बेअंत सिंह हत्याकांड : राजोआना की दया याचिका पर 18 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
नयी दिल्ली, उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि वह पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए बलवंत सिंह राजोआना की याचिका पर 18 मार्च को सुनवाई करेगा।
राजोआना ने अपनी अपील में दया याचिका पर निर्णय में देरी के कारण उसके मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदलने का अनुरोध किया है। राजोआना 29 वर्षों से अधिक समय से कारावास में है, जिनमें से 15 वर्षों से अधिक समय वह मृत्युदंड की सजा पाए कैदी के तौर पर गुजार चुका है। केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ को बताया कि उन्हें इस मामले में कुछ समय चाहिए।
राजोआना की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने शीर्ष अदालत के 24 सितंबर 2025 के आदेश का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि प्रतिवादियों की ओर से स्थगन के लिए आगे किसी भी अनुरोध पर विचार नहीं किया जाएगा। पीठ ने कहा कि मामले की सुनवाई 18 मार्च को होगी। उच्चतम न्यायालय ने इससे पहले केंद्र सरकार से राजोआना की दया याचिका पर निर्णय लेने को कहा था। केंद्र ने तब मामले की संवेदनशीलता का हवाला देते हुए कहा था कि दया याचिका विचाराधीन है।
सितंबर 2024 में, शीर्ष अदालत ने राजोआना की याचिका पर केंद्र, पंजाब सरकार और चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन से जवाब मांगा था। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री सिंह और 16 अन्य लोग 31 अगस्त 1995 को चंडीगढ़ में सिविल सचिवालय के प्रवेश द्वार पर हुए विस्फोट में मारे गए थे। एक विशेष अदालत ने जुलाई 2007 में राजोआना को मौत की सजा सुनाई थी। राजोआना ने अपनी रिहाई के लिए निर्देश देने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी।
अनुच्छेद 72 के तहत दया याचिका पर देरी का मुद्दा उठाया
उच्चतम न्यायालय ने तीन मई 2023 को उसकी मृत्युदंड की सजा को कम करने से इनकार कर दिया और कहा कि सक्षम प्राधिकारी उसकी दया याचिका पर विचार कर सकता है। अपनी नई याचिका में राजोआना ने कहा कि उसने 28.8 वर्ष जेल में बिताए हैं, जिनमें से 15 वर्ष से अधिक समय मृत्युदंड के कैदी के रूप में व्यतीत किए गए हैं।
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राजोआना ने कहा कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति ने मार्च 2012 में अनुच्छेद 72 के तहत दया याचिका प्रस्तुत कर उसकी ओर से क्षमादान की गुहार लगाई थी। याचिका में कहा गया है कि शीर्ष अदालत द्वारा सक्षम प्राधिकारी को उचित समय में उसकी ओर से दायर दया याचिका पर विचार करने और आगे का निर्णय लेने का निर्देश दिए जाने के बाद से एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है। (भाषा)
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