सशक्त शरीर से ही होता है जीवन सार्थक

शरीर ही आपकी कर्मभूमि है। यह वाक्य हमें स्मरण कराता है कि जीवन की हर उपलब्धि, हर साधना और हर लक्ष्य की शुरुआत इसी शरीर से होती है। यदि कर्मभूमि ही दुर्बल होगी, तो उस पर खड़ा होने वाला जीवन-महल कैसे स्थिर रह पाएगा? कमजोर शरीर केवल शारीरिक समस्या नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक असंतुलन का भी कारण बनता है। जब शरीर थका या रोगग्रस्त होता है, तब ध्यान भटकता है, धर्माचरण बोझ लगने लगता है और लक्ष्य केवल कल्पना बनकर रह जाते हैं।

धर्म, ध्यान और लक्ष्य तीनों का आधार शरीर ही होता है। धर्म केवल ग्रंथों में ही नहीं, आचरण में भी प्रकट होता है। ध्यान केवल विचार में ही नहीं, निरंतर अभ्यास मांगता है, लक्ष्य केवल सपना ही नहीं, सतत परिश्रम चाहता है और इन तीनों के लिए स्वस्थ, सक्षम और अनुशासित शरीर अनिवार्य है। हम अकसर कहते हैं- समय नहीं है, बाद में करेंगे, पहले काम निपटा लें, लेकिन सच यह है कि शरीर को सशक्त करने का कार्य जितना टलता है, जीवन उतना ही असंतुलित होता जाता है।

शरीर सशक्त होगा, तभी मन स्थिर होगा, जब शरीर मजबूत होता है, तो मन में स्थिरता आती है, संकल्प दृढ़ होते हैं, निर्णय स्पष्ट होते हैं और जीवन में संतुलन स्वयं उतर आता है। योग, संयमित आहार, नियमित श्रम, पर्याप्त विश्राम, ये कोई विलास नहीं, बल्कि जीवन-यज्ञ का समर्पण/आहुति हैं।

यह समझना आवश्यक है कि शरीर साधन है, साध्य नहीं, परंतु साधन कमजोर होगा तो साध्य तक पहुँचना असंभव हो जाएगा। इसलिए अब और टालना नहीं है। आज नहीं तो कभी नहीं। शरीर को सशक्त बनाइए, ताकि मन विचलित न हो, संकल्प टूटे नहीं और जीवन केवल जिया ही न जाए, बल्कि उद्देश्यपूर्ण, संतुलित और सार्थक बने, क्योंकि मजबूत शरीर ही मजबूत जीवन की सच्ची शुरुआत है।

ओम प्रकाश हुंडिया

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