जानलेवा न बन जाए एआई द्वारा दी गई हेल्थ सलाह!
डिजिटल युग में स्वास्थ्य संबंधी जानकारी हमारी उंगलियों पर उपलब्ध है। हल्का सिरदर्द हो, बुखार आए या कोई असामान्य लक्षण दिखे, बहुत से लोग अब सीधे डॉक्टर के पास जाने के बजाय एआई टूल्स और सोशल मीडिया का सहारा लेते हैं। दिल्ली के 58 वर्षीय संजय शर्मा, जिन्हें ब्रेन स्ट्रोक के बाद नियमित दवाइयाँ लेनी पड़ती हैं, नई दवा मिलने पर पहले एआई से उसकी जानकारी जांचते हैं। इसी तरह 28 वर्षीय अभिषेक हल्की बीमारी होने पर ऑनलाइन एआई से सलाह ले लेते हैं। यह प्रकृत्ति तेजी से बढ़ रही है, लेकिन क्या यह सुरक्षित है?
क्यों बढ़ रहा है एआई पर भरोसा?
कोविड-19 के बाद टेलीमेडिसिन का चलन तेजी से बढ़ा। लोगों ने घर बैठे डॉक्टर से सलाह लेना सीखा। इसी के साथ चैटजीपीटी, गूगल बार्ड जैसे एआई टूल्स लोकप्रिय हुए। लोग एआई का उपयोग इसलिए कर रहे हैं क्योंकि:
- यह समय और पैसा बचाता है।
- तुरंत जवाब मिल जाता है।
- छोटी समस्याओं के लिए क्लिनिक जाने की जरूरत नहीं पड़ती।
- मेडिकल रिपोर्ट्स को सरल भाषा में समझने में मदद मिलती है।
विभिन्न सर्वेक्षणों के अनुसार 2023 की तुलना में 2024 में एआई सिम्पटम चेकर की खोज में 134 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हुई है। यानी सेहत की प्राथमिक जांच के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भरता बढ़ रही है।
एआई की सीमाएँ : अधूरी और संदर्भहीन सलाह
एआई उपयोगी है, लेकिन इसकी सीमाएँ भी गंभीर हैं। 2023 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार टेलीमेडिसिन या एआई आधारित सलाह लगभग 30 प्रतिशत मामलों में अधूरी या आंशिक रूप से गलत पाई गई। एआई सामान्य लक्षणों के आधार पर संभावनाएँ बताता है, लेकिन वह मरीज की पूरी मेडिकल हिस्ट्री, पारिवारिक रोग पृष्ठभूमि, एलर्जी या दवा प्रतिक्रिया तथा मानसिक तनाव और जीवनशैली आदि का समग्र मूल्यांकन नहीं कर सकता। मुंबई के वरिष्ठ पैथोलॉजिस्ट डॉ. राजेश बेंद्रे के अनुसार, अधिकांश एआई उपकरण पश्चिमी देशों के डेटा पर प्रशिक्षित हैं। भारतीय संदर्भ, खान-पान, जलवायु और आनुवंशिक विविधता को वे पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करते। इससे उनकी सटीकता सीमित हो सकती है।
सोशल मीडिया की फर्जी विशेषज्ञता
आज चैटजीपीटी, गूगल बार्ड और अन्य प्लेटफॉर्म पर कई लोग खुद को स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताकर सलाह दे रहे हैं। सफेद कोट पहनकर या गले में स्टेथोस्कोप डालकर वीडियो बनाना आसान है, पर उनकी योग्यता की पुष्टि करना मुश्किल। समस्या तब गंभीर हो जाती है जब लोग इन सलाहों को बिना जांचे-परखे मान लेते हैं। इस बीमारी में यह खाएं। इस लक्षण का मतलब यह गंभीर रोग है या डॉक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं आदि अप्रमाणित जानकारी अनावश्यक डर, गलत निष्कर्ष और स्वयं दवा लेने की प्रकृत्ति को बढ़ाती है। कई बार लोग मामूली लक्षण को गंभीर बीमारी समझकर घबरा जाते हैं या गंभीर लक्षण को साधारण मानकर नजरअंदाज कर देते हैं।
आत्म-निदान का खतरा
एआई से मिली अधूरी जानकारी के आधार पर स्वयं दवा लेना खतरनाक हो सकता है। हर मरीज की शारीरिक बनावट, वजन, उम्र और अन्य बीमारियाँ अलग होती हैं। डॉक्टर जांच के बाद ही दवा की मात्रा और प्रकार तय करते हैं। एआई विशेषज्ञ जसप्रीत बिंद्रा का मानना है कि डॉक्टर की निगरानी इस प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा होनी चाहिए। मानव चिकित्सक केवल बाहरी लक्षण नहीं देखते, बल्कि मरीज के तनाव, जीवनशैली और छुपे हुए संकेतों को भी समझते हैं। गलत दवा लेने से एलर्जी, ब्लड प्रेशर में उतार-चढ़ाव, किडनी या लिवर पर असर जैसे गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं। विशेषकर हृदय रोग, मधुमेह, स्ट्रोक या कैंसर जैसी बीमारियों में लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है।
एआई की सकारात्मक भूमिका
यह भी सच है कि एआई पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। इसकी कुछ उपयोगी भूमिकाएँ हैं –
- मेडिकल रिपोर्ट को सरल भाषा में समझाना
- डॉक्टर से पूछने के लिए प्रश्न तैयार करने में मदद
- स्वास्थ्य संबंधी सामान्य जानकारी देना
- नई रिसर्च और उपचार पद्धतियों के बारे में जागरूकता,
लेकिन इसे पहला कदम मानना ठीक है, अंतिम निर्णय नहीं।
क्या करें, क्या न करें?
क्या करें
- हल्की समस्या पर सामान्य जानकारी के लिए एआई का उपयोग करें।
- गंभीर लक्षण होने पर तुरंत डॉक्टर से मिलें।
- प्रमाणित टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म का उपयोग करें।
- किसी भी ऑनलाइन सलाह की योग्यता और स्रोत की जांच करें।
क्या न करें
- सोशल मीडिया की अप्रमाणित दवा न लें।
- एआई की सलाह को अंतिम सत्य न मानें।
- बिना जांच के दवा की मात्रा या प्रकार न बदलें।
एआई सहायक है, विकल्प नहीं
एआई तकनीक चिकित्सा क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला रही है, लेकिन यह मरीज को देखे बिना उसकी बीमारी की गंभीरता का सटीक आकलन नहीं कर सकता। सतर्क रहें, जागरूक रहें और अपने परिवार को भी समझाएँ कि एआई एक सहायक उपकरण है-डॉक्टर का स्थानापन्न नहीं।
-डॉ. माजिद अली
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