स्वतंत्र रहो, पर बनो जिम्मेदार

दुनिया में जीने वाले हर मनुष्य को अपनी स्वतंत्रता अति प्रिय होती है, क्योंकि वह उसे अपनी उम्मीदें, लक्ष्य और क्षमताओं को पूर्ण करने का अवसर प्रदान करती है। हम एक ऐसे देश में जी रहे हैं, जहाँ हमें व़ाक-स्वातंत्र्य, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और चयन करने की आजादी प्राप्त हैं, जिसके बिना हम पूरी तरह से जीवन का आनंद नहीं ले सकते हैं। इस तथ्य के बारे में कोई संदेह नहीं है कि जब हम स्वतंत्र हैं, तब हम खुश हैं, किन्तु जब यही स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया जाता है, तब यह समाज में कहर पैदा कर देता है।
जी हाँ! इस संदर्भ में कई अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय मामलों के बारे में प्रतिदिन अखबारों एवं टीवी के माध्यम से पढ़ व देख रहे हैं। वर्तमान में लोगों का लोगों पर व्यक्तिगत और सामूहिक एवं प्रकृति के खिलाफ किया जा रहा अन्याय इस कदर बढ़ चुका है कि हम देख व महसूस कर सकते हैं कि इन सभी पापों को चुकता करने का तंत्र बड़ी भारी गति से काम कर रहा है।
सज़ा नहीं, सार्वभौमिक पुनर्संतुलन की स्वचालित प्रक्रिया
इसका ताज़ा उदाहरण कई देशों में आई प्राकृतिक आपदाओं के रूप में देखा जा सकता है। जब स्वतंत्रता का दुरुपयोग अव्यवस्था पैदा करता है, तब सर्वोच्च सर्वशक्तिमान का न्याय फिर से विश्व में संतुलन बनाने का कार्य शुरू कर देता है। याद रहे! ऐसा कोई मनुष्य इस धरती पर नहीं है, जो उस सर्वोच्च सत्ता के न्याय के विरुद्ध जाने की हिम्मत करे। ईश्वरीय कायदे सभी के लिए एक ओर अटल हैं। अत हर इन्सान के लिए उसके बनाये कानून का पालन करना अनिवार्य है।
लोगों के बीच यह एक मिथक है कि परमात्मा हमें अपने पापों के लिए दंडित करते हैं, मगर सच बात तो यह है कि वह कभी किसी को सज़ा देते नहीं हैं, क्योंकि सज़ा तो सार्वभौमिक पुनर्संतुलन की एक ऐसी स्वचालित प्रक्रिया है, जो समय के माध्यम से अपने आप कार्य करती रहती है। मनुष्य को एक ही समय पर अपनी जिम्मेवारी एवं की हुई गलती का एहसास करवाती है।
प्रेम, स्वतंत्रता और शांति से जीवन का सच्चा मार्ग
अत: उसे सज़ा नहीं अपितु न्याय कहना उचित होगा, जिसे हम सभी कई नाम देते हैं, जैसे की कुदरत का न्याय, ईश्वरीय न्याय इत्यादि, किन्तु इस न्याय पर भी एक ऐसी शक्ति है, जो हमें सज़ा के डर एवं पीड़ा से निजात दिला सकती है और वह शक्ति है- प्रेम की, जो सीधे परम शक्तिमान परमात्मा के द्वारा हमें परमात्म प्रेम के रूप में प्राप्त हो सकती है।

परमात्म प्रेम वह संजीवनी है, जो हमें पिछले सभी किये पापों से मुक्ति दिलाकर एक नया जन्म प्रदान करती है, किन्तु यदि हम फिर से अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने की वही पुरानी फितरत पर वापस आ जाएँगे तो सज़ा के सिवाय और कोई विकल्प नहीं रहता है। इसलिए, यदि हम सज़ा रहित जीवन जीना चाहते हैं तो खुद भी शांति से जिएँ और बिना किसी हस्तक्षेप के दूसरों को भी स्वतंत्रतापूर्वक शांति से जीने दें।
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