नारी के सुहाग का प्रतीक चूड़ी

चूड़ी नारियों का एक प्रिय आभूषण होने के साथ-साथ सुहाग का प्रतीक भी है। यह नारियों के हाथों में पहुँच कर जहां उनकी सुंदरता में चार चांद लगाती है, वहीं पुरुषों का ध्यान भी अपनी ओर आकर्षित करती है। चूड़ियों के पहनने का रिवाज सदियों पुराना है। प्राचीन मूर्तियां एवं गुफाओं में चित्रित चित्र इसके साक्षी हैं। मुगलकालीन समय में तो चूड़ियों का नामकरण बेगमों के नाम पर किया जाता था, वहीं आज इनका नामकरण फिल्मों के नाम पर किया जा रहा है।

विविध उत्सवों पर अलग-अलग रंगों की चूड़ियां पहनने का रिवाज है। शादी जैसे मंगल अवसर पर नारियां जहां लाल चूड़ी पहनना ज्यादा पसंद करती हैं, वहीं सावन माह में हरी चूड़ियां। अन्य मंगल अवसरों पर या किसी पार्टी में शामिल होने के वक्त हाथी दांत, सीप, लाख आदि से बनी चूड़ियां स्त्रियों की कलाई में सौंदर्यमान होती हैं।

साधारणत नारियां घरेलू काम-काज के वक्त कांच निर्मित चूड़ियां पहनती हैं। इसके अलावा, सोने, चांदी, चंदन, वाइट मेटल प्लास्टिक रबड़ आदि से निर्मित चूड़ियां भी प्रचलन में हैं। आज तो चूड़ियां भी फैशन की दौड़ में शामिल हो गई हैं। शरीर एवं कपड़े के रंग से मेल खाती चूड़ियां आकर्षक लगती हैं, वहीं सांवली युवतियों में लाल रंग या अनारदाना रंग की चूड़ियां अच्छी लगती हैं।

भारत में विभिन्न स्थानों पर चूड़ी निर्माण की जाती हैं। हैदराबाद पत्थरों एवं रत्नों की चूड़ियों के लिए प्रसिद्ध है। फिरोजाबाद भी चूड़ी निर्माण में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। राजस्थान में लाख की चूड़ियां बनाई जाती हैं। इन स्थानों पर बनी चूड़ियों की देश-विदेश सभी जगह अच्छी मांग है। वास्तव में चूड़ी नारी जाति की एकता का प्रतीक है।

चन्द्र प्रकाश अम्बष्ट

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button