त्याग और भक्ति का अद्भुत संगम है आशीर्वाद मंदिर

भक्त की भक्ति जब अपने इष्ट के प्रति चरम सीमा पर पहुँचती है, तब उसका स्थान भक्त से ऊपर उठकर भगवान के समकक्ष हो जाता है। कलियुग ऐसे ही महान भक्त हुए हैं- भक्त श्रीदेवकीनंदन एवं उनकी सहधर्मिणी शक्ति स्वरूपा देवी गायत्री, जिन्होंने विष्णु अवतारी बाबा गंगाराम की भक्ति में अपना समस्त जीवन समर्पित करके त्याग एवं तपस्या से उस परम पद को प्राप्त किया।

झुंझुनूं में श्रीपंचदेव मंदिर परिसर में भक्त शिरोमणि श्रीदेवकीनंदन एवं शक्ति स्वरूपा देवी गायत्री की युगल प्रतिमाओं से सुशोभित आशीर्वाद मंदिर का निर्माण त्याग, तपस्या और भक्ति का साक्षात उदाहरण है। गर्भ-गृह में विराजित भक्त शिरोमणि श्रीदेवकीनंदन एवं शक्तिस्वरूपा देवी गायत्री के दिव्य श्रीविग्रह के वरद मुद्रा के दर्शन होते ही भक्त कृत्य-कृत्य हो उठते हैं। इस मंदिर के निर्माण के साथ ही एक नया इतिहास रचा गया।

कलियुग में सत्य की परीक्षा: देवकीनंदन और माता गायत्री

इसकी नींव है- भक्त शिरोमणि देवकीनंदन एवं परम आराधिका माता गायत्री का त्याग, तपस्या व बलिदान। आज बाबा गंगाराम ने अपने भक्तों को वह मान दिया, जो भक्त प्रह्लद को मिला, जिसकी जयकार हम आज भी लगाते हैं। मीरा भी भक्ति के द्वारा ही कृष्ण में समा गईं। आज देवी गायत्री ने स्वयं ही भक्ति नहीं की अपितु भक्तों के कष्टों को दूर करके उन्हें बाबा गंगाराम की भक्ति का अमृत-पान करवाया।

भक्त देवकीनंदन एवं देवी गायत्री का चरित्र सबसे अधिक जिस केन्द्र बिन्दु पर घूमता है, वह है- उनका सत्य पर अडिग रहना। आज हम राजा हरिश्चंद्र की सत्य निष्ठा की गाथा गाते हैं, तो आने वाला कल भक्त देवकीनंदन एवं देवी गायत्री की भक्ति एवं त्याग की गाथा गाएगा, क्योंकि उन्होंने सत्य की यह परीक्षा सत युग में नहीं अपितु कलियुग में दी है। उन्होंने बाबा गंगाराम की लीला को इस धरती पर स्थापित करने के लिए अपना सर्वस्व तथा करोड़ों की संपत्ति बाबा को समर्पित कर दी।

त्याग, तपस्या और जग-कल्याण का अनुपम जीवन

असह्य कष्ट सहते हुए शाक के पत्ते खाकर जीवन यापन किया। उन्होंने लोगों के व्यंग्य बाणों से व्यथित होने के बावजूद अपने जीवन के समस्त सुखों, मान-प्रतिष्ठा, अपनी संतानों के सांसारिक जीवन का बलिदान भी सहन कर लिया। उन्होंने अपने जीवन का एक-एक क्षण जग-कल्याण की कामना हेतु जीया।

इस स्थान का दर्शन करके भक्तों की आत्मा स्वयं ही तृप्त हो जाती है। भक्त शिरोमणि देवकीनंदन के महाप्रयाण के पश्चात् देवी गायत्री की करूण प्रार्थना पर उनके पार्थिव शरीर से उनका दाहिना हाथ ऊपर उठकर आशीर्वाद देता हुआ हिलने लगा। इस प्रकार उन्होंने अपनी भक्ति का ज्वलंत प्रमाण प्रस्तुत किया।

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