शांत मन सुखी जीवन

सृष्टि में मनुष्य के अतिरिक्त न तो कोई जीव और न ही प्रकृति अशांत होती है, क्योंकि स्वाभाविक रूप से संसार में सब कुछ शांत रहता है। प्रकृति में ऋतुएं बदलती हैं। पतझड़ में वृक्षों के पूरे पत्ते झड़ जाते हैं तब भी न कोई जीव विचलित होता है और न ही वृक्ष, लेकिन मनुष्य प्रतिदिन छोटी-मोटी बातों से ही व्याकुल हो उठता है। सहज रूप से मनुष्य भी शांत प्रवृत्ति का है, लेकिन संसार की भाग-दौड़, लालच, अपेक्षा, ईर्ष्या, दुश्मनी, अहंकार, नकारात्मकता, क्रोध आदि के कारण वह ज्यादातर अशांत या बेचैन रहता है।

मनोवैज्ञानिक सत्य है कि जब हमारा मन अशांत होता है तब हमें सुख देने वाली चीजें भी दुःखदाई लगती हैं, जैसे- सूर्य का प्रकाश हमें प्रकाश नहीं बल्कि आग का गोला लगता है। वास्तविकता यह है कि शांति हमारे मन की एक सहज व सरल अवस्था है। हमें शांत रहने के लिए जीवन में तीन सूत्र अपनाने चाहिए- पहला समर्पण, दूसरा सकारात्मकता और तीसरा सब्र।

समर्पण का अर्थ है- अपने से बड़े या उच्च जिसे भी आप अपना आदर्श मानते हैं, मन से उसकी शरणागति में चले जाना। यह कोई आपका पारिवारिक सदस्य, मित्र, व्यावसायिक बंधु, गुरु, संत ज्ञानी या इष्टदेव अथवा भगवान हो सकता है। जीवन में जब कभी आपको कोई उलझन या समस्या आती है तब आप अपनी परेशानी मन से प्रार्थना या भाव के द्वारा व्यक्त करके समाधान पा सकते हैं।

समर्पण और धैर्य से मिलती है मन की सच्ची शांति

कई बार समाधान हमें संकेत के रूप में दिए जाते हैं, इसलिए हमको हमेशा सचेत और जागरूक रहना चाहिए। जब हम अपनी परेशानी किसी को समर्पित करते हैं तब हम उस परेशानी से मुक्त होते हैं और जिसे हमने परेशानी समर्पित की है, उसका समाधान देना उनकी जिम्मेदारी होती है। इसलिए शरणागति शांति का पहला सूत्र है।

सब्र या धैर्य में हर समस्या का निराकरण निश्चित रूप से छुपा है, जैसे- वृक्ष भी ऋतु आने पर ही फल देते हैं। मनुष्य इतने अधीर होते हैं कि यदि आज हमने किसी का भला किया तो अगले ही पल हम उसके सुखद परिणाम की आशा करते हैं। यदि हमारे किसी प्रारब्ध के कारण हमें कुछ नुकसान हो गया हो तो हम अपने द्वारा किए गए अच्छे कार्य को भी कोसने लगते हैं।

ऐसी स्थिति में हम यह भूल जाते हैं कि हर चीज का कोई न कोई कारण अवश्य होता है और उस कारण के जिम्मेदार भी हम स्वयं ही हैं। समर्पण से धैर्य बढ़ता है और धैर्य से हमें आंतरिक बल मिलता है, जब हम भीतर से स्वयं को बलशाली महसूस करते हैं तो हमारा मन स्वत: ही शांत रहता है। मानव जीवन हमें हमारे प्रारब्ध कर्मों को काटने के लिए मिला है।

सकारात्मक सोच और कृतज्ञता से मिलता है सच्चा सुकून

इसलिए धैर्यपूर्वक हर व्यक्ति, परिस्थिति और वस्तु का सामना करें तथा हर पल परमात्मा का धन्यवाद करें कि उसने आपके प्रारब्ध कर्म काटने के लिए इन चीजों को माध्यम बनाया। मन ही मन सभी माध्यमों से भी क्षमा याचना करें। आभार और क्षमा से हमारा धैर्य बढ़ता है तथा मन हल्का होता है। समर्पण और धैर्य से हमारे विचार सकारात्मक होने लगते हैं तथा हमें सद्व्यवहार करने के लिए प्रेरित करते हैं।

सकारात्मक दृष्टिकोण रखने पर हम मन की उलझनों के जाल में नहीं फंसते हैं। सकारात्मकता से हमारे जीवन में सहजता और सरलता आने लगती है जिससे हमारा मन शांत और जीवन सुखी रहता है । शांत रहने के लिए मन के पार जाने का तरीका भी बहुत उपयोगी है। इसके लिए हमें सजग रहना होगा और मन के सभी निर्देशों का पालन न करते हुए, जो सबके लिए कल्याणकारी हो, उसी का पालन करें।

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मन के पार जाने का अर्थ है कि आप जीवन के शिखर पर हैं और जीवन में जो कुछ भी घट रहा है, वह बिल्कुल मामूली-सी बात है, इस पर ध्यान न देकर अपने भीतर प्रवाहित होने वाले आनंद पर ध्यान दें और लोका समस्ता सुखिनो भवंतु की भावना से समस्त संसार के सुख की प्रार्थना करें ।

सद्गुरु रमेश

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