क्या संवैधानिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को हाईकोर्ट सीमित कर रहे हैं?

हमारा संविधान न्यूज़ मीडिया को बिना डर या पक्षपात के रिपोर्ट करने का अधिकार देता है। हालांकि निजी शिकायतकर्ताओं को अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन जब पुलिस प्रशासन स्वत ही एफआईआर दर्ज करने लगे, जैसा कि अनेक मामलों में देखा गया है तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को सीमित करने का गंभीर व चिंताजनक प्रयास है, जिस पर विराम लगना चाहिए क्योंकि, जैसा कि सलमान रुश्दी कहते हैं, कहानियां सुनाने की हमारी क्षमता पर हमला स़िर्फ सेंसरशिप नहीं है बल्कि हमारे मानव स्वभाव के विरुद्ध अपराध है।

मैं आपकी बात से सहमत नहीं हूं, लेकिन आपको जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है उसे कायम रखने के लिए मैं अपने खून की अंतिम बूंद तक संघर्ष करता रहूंगा। यह दार्शनिक बर्टेंड रसल के शब्द हैं, जो कह रहे हैं कि लोकतंत्र व प्रगति के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बुनियादी शर्त है। विचार शब्दों के माध्यम से आसानी से व्यक्त किये जा सकते हैं, लेकिन कभी-कभार कला के ज़रिये अधिक प्रभावी अंदाज़ से व्यक्त किये जाते हैं, जैसा कि इंग्लैंड स्थित स्ट्रीट आर्टिस्ट बैंकसी अक्सर किया करते हैं।

भारत का संविधान उचित पाबंदियों के साथ सभी नागरिकों को अपने विचार व राय स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने का अधिकार देता है। इसमें न स़िर्फ मौखिक शब्द शामिल हैं बल्कि लेख, चित्र, चलचित्र, बैनर आदि के माध्यम से भाषण भी शामिल हैं।बोलने के अधिकार में न बोलने का अधिकार भी शामिल है। इस अधिकार में मुख्य शब्द उचित है। बहरहाल, ऐसा प्रतीत होता है कि हाल ही में दो हाईकोर्ट्स के जो अवलोकन आये हैं, वह इस शब्द को सीमित करते हैं।

अभिव्यक्ति की सीमा: अदालतों की दो मिसालें

पहली नज़र में सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर शर्मिष्ठा पनोली पर कलकत्ता हाईकोर्ट की टिप्पणी और कर्नाटक हाई कोर्ट द्वारा ऐक्टर कमल हासन को फटकारना निर्विवाद प्रतीत होते हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पनोली ने एक समुदाय विशेष के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी की और पैग़म्बर मुहम्मद के खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग किया, जोकि उन्हें नहीं करना चाहिए था। बाद में उन्होंने अपनी पोस्ट्स को डिलीट कर दिया।

कलकत्ता हाईकोर्ट ने उनसे कहा, देखो, हमें बोलने की आज़ादी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आप दूसरों की भावनाओं को आहत करें। कमल हासन ने दावा किया था कि कन्नड़ तमिल से निकली हुई उसकी एक शाखा है यानी कन्नड़ अलग व स्वतंत्र भाषा नहीं है। इस पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा, आप कमल हासन या जो कोई भी हों, लेकिन आप अवाम की भावनाओं को आहत नहीं कर सकते।

दूसरे शब्दों में दोनों अदालतों ने कहा है कि आप तोल-मोलकर बोलें और इस बात का ख्याल रखें कि आपके शब्दों से अन्यों को तकल़ीफ न पहुंचे। अगर यह नज़ीर बन जाती है, तो इस देश में सभी बातचीत, चर्चा व बहस का आनंदमय होना आवश्यक हो जायेगा। वक्ताओं, लेखकों व कलाकारों को सावधान व सतर्क रहना होगा कि वह कहीं श्रोताओं को नाराज़ न कर दें। फिर भी भावनाओं को आहत करने वाली तलवार उनके सिरों पर लटकी रहेगी।

भावनाएं मापदंड बनें तो अभिव्यक्ति संकट में

खामोश रहना ही सुरक्षा की गारंटी बन जायेगी। यह सही है कि आपकी आज़ादी वहां खत्म हो जाती है, जहां मेरी नाक शुरू होती है, लेकिन बोलने व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बहुत मुश्किल से हासिल किया गया आधुनिक अधिकार है। इतालवी दार्शनिक जियोदार्ने ब्रूनो को जिंदा जला दिया गया था इस विचार का प्रसार करने के लिए कि ब्रह्मांड अनंत है, क्योंकि इससे चर्च आहत हो गया था।

गैलीलियो को अपने जीवन के अंतिम वर्ष अपने ही घर में नज़रबंदी में गुज़ारने पड़े थे; क्योंकि उनका नज़रिया था कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर काटती है। एक व्यक्ति का विश्वास दूसरे व्यक्ति के लिए ईशनिंदा हो सकती है। यही वजह है कि दूसरों की भावनाओं, रायों व एहसासों को अच्छे या खराब वक्तव्य का पैमाना बनाना मुक्त अभिव्यक्ति को नष्ट करने का सबसे आसान व ठोस तरीका है।

