को अजमेर में महज 10 वर्ष की बालवय में आचार्य शोभाचंद्र महाराज से वैरागी हस्तीमल ने मुनि जीवन अंगीकार कर लिया। उनकी वीरमाता रूपादेवी तथा अन्य दो मुमुक्षुओं ने भी दीक्षा लेकर संयम की राह अपना ली। उनके दीक्षा समारोह में जैन दिवाकर मुनि चौथमल और आचार्य मन्नालाल की उपस्थिति रही।

19 वर्ष की आयु में रत्नसंघ के सप्तम आचार्य बने हस्ती

ज्ञानमुनि के अनुसार जैन दिवाकर ने मुनि हस्तीमल के प्रभावक भविष्य का कथन कर दिया था, जो बिल्कुल सही सिद्ध हुआ।
दीक्षा के उपरांत ही मुनि हस्तीमल ने जैनागम, प्राच्य भाषा, इतिहास, दर्शन और साहित्य का अध्ययन शुरु कर दिया। बचपन से ही विशिष्ट योग्यता, क्षमता व प्रतिभा के धनी बालयोगी मुनि हस्तीमल का श्री शोभाचार्य ने मात्र साढ़े पंद्रह वर्ष की वय में संघ नायक के रूप में चयन कर लिया।

थोड़े ही समय में उनका ज्ञान-ध्यान इतना अनुत्तर बन गया। मात्र 19 वर्ष की वय में वि. सं. 1987 की वैशाख शुक्ला तीज (अक्षय तृतीया) को जोधपुर में उन्हें स्थानकवासी परंपरा के रत्नसंघ के सप्तम आचार्य के रूप में अभिसिक्त किया गया। विद्या और आचरण के अद्भुत संगम आचार्य हस्ती का व्यक्तित्व अपार आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा और कृतित्व बहुआयामी था। सामायिक साधना के द्वारा समभाव प्राप्ति का संदेश देने के साथ उन्होंने लाखों लोगों को स्वाध्याय से जोड़कर समाज में मैत्री और ज्ञान का नव आलोक प्रसारित किया।

जैन इतिहास के मौलिक लेखक और प्रभावी प्रवचनकार

व्यसनमुक्ति, कुरीति उन्मूलन, नारी शिक्षा जैसे अनेक कदम उन्हें एक समाज सुधारक के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। करुणा के सागर आचार्य हस्ती के आभामंडल में आया हुआ हर श्रद्धालु अपने आपको बड़ा ही सौभाग्यशाली मानता था। प्राचीन भाषा और लिपि के विशेषज्ञ आचार्य हस्ती का जीवन उनके जीवनकाल में ही इतिहास बन गया था। अथक श्रम और प्रचुर प्रामाणिक संदर्भों के साथ लगभग साढ़े तीन हजार पृष्ठों में लिखित और चार भागों विभक्त जैन धर्म का मौलिक इतिहास ग्रंथ जैन धर्म और भारतीय समाज के लिए उनका अमर अवदान है।

इतिहास लेखन के लिए उन्होंने लंबे विहार किए और सभी संप्रदायों के मुनियों तथा विद्वानों से संपर्क किया। जब उन्हें पता चला कि दक्षिण भारत में जैन इतिहास और पुरातत्व से संबंधी अनेक स्रोत और संदर्भ उपलब्ध हैं तो वे पाद-विहार करके दक्षिण भारत पधारे। यहाँ उन्होंने 1980 में मद्रास (तमिलनाडु) और 1981 में रायचूर (कर्नाटक) में चातुर्मास किए। इतिहास के अतिरिक्त उन्होंने कई जैन शास्त्रों का संपादन और अनुवाद किया तथा पद्यानुवाद करवाया। संस्कृति और अध्यात्म की गहरी अनुभूतियों से अनुप्राणित काव्य उन्होंने रचे। वे एक कुशल और प्रभावी प्रवचनकार थे। उनके प्रेरक प्रवचनों का संकलन गजेन्द्र व्याख्यानमाला शीर्षक से सात भागों में प्रकाशित हुआ।

70 चातुर्मास, अखिल भारतीय जैन विद्वत् परिषद् के प्रणेता

गुणानुरागी आचार्य हस्ती विद्वत्ता और विद्वानों का बड़ा समादर करते थे। वे धनपतियों को विद्वत् निर्माण और विद्वानों का यथेष्ट समादर करने की प्रेरणा देते थे। समाज में विद्वानों और साहित्यकारों का समुचित मान-मूल्यांकन हो तथा उन्हें अच्छा मंच मिले, इसके लिए उनकी प्रेरणा से श्री अखिल भारतीय जैन विद्वत् परिषद् की स्थापना हुई। उनका मानना था कि धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिए शास्त्र-रक्षा आवश्यक है।

-डॉ. दिलीप धींग

राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु आदि क्षेत्रों में विचरण करते हुए, आचार्य हस्ती ने कुल 70 चातुर्मास किए। राजस्थान में पाली जिलांतर्गत ग्राम निमाज में 21 अप्रैल 1991 को 13 दिवसीय तप-संथारे के साथ वे इस नश्वर देह को छोड़कर देवलोकगमन कर गए। उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप 22 अप्रैल, 1991 को संपूर्ण राजस्थान में अमारि प्रवर्तन करवाया गया। जन्म और जीवन की तरह उनका महाप्रयाण भी एक इतिहास बन गया।

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