बजट 2026 : आधी आबादी की आर्थिक नियति
संसद के पटल पर रखा गया केंद्रीय बजट 2026-27 केवल आँकड़ों का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि देश की आधी आबादी की आर्थिक नियति का एक नया मसौदा भी है। कहना गलत न होगा कि इसमें कल्याण (वेलफेयर) से महिला-नेतृत्व वाले विकास (वीमेन-लेड डेवलपमेंट) की ओर एक स्पष्ट झुकाव दिखाई देता है। लेकिन, हाँ, यह देखना भी ज़रूरी होगा कि, क्या ये प्रावधान ज़मीनी हकीकत और महिलाओं की विशाल अपेक्षाओं के बीच के अंतर को पाटने में सक्षम हैं?
इस बजट की सबसे बड़ी उपलब्धि जेंडर बजट में की गई 11.36 प्रतिशत की वृद्धि है, जो अब बढ़कर 5.01 लाख करोड़ रुपये हो गया है। यह कुल बजट का लगभग 9.4 प्रतिशत है। सरकार ने लखपति दीदी योजना की सफलता को भाँपते हुए अब लखपति दीदी 2.0 का लक्ष्य 3 करोड़ महिलाओं तक पहुँचने का रखा है। लेकिन जो चीज़ इस बार ध्यान खींचती है, वह है शी-मार्ट्स की घोषणा। ग्रामीण महिलाओं को केवल ऋण लेने वाली इकाई न मानकर उन्हें एंटरप्राइज ओनर यानी उद्यम का मालिक बनाने की यह सोच स्वागत योग्य है।
शी-मार्ट्स से महिला स्वयं सहायता समूहों को सीधा बाज़ार
क्लस्टर स्तर पर सामुदायिक स्वामित्व वाले ये रिटेल आउटलेट्स बिचौलियों को खत्म कर महिला स्वयं सहायता समूहों को सीधे बाज़ार से जोड़ेंगे। इसके अलावा, प्रत्येक जिले में एक बालिका छात्रावास बनाने का निर्णय और स्टेम (साइंस टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मैथेमेटिक्स) विषयों की शिक्षा के लिए विशेष वित्तीय सहायता जैसे कदम उच्च शिक्षा में लड़कियों के ड्रॉप-आउट रेट को कम करने की दिशा में एक क्रांतिकारी पहल साबित हो सकते हैं।
गौरतलब है कि जहाँ एक ओर बड़े बुनियादी ढाँचे और डिजिटल साक्षरता पर ज़ोर है, वहीं कुछ मोर्चों पर बजट मौन सा भी दीखता है। सयानों की मानें तो तमाम अच्छी बातों के बावजूद बजट में केयर इकोनॉमी के लिए कुछ भी नहीं है। केयर इकोनॉमी उन सभी गतिविधियों का समूह है जो बच्चों, बुजुर्गों, बीमारों और विकलांगों की देखभाल, तथा घरेलू कार्यों से संबंधित हैं। मानव कल्याण के लिए इसकी ज़रूरत अपरिहार्य है। लेकिन बजट में इसे अनदेखा किया गया है। जगज़ाहिर है कि भारत में महिलाएँ असंगठित क्षेत्र और घरेलू कामकाज में सबसे ज़्यादा समय बिताती हैं, जिसका कोई आर्थिक मूल्य नहीं आंका जाता। बजट में कामकाजी माताओं के लिए क्रेच (शिशु गृह) की संख्या बढ़ाने और आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के मानदेय में अपेक्षित वृद्धि पर वह स्पष्टता नहीं दिखी, जिसकी उम्मीद थी।
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सप्लाई साइड मज़बूत, डिमांड साइड पर बजट की कमजोरी
एक और बड़ी चुनौती सुरक्षा और मोबिलिटी की है। निर्भया फंड और अन्य सुरक्षा योजनाओं के लिए आवंटन तो बढ़ा है, लेकिन सार्वजनिक परिवहन को महिलाओं के लिए सुलभ और सुरक्षित बनाने के लिए ज़रूरी ठोस रोडमैप की कमी खटकती है। जब तक करेंगी, याद रहे कि हमारे यहाँ कार्यबल में महिला भागीदारी अभी भी वैश्विक औसत से कम है। इस स्थिति में सुधार तब तक नहीं आ सकता, जब तक कार्यस्थल और सार्वजनिक स्थलों पर महिलाएँ सुरक्षित महसूस न करें। अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो इस बजट ने सप्लाई साइड (संसाधन और ऋण) पर तो ध्यान दिया है, लेकिन डिमांड साइड (महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा) पर अभी और गहराई से काम करने की ज़रूरत है।
कुल मिलाकर, 5.01 लाख करोड़ का जेंडर बजट कागज़ों पर बहुत प्रभावशाली है। लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह पैसा अंतिम कतार में खड़ी महिला के हाथ में स्वतंत्रता बनकर पहुँचता है या सिर्फ एक अनुदान बनकर रह जाता है। कहना न होगा कि बजट 2026 ने महिलाओं को लाभार्थी से साझेदार बनाने की नींव तो ज़रूर रखी है; लेकिन इस इमारत को पूरा करने के लिए पितृ-सत्तात्मक बाधाओं और श्रम बाज़ार की विसंगतियों को और अधिक आक्रामक तरीके से संबोधित किया जाना चाहिए था!
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