बांग्लादेश संकट और भारत की कूटनीति की परीक्षा

एक व्यवहारिक कूटनीति, जो रियलपॉलिटिक की कठोरताओं को भी समझे और आदर्शवाद की सीमाओं को भी पहचाने, ही आज की आवश्यकता है। भारत को यह स्वीकार करना चाहिए कि जिस प्रकार अफगानिस्तान में तालिबान से संवाद अनिवार्य हो गया है, उसी प्रकार ढाका से संवाद न करना एक रणनीतिक भूल होगी। भारत को नेतृत्व दिखाना होगा, पहल करनी होगी और अपनी विदेश नीति में लचीलापन लाना होगा। संवाद न केवल तनाव कम करता है, बल्कि आपसी समझ और विश्वास की नींव भी रखता है।

दक्षिण एशिया का भू-राजनीतिक परिदृश्य सदैव संवेदनशील रहा है। इसमें भारत की भूमिका एक स्थायी और शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में हमेशा निर्णायक रही है। किंतु इस क्षेत्र की स्थिरता, विकास और कूटनीतिक समरसता का आधार भारत के पड़ोसी देशों के साथ उसके संबंधों की स्थिति पर निर्भर करता है। भारत और बांग्लादेश के संबंधों का इतिहास जितना गहरा और बहुपरतीय रहा है, उतना ही जटिल और संवेदनशील भी।

बांग्लादेश में लोकतंत्र की चुनौती और भारत के लिए संकेत

1971 के मुक्ति संग्राम के बाद भारत ने जिस भूमिका से एक नए राष्ट्र के गठन में सहायता की, उसने दोनों देशों के बीच विश्वास की नींव रखी। लेकिन समय के साथ बदलती राजनीतिक परिस्थितियाँ, आंतरिक अस्थिरताएँ और नेतृत्व परिवर्तन ने इन संबंधों में कई बार तनाव और संदेह के बादल भी ला दिए। बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के शासन को विरोध प्रदर्शनों के चलते हटाकर एक अंतरिम सरकार की स्थापना की गई थी, जिसके प्रमुख आर्थिक नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस बनाए गए।

इस सरकार से अपेक्षा थी कि वह देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की राह प्रशस्त करेगी। किंतु इसके कार्यकलापों ने इस आशा को कुचलते हुए, विभाजन को और भी गहरा कर दिया। सत्ता से बेदखल किए गए शेख हसीना के आलोचकों का मुख्य आरोप यह था कि उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर, सत्ता को बनाए रखने का प्रयास किया। लेकिन दुर्भाग्यवश, अंतरिम सरकार भी वही राह अपनाती प्रतीत हो रही है। अवामी लीग पर प्रतिबंध और नया राजनीतिक दल बनाने की कवायद से यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान व्यवस्था भी सत्ता संतुलन को अपने पक्ष में करने का प्रयास कर रही है।

जब एक अंतरिम और अस्थायी सरकार भी उसी प्रकार लोकतंत्र की भावना का हनन करे, तो नैतिक अधिकार खो बैठती है।
प्रोफेसर यूनुस से अपेक्षा थी कि वे आर्थिक स्थिरता और राजनीतिक शांति की दिशा में प्राथमिकता देंगे। लेकिन यह स्पष्ट है कि न तो निवेशकों को आश्वस्त करने हेतु कोई ठोस प्रयास हुआ है और न ही भारत जैसे प्रमुख व्यापारिक साझेदार के साथ संबंध सुधारने की दिशा में कोई गंभीर संवाद शुरू हुआ है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था, विशेषकर रेडीमेड गारमेंट्स के निर्यात पर आधारित है और उसका अल्प विकसित देश के वर्गीकरण से बाहर निकलना अगले वर्ष प्रस्तावित है।

