बजरंगबली पवन पुत्र हनुमान सदैव मंगलकारी एवं सभी प्रकार के विघ्न-बाधाओं को समूल नष्ट करने वाले हैं। वे प्रभु श्रीराम के परमभक्त हैं और राम-काज के लिए हर पल तत्पर रहने वाले हैं। उन्होंने राम के परमधाम गमन के समय कथा श्रवण के लिए चिरंजीवी होने का वरदान मांगा था- यावद रामकथा वीर चरिष्यति मही तले।
तावच्छरीरे वत्स्यन्तु प्राण मम न संशय।। यशचैतरचरितं दिव्यं कथा के रघुनंदन तन्ममाप्सरसो राम श्रावये पुर्नरर्षभ।।
भगवान श्रीराम ने भी हनुमानजी को हृदय से आशीर्वाद दिया-
चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका।
तावत ते भविता कीर्ति:।।
अर्थात् हे कपिश्रेष्ठ! जब तक इस संसार में मेरी कथा प्रचलित रहेगी तब तक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी और तुम सशरीर जीवित रहोगे। रामायण रूपी महामाला के अनुपम रत्न के रूप में श्री हनुमानजी को अंकित किया गया है-
गोष्पदी कृत वारीशं मशकी कृत राक्षसम, रामायण महामाला रत्न वन्देनिलात्मजम।।
समुद्र लांघते समय समस्त प्राणियों को हनुमान महान पर्वत के समान विशालकाय, स्वर्णवर्ण, सूर्य सम मनोहर मुखवाले और महान सर्पराज के समान सुदीर्घ भुजाओं वाले दिखाई देने लगे। समुद्र-लंघन के समय जामवंत ने वानर सेना श्रेष्ठ श्रीहनुमान से कहा- वानर जगत के गौरव तथा संपूर्ण ज्ञात वेत्ताओं में श्रेष्ठ हनुमान तुम एकांत में चुपचाप क्यों बैठे हो? कुछ बोलते क्यों नहीं। तुम तो वानरराज सुग्रीव के समान परामी तथा बल में श्रीराम और लक्ष्मण के तुल्य हो।
हनुमानजी का जन्म और उनके सहोदर वानर भाईयों का परिचय
कश्यपजी के महाबली पुत्र और समस्त पक्षियों में श्रेष्ठ विनतानंद गरुड़ के समान तुम भी सुख्यात शक्तिशाली और तीव्रग्रामी हो। वानर शिरोमणि! तुम्हारा बल, बुद्धि, तेज और धैर्य भी समस्त प्राणियों में सबसे बढ़कर है। फिर भी तुम स्वयं ही समुद्र-लंघन के लिए तैयार क्यों नहीं होते? लोक-कथाओं से ज्ञात होता है कि हनुमानजी छ भाई थे, जिनमें सबसे बड़े हनुमान थे-
हनुमान, मतिमान, श्रुतिमान, केतुमान, गतिमान, धृतिमान। हनुमान अविवाहित ब्रह्मचारी थे, जबकि बाकी पांचों का विवाह हुआ था।
वानरराज केसरी ने अंजनी को पत्नी के रूप में अंगीकृत किया। अंजनी परम रूपवती थी। गर्भाधान के अनंतर प्रसवन संस्कार संपन्न हुआ और उनके गर्भ से हनुमान का जन्म हुआ। इसके अतिरिक्त अंजनी के अन्य पुत्र भी स्वर्ग लोक तथा भूलोक में विख्यात थे। ये पांचों भाई पुत्रों और पौत्रों से संपन्न थे। महाकवि गिरधर कृत गुजराती रामायण में वर्णन है कि अंजनी की तपस्या से प्रसन्न होकर रुद्र ने उन्हें वर मांगने को कहा, तब अंजनी ने उनसे तेजस्वी पुत्र की कामना की। भगवान रुद्रदेव शिवशंकर ने प्रसन्न होकर कहा, तुम धन्य हो, तुम्हारे उदर से ग्यारह रुद्र प्रकट होंगे। कालांतर में यही ग्यारहवें रुद्र हनुमानजी के नाम से प्रसिद्ध हुए।
-अंजनी सक्सेना