भावनाओं को आहत करना फिसलन भरी ढलान है, जिसका अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के किसी भी प्रयास पर चिंताजनक प्रभाव पड़ता है। अगर संविधान का अनुच्छेद 19(1) नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को सुरक्षित रखता है, तो यह तथ्य भी काबिले-गौर है कि अनुच्छेद 19(2) में भावनाओं को आहत करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने के उचित व तार्किक कारणों में शामिल नहीं है।

भावनाओं को आहत करना इस आधार पर विषयात्मक है कि जो बात एक व्यक्ति के लिए मनोरंजन या सूचना या वैध आस्था है, वह दूसरे व्यक्ति के लिए बहुत परेशान करने वाली या झूठ या ईशनिंदा हो सकती है। इस प्रकार के विषयात्मक पक्षपात के चलते राज्य और उसके अंगों जैसे पुलिस व अदालत के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित मामलों को तय करना आसान नहीं है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दोहरा मापदंड

ऐसे में स़िर्फ उसी अभिव्यक्ति को कानून के दायरे में लाया जा सकता है, जो जन अव्यवस्था व हिंसा का कारण बनी हो। भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जो कानून हैं, वह आवश्यक रूप से राज्य से अपेक्षा रखते हैं कि ऐसे मामलों में संयम का परिचय दिया जाये। साथ ही यह भी ज़रूरी है कि अदालतें अपने फैसलों में सुसंगत रहें। देखने में आया है कि दो लगभग एक से ही मामलों में एक ही अदालत ने अलग-अलग नज़रिया अपनाया, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को सुरक्षित रखने की आशा को कोई विशेष मदद नहीं मिलती है।

मसलन, टीवी एंकर अर्नब गोस्वामी व अमिश देवगन और वेब सीरीज तांडव की कास्ट व क्रू के मामले लगभग समान स्थितियों में थे कि उनके विरुद्ध अनेक राज्यों में एफआईआर दर्ज करायी गईं थीं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पहले वालों को राहत प्रदान कर दी थी और दूसरे को राहत देने से इंकार कर दिया था। तांडव के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार संपूर्ण नहीं है और वह दूसरों के अधिकारों को आहत करने की कीमत पर नहीं दिया जा सकता।

गौरतलब है कि अतीत में सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को यह कहते हुए सुरक्षित रखा है कि अगर किसी चीज़ से आपकी भावनाएं आहत होती हैं, तो आप स्वयं उससे दूर रहें। इसी शानदार दृष्टिकोण को बरकरार रखने की आवश्यकता है। अगर आपको अर्नब गोस्वामी की उग्र-आक्रामक नौटंकी अच्छी नहीं लगती तो आप न देखें, लेकिन उन्हें देखने दें जो देखना चाहते हैं।

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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसकी सीमाएं

हाल ही में सांसद इमरान प्रतापगढ़ी के मामले में फैसला देते हुए भी सुप्रीम कोर्ट ने यही नज़रिया अपनाया था। अदालत ने कहा था कि शब्दों के प्रभावों का मूल्यांकन उन लोगों के मानकों के आधार पर नहीं किया जा सकता, जिन्हें हमेशा असुरक्षा का बोध रहता है या जो लोग आलोचना को हमेशा अपनी पॉवर या पोजीशन के लिए खतरा महसूस करते हैं और अगर बड़ी संख्या में लोग दूसरे के द्वारा व्यक्त विचारों को पसंद नहीं करते तो भी व्यक्ति के विचार व्यक्त करने के अधिकार का सम्मान करना व उसकी सुरक्षा करना ज़रूरी है।

आपत्तिजनक या उग्र शब्द निश्चित रूप से वातावरण को दूषित करते हैं, लेकिन इसका समाधान यह नहीं है कि वक्ताओं को सलाखों के पीछे भेज दिया जाये। उपचार का बेहतर नुस्खा यही है कि विचारों का जवाब विचारों से दिया जाये। हमारा संविधान न्यूज़ मीडिया को बिना डर या पक्षपात के रिपोर्ट करने का अधिकार देता है।

विजय कपूर
विजय कपूर

हालांकि निजी शिकायतकर्ताओं को अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन जब पुलिस प्रशासन स्वत ही एफआईआर दर्ज करने लगे, जैसा कि अनेक मामलों में देखा गया है तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को सीमित करने का गंभीर व चिंताजनक प्रयास है, जिस पर विराम लगना चाहिए क्योंकि, जैसा कि सलमान रुश्दी कहते हैं, कहानियां सुनाने की हमारी क्षमता पर हमला स़िर्फ सेंसरशिप नहीं है बल्कि हमारे मानव स्वभाव के विरुद्ध अपराध है।

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