बांग्लादेश से संवाद में देरी से भारत को नुकसान

ऐसे समय में देश को यूरोपीय संघ और भारत जैसे बाजारों तक कम शुल्क वाली पहुँच बनाए रखने की नितांत आवश्यकता है। लेकिन सरकार की राजनीतिक नीतियों और न्यायपालिका का राजनीतिक उपकरण की तरह उपयोग, विशेषकर अवामी लीग के खिलाफ, निवेशकों को हतोत्साहित कर सकता है। भारत का दृष्टिकोण भी इस पूरे घटनाक्रम में आलोचनात्मक समीक्षा का विषय है। नई दिल्ली ने बीते वर्षों में शेख हसीना को खुला समर्थन दिया, लेकिन जब विरोध प्रदर्शन और सत्ता परिवर्तन हुए, तो भारत समय रहते परिस्थितियों को समझने में विफल रहा।

न तो भारत ने हसीना की विरोधी शक्तियों से संवाद स्थापित किया और न ही वैकल्पिक परिदृश्य की तैयारी की। अब जबकि एक नई राजनीतिक व्यवस्था उभर चुकी है, भारत ने उससे संवाद स्थापित करने में विलंब किया है। भारत की यह नीति यथास्थिति बनाए रखने की कूटनीति का ही विस्तार प्रतीत होती है, जिसमें वह पुराने सहयोगी को छोड़ने में हिचकिचाहट महसूस करता है, भले ही परिस्थिति बदल चुकी हो।

भारत ने हाल ही में बांग्लादेश से कुछ निर्यातों पर प्रतिबंध लगाए हैं, जो प्रोफेसर यूनुस के भारत के पूर्वोत्तर को लेकर दिए गए विवादित बयानों के बाद प्रतिक्रिया स्वरूप उठाया गया कदम है। किंतु इस प्रकार की प्रतिशोधात्मक नीति दूरदर्शिता के विरुद्ध है। इससे दोनों देशों के बीच आर्थिक और राजनीतिक रिश्तों में और खटास आती है। खासकर तब, जब भारत को यह अनुभव हो चुका है कि अफगानिस्तान जैसे देशों में भी तालिबान से संवाद की आवश्यकता समझ में आ चुकी है, तो ढाका जैसे करीबी पड़ोसी से संवाद न करना एक बड़ी रणनीतिक चूक मानी जा सकती है।

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दक्षिण एशिया में भारत की संतुलित कूटनीति जरूरी

दक्षिण एशिया के संदर्भ में बांग्लादेश का विशेष स्थान है। 1971 के मुक्ति संग्राम में भारत की निर्णायक भूमिका ने दोनों देशों के संबंधों को एक भावनात्मक गहराई दी थी। किंतु पिछले कुछ वर्षों में शेख हसीना की सत्ता में रहते हुए भारत के साथ उनकी निकटता और बांग्लादेश के भीतर लोकतंत्र के क्षरण ने वहां की जनता के भीतर भारत के प्रति असंतोष को जन्म दिया है।

आज जब बांग्लादेश की नई सत्ता संरचना ने हसीना सरकार को हटाकर खुद सत्ता ग्रहण की है और भारत की चुप्पी या दूरी स्पष्ट दिखाई देती है, तो यह धारणा और भी बलवती हो सकती है कि भारत केवल उन्हीं सरकारों से सहयोग करता है जो उसकी पसंद की हों। भारत की यह नीति दीर्घकालीन रूप से उसके पड़ोसियों के प्रति उसकी साख को कमजोर करती है। लोकतंत्र के प्रहरी होने का दावा करने वाला देश यदि पड़ोसी देशों में लोकतंत्र के क्षरण पर चुप्पी साधे या उस स्थिति का लाभ उठाने का प्रयास करे, तो उसकी नैतिक स्थिति पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।

भारत को चाहिए कि वह बांग्लादेश में किसी भी दलविशेष से नहीं, बल्कि वहां के लोकतांत्रिक संस्थानों, नागरिक समाज और दीर्घकालीन स्थिरता से संबंध स्थापित करे। दक्षिण एशिया में स्थायित्व केवल तभी संभव है जब भारत अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ समानता और सम्मान के आधार पर संबंध बनाए। पड़ोसी छोटे हों या बड़े, उनकी समस्याओं, चिंताओं और विचारधाराओं को समझने की भारत की ज़िम्मेदारी कहीं अधिक है।

