क्या नाम जप से परमात्मा को पाया जा सकता है?
मनुष्य जीवन का धर्म है- परमात्मा को पाना या उसमें लीन हो जाना। इसीलिए संसार के विभिन्न धर्मों में कई प्रकार से नाम जपने की प्रथा है। सनातन धर्म में भी नाम जप और मंत्र जाप का बहुत महत्व है। कई परंपराओं में भगवान के नाम या मंत्र को कम से कम एक सौ आठ बार या एक माला या दस माला प्रतिदिन करने का विधान है। प्रतिदिन हम कितनी बार भगवान का नाम जपते हैं, इसकी गिनती के लिए भी कई तरीके अपनाए जाते हैं।
कोई उंगलियों पर गिनता है, तो कोई किसी माला का सहारा लेता है। अब नाम गिनने के लिए एक छोटी-सी काउंटिंग मशीन आ गई है, लेकिन इतनी बार रोज भगवान का नाम लेते-लेते कई बार हमारे मन में प्रश्न उठता है कि हमें भगवान के दर्शन कब होंगे और हमारी आज कितनी माला हो गई हैं तथा कितनी बाकी है। रोज इसी के हिसाब-किताब घटा-जोड़ के विचार हमारे मन में चलते रहते हैं।
इसका अर्थ हुआ कि मानसिक रूप से हम भगवान का नाम जपते हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से हम कहीं और रहते हैं। मस्तिष्क में भगवत नाम और हृदय में काम चलता रहता है, जबकि परमात्मा को पाने के लिए बिल्कुल इसके विपरीत की स्थिति चाहिए यानी हर पल हृदय में भगवान और मस्तिष्क में कार्य आदि। हम तो गिनते जाते हैं कि हमने भगवान का नाम कितनी बार लिया है, लेकिन देखिए उसकी उदारता, सहृदयता, निस्वार्थ भाव की वह हम सबको हर रोज कितनी सांसें देता है, इसका कोई हिसाब-किताब नहीं रखता।
नाम जप बनाम परमात्मा का साक्षात्कार
अज्ञानतावश हम नाम जप से परमात्मा को पाने का प्रयास करते हैं। गुरु या संत के ज्ञान से जब हमें यह समझ में आता है कि परमात्मा सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और सर्वकालिक है तब हमारे मन में नाम जप की सार्थकता पर प्रश्न उठते हैं। यह सच है कि नाम जप की सहायता से हम सिद्धियां और शक्तियां प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन उस सर्वव्यापी चेतना में स्थित नहीं हो सकते।
नाम जप से परमात्मा को प्राप्त करना ऐसा है, जैसे हम धन-दौलत खर्च करके कुछ खरीद सकते हैं या प्राप्त कर सकते हैं, जबकि परमात्मा लेन-देन के बिल्कुल परे हैं। हर समय, हर स्थान तथा हर काल में हमारे अंदर या हमारे साथ रहता है, उसे प्राप्त करने के लिए गिन-गिन कर उसका नाम लेना एक प्रकार का अपराध है, क्योंकि इसका अर्थ यह हुआ कि हम हमेशा उसकी उपस्थिति को महसूस नहीं कर पाते।
परमात्मा की उपस्थिति को अपने साथ महसूस न करना उसकी अवहेलना करना है, उसकी उपेक्षा करना है। एक मिनट के लिए सोचिए, जब कोई आपकी अवहेलना या उपेक्षा करता है तो आपको कितनी तकलीफ होती है। इसी प्रकार उस सर्वव्यापी परमात्मा को पहचाने बिना जब हम व्यवहार करते हैं तब उसे कितनी तकलीफ होती होगी। नाम जप हमें बार-बार उसका स्मरण करने में सहायक हो सकता है, लेकिन हम एक ही स्थान पर बैठकर जब माला करते हैं या जाप करते हैं तभी तक हमें उसका स्मरण रहता है।
हर क्षण परमात्मा की अनुभूति ही सच्ची साधना
पूरे दिन हम संसार में संसार के लोगों की तरह ही व्यवहार करते हैं, जबकि हमें अपने कार्य- व्यापार, व्यवहार सब जगह उसकी अनुभूति करते हुए उसी के साथ बर्ताव करना है। इसका अर्थ हुआ कि हमें नाम माया और रूप माया के आगे जाना है, तभी हम हर जगह