काला सच और गोरी सोच : एक बदरंग तमाशा

तो जनाब, एक बार फिर हमारा समाज अपने रंगीन चश्मे लेकर मैदान में उतर आया है। इस बार निशाना बनी हैं केरल की मुख्य सचिव शारदा मुरलीधरन, जिनके साँवले रंग को लेकर किसी महान विचारक ने टिप्पणी की कि उनका कार्यकाल उतना ही काला है, जितना उनके पति का गोरा था। वाह! क्या ग़ज़ब का तुलनात्मक साहित्य! साहित्य अकादमी को फोन करके इन सज्जन को पुरस्कार देने की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। आखिरकार, इतनी गहरी सोच और रंगों का ऐसा बारीक विश्लेषण हर किसी के बस की बात थोड़े ही है।

हमारे देश में रंगों का जादू तो देखते ही बनता है। गोरा रंग हो तो आप स्वत ही सुंदर, समझदार और सफल घोषित हो जाते हैं। और अगर काले रंग का दुर्भाग्य आप पर हावी हो गया, तो फिर चाहे आप आईएएस बन जाएँ, मुख्य सचिव बन जाएँ, या चाँद पर झंडा गाड़ आएँ -आपकी उपलब्धियाँ एक तरफ और आपका रंग एक तरफ। शारदा जी ने तो फिर भी हिम्मत दिखाई और इस टिप्पणी का जवाब अपनी फेसबुक पोस्ट से दिया, मुझे अपने कालेपन को स्वीकार करना होगा।

नहीं, मैडम, स्वीकार क्यों करना होगा? काला रंग क्या कोई अपराध है, या कोई बीमारी है, जिसे स्वीकार करना पड़े? हमारा समाज तो रंगों का ऐसा तमाशा है, जहाँ गोरेपन की क्रीम बिकती है और कालेपन की कीमत चुकानी पड़ती है। बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि गोरा रंग ही सुंदरता का पासपोर्ट है। विज्ञापनों में गोरी-चिट्टी हीरोइनें फेयर एंड लवली लगाकर जिंदगी में चार चाँद लगाती दिखती हैं, जबकि साँवली लड़की को अच्छा लड़का मिलने के लिए दहेज का पहाड़ चाहिए। शारदा जी ने अपने बचपन का एक किस्सा भी साझा किया कि कैसे उन्होंने माँ से पूछा था, क्या मैं गोरी त्वचा के साथ दोबारा पैदा हो सकती हूँ?

सफलता का रंग कौन तय करेगा?

वाह रे मेरे समाज, तूने चार साल की उम्र में ही बच्ची को रंग का गणित समझा दिया! तुम्हें तो इस शिक्षा प्रणाली के लिए नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए! अब ज़रा इस टिप्पणी पर गौर करें-उनका कार्यकाल काला है। मतलब क्या? क्या सड़कें नहीं बनीं? क्या फाइलें नहीं चलीं? या फिर काले रंग की वजह से सूरज ढूँढ़ने में दिक्कत हो रही थी?

नहीं, जनाब! यह टिप्पणी उनके काम से ज़्यादा उनकी त्वचा पर थी। और उसमें भी छिपा था लैंगिक भेदभाव का वह पुराना ज़हर, जो कहता है कि एक महिला, वो भी साँवली, भला क्या प्रशासन चला सकती है! उनके पति डॉ.वी.वेणु गोरे रंग के हैं। वे उनसे पहले मुख्य सचिव थे। उनके कार्यकाल को सफेद कहकर ताऱीफ की गई! यानी गोरा रंग-सफलता, काला रंग-नाकामी! क्या शानदार फॉर्मूला है! इसे स्कूलों में पढ़ाना चाहिए-गणित की जगह रंगशास्त्र।

लेकिन मज़ा तब आया जब शारदा जी ने इस सोच को आईना दिखाया। उन्होंने कहा, काला रंग ऊर्जा का प्रतीक है, जो सब कुछ समेट लेता है। सही बात है! काला रंग तो ब्रह्मांड का आधार है। ब्लैक होल से लेकर काजल तक, काला हर जगह छाया हुआ है। फिर इसे बदनाम क्यों किया जाए? पर हमारे समाज को कौन समझाए? यहाँ तो गोरे रंग का ऐसा क्रेज है कि लोग सूरज की धूप में भी फेयरनेस क्रीम और सन पीन लगाकर घूमते हैं। कहीं साँवले न पड़ जाएँ।

इस पूरे तमाशे में एक बात साफ है – हमारी सोच का रंग अभी भी काला है, चाहे त्वचा का रंग कुछ भी हो। शारदा मुरलीधरन जैसी महिलाएँ, जो अपने दम पर ऊँचाइयों तक पहुँचती हैं, हमें याद दिलाती हैं कि असली सुंदरता रंग में नहीं, हौसले में होती है। यों, अगली बार जब कोई रंग पर टिप्पणी करता दिखे, तो राजेश खन्ना के अंदाज़ में उसे बस इतना कहिएगा –

गोरे रंग पे न इतना गुमान कर,
गोरा रंग दो दिन में ढल जाएगा! 

(आनंद बक्षी)

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