बांग्लादेश में संवाद से विश्वास और संतुलन जरूरी

विशेष रूप से बांग्लादेश जैसे देश, जहां सांस्कृतिक, भाषिक और ऐतिहासिक साझेदारी है, वहां संवाद का पुल कभी भी टूटना नहीं चाहिए। आज जब बांग्लादेश की अंतरिम सरकार लोकतांत्रिक आदर्शों से विचलित हो रही है, तब भारत की जिम्मेदारी है कि वह उससे सीधा संवाद स्थापित करे, लोकतंत्र की पुनर्स्थापना पर बल दे और अपने हितों की रक्षा करते हुए वहां की जनता के भरोसे को भी अर्जित करे।

यह भी समझने की आवश्यकता है कि बांग्लादेश में भारत के प्रति अविश्वास का एक प्रमुख कारण यह रहा है कि भारत ने शेख हसीना को आंख मूंदकर समर्थन दिया, भले ही उनके शासन में अधिनायकवाद की प्रवृत्तियां बढ़ीं। अब जबकि वह सत्ता से बाहर हैं और भारत एक नई व्यवस्था से संवाद स्थापित नहीं कर रहा है, तो यह संदेश जा रहा है कि भारत केवल अनुकूल नेताओं से ही संबंध बनाए रखना चाहता है।

यह दृष्टिकोण खतरनाक है, क्योंकि इससे भारत विरोधी भावना को प्रोत्साहन मिलता है, जिससे कट्टरपंथ, अस्थिरता और चीन-पाक जैसे देशों को बांग्लादेश में पैर जमाने का अवसर मिलता है। भारत को यह भी स्मरण रखना चाहिए कि बांग्लादेश की जनता भारत के साथ घनिष्ठ संबंधों की पक्षधर रही है, किंतु यह घनिष्ठता सरकारों से नहीं, बल्कि पारस्परिक सम्मान, आर्थिक सहयोग, सांस्कृतिक संवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों की साझेदारी से बनी रह सकती है।

बांग्लादेश से संवाद: शांति की ओर एक कदम

आज की परिस्थिति में भारत को बांग्लादेश की जनता तक पहुंचने, उनके भरोसे को जीतने, और अपने हितों की रक्षा करते हुए वहां लोकतंत्र की बहाली में योगदान देने की आवश्यकता है। एक व्यवहारिक कूटनीति, जो रियलपॉलिटिक की कठोरताओं को भी समझे और आदर्शवाद की सीमाओं को भी पहचाने, ही आज की आवश्यकता है। भारत को यह स्वीकार करना चाहिए कि जिस प्रकार अफगानिस्तान में तालिबान से संवाद अनिवार्य हो गया है, उसी प्रकार ढाका से संवाद न करना एक रणनीतिक भूल होगी।

नृपेन्द्र अभिषेक नृप
नृपेन्द्र अभिषेक नृप

भारत को नेतृत्व दिखाना होगा, पहल करनी होगी और अपनी विदेश नीति में लचीलापन लाना होगा। संवाद न केवल तनाव कम करता है, बल्कि आपसी समझ और विश्वास की नींव भी रखता है।अब यह समझना होगा कि भारत जितना बड़ा देश है, उतनी ही बड़ी उसकी ज़िम्मेदारी भी है। छोटे पड़ोसी देशों की चिंता, उनकी आशंकाओं का समाधान और उनकी स्वतंत्रता व आत्मसम्मान को बनाए रखते हुए संबंधों को आगे बढ़ाना भारत की कूटनीतिक सफलता का मापदंड होना चाहिए। इस संदर्भ में बांग्लादेश के साथ संवाद के रास्ते खोलना केवल एक राजनयिक कदम नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया में स्थायित्व और शांति की दिशा में एक अनिवार्य पहल होगी।

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