कालाष्टमी व्रत में रातभर करें जागरण
तिथि मुहूर्त
विक्रम पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 9 अप्रैल, गुरुवार की रात 9 बजकर 19 मिनट पर शुरु हो रही है, जो 10 अप्रैल, शुक्रवार की रात 11 बजकर 15 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर 10 अप्रैल को कालाष्टमी का व्रत करना शास्त्र सम्मत होगा।
हर महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर कालाष्टमी का व्रत किया जाता है। इस दिन भगवान शिव के रौद्र रूप भगवान भैरव की विधि-विधान से पूजा की जाती है। कालाष्टमी को भैरव अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक कालभैरव की पूजा करने से जातक के जीवन से भय दूर हो सकता है। कालाष्टमी का व्रत करने से बेहद शुभ फल प्राप्त होता है।
मंत्र
अतिक्रर महाकाय कल्पान्त दहनोपम,
भैरव नमस्तुभ्यं अनुज्ञा दातुमर्हसि।
ओम भयहरणं च भैरव:।
ओम भ्रं कालभैरवाय फट।
ओम कालभैरवाय नम:।
ओम ह्रीं बं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय ह्रीं।
पूजा विधि
कालाष्टमी की सुबह स्नानादि करके व्रत का संकल्प लें। घर के मंदिर में एक लकड़ी की चौकी पर लाल रंग का वस्त्र बिछाकर उस पर बाबा काल भैरव, शिवजी और मां पार्वती की तस्वीर स्थापित करें। पूजा घर में चारों ओर गंगाजल का छिड़काव करें। भगवान को ताजे पुष्पों की माला अर्पित करें। नारियल, इमरती, गेरु, मदिरा आदि चढ़ाएं। पूजा में एक चौमुखी दीपक अवश्य प्रज्वलित करें। कुमकुम या हल्दी से भगवान का तिल करें।
धूप-दीप दिखाकर विधि-विधान से पूजा करें। भगवान शिव, माता पार्वती और बाबा काल भैरव की आरती करें। पूजा में भगवान कालभैरव के मंत्रों का 108 बार जाप अवश्य करें। इस दिन शिव चालीसा और भैरव चालीसा का पाठ करना बेहद शुभ फलदायी माना जाता है। बटुक भैरव पंजर कवच का पाठ कर सकते हैं। कालाष्टमी की रात में काले तिल, दीपक, सरसों का तेल आदि से कालभैरव भगवान की पूजा करनी चाहिए। रातभर जागरण करना बहुत शुभ फलदायी माना जाता है।
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