अमेरिका : वैश्विक अराजकता का सूत्रधार !
अमेरिका और इजराइल के संयुक्त सैन्य हमलों ने ईरान को बुरी तरह झकझोर दिया है। फरवरी 2026 के अंत में शुरू हुए इस अभियान में ईरान के परमाणु ठिकानों, सैन्य कमांडरों और यहां तक कि सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई को निशाना बनाया गया। राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने इसे सैन्य अभियान करार दिया, युद्ध शब्द से परहेज किया; और दावा किया कि हमने जीत हासिल कर ली है! लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा जटिल है। ईरान की जवाबी कार्रवाई ने खाड़ी देशों तक हिंसा फैला दी, तेल की आपूर्ति बाधित हुई और वैश्विक बाजार हिल गए। ऐसे में सयाने एक गंभीर सवाल पूछ रहे हैं- क्या अमेरिका अब वैश्विक संरक्षक की भूमिका छोड़कर अराजकता का सूत्रधार और अंतरराष्ट्रीय माफिया बन बैठा है?
याद करें, दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने खुद को लोकतंत्र और स्थिरता का रक्षक बताया। संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, नाटो – ये सभी संस्थाएं उसी की अगुवाई में बनीं। लेकिन 21वीं सदी में उसकी कार्रवाइयां बार-बार एकतरफा और स्वार्थपूर्ण साबित हुई हैं। 2003 का इराक युद्ध, 2011 का लीबिया अभियान और अब ईरान – हर बार बहाने अलग रहे, नतीजा एक ही: क्षेत्रीय अस्थिरता, लाखों मौतें और शक्तिशून्यता का वैक्यूम।
परमाणु वार्ता विफल बताकर हमले को ठहराया जायज़
ईरान के मामले में ट्रंप प्रशासन ने परमाणु वार्ता को विफल बताकर हमले का औचित्य सिद्ध किया। निश्चय ही ईरान का परमाणु कार्यक्रम, हिजबुल्लाह-हूती जैसे प्रॉक्सी समूहों का समर्थन और क्षेत्रीय अस्थिरता वैश्विक चिंता का विषय है। लेकिन क्या इन समस्याओं का समाधान बिना संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के, बमबारी से निकलता है? युद्ध समाधान है ही नहीं। इतिहास गवाह है, जब-जब शक्ति का इस्तेमाल बिना अंतरराष्ट्रीय सहमति के हुआ है, तो वह लोकतंत्र की ढाल नहीं, साम्राज्यवाद का साधन बना है।
भारत के लिए यह स्थिति और भी चिंताजनक है। हम खाड़ी क्षेत्र से 60 प्रतिशत तेल आयात करते हैं। युद्ध की शुरुआत के साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में आग लग गई। इससे मुद्रास्फीति बढ़ी, रुपया दबाव में आया और वृद्धि दर के अनुमान घट गए। 2026 के लिए भारत की वृद्धि का अनुमान 7 प्रतिशत से 5.9 पर गिर गया। चाबहार बंदरगाह में हमारा निवेश, ईरान के साथ ऊर्जा साझेदारी और वहां काम करने वाले लाखों भारतीय श्रमिकों की सुरक्षा – सब पर असर पड़ा।
यह भी पढ़ें जलवायु बदलाव और युद्ध : दोहरे संकट में दुनिया
अमेरिका फर्स्ट नीति से खाड़ी में बिगड़ा शक्ति संतुलन
बेशक, ट्रंप की बेलगाम अमेरिका फर्स्ट नीति दुनिया के लिए घातक साबित हो रही है। उनकी प्रतिज्ञा है कि किसी भी कीमत पर ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने देना है। नतीजतन, खाड़ी में शक्ति संतुलन बिगड़ गया है। चीन और रूस इस वैक्यूम को भरने के लिए तैयार बैठे हैं। यदि अमेरिका खुद को अंतरराष्ट्रीय चौधरी मानकर एकतरफा फैसले लेता रहेगा, तो विश्व व्यवस्था टूटेगी, न कि मजबूत होगी। ईरान की जवाबी मिसाइलें और हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर दबाव इसका प्रमाण हैं।
लगता है, दोनों तरफ आतंकी ताकतें हैं, जो अपनी-अपनी जिद में दुनिया को तबाह करने पर आमादा हैं! ईरान भी तो क्षेत्रीय अस्थिरता को ही बढ़ावा दे रहा है। उसके बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और प्रॉक्सी युद्ध ने कई देशों को परेशान किया। इसलिए आलोचना सिर्फ अमेरिका की नहीं होनी चाहिए। सवाल यह है कि वैश्विक सुरक्षा की जिम्मेदारी अब कौन संभाले? संयुक्त राष्ट्र को मजबूत करने की जरूरत है, न कि उसे दरकिनार करने की।
ट्रंप का ईरान अभियान अमेरिका की बदलती छवि का प्रतीक है। वह अब वैश्विक संरक्षक नहीं, बल्कि अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने वाला स्वयंभू चौधरी बन गया है। लेकिन यह प्रदर्शन दुनिया को सुरक्षित नहीं, अराजक बनाता है। भारत जैसे देशों के लिए यह चेतावनी है कि बहुपक्षीय दुनिया में अपनी स्वायत्तता बनाए रखना ही एकमात्र रास्ता है। जब तक बड़े शक्तिशाली देश कानून के शासन के बजाय दादागिरी के शासन पर भरोसा करेंगे, तब तक वैश्विक स्थिरता एक सपना ही रहेगी।
अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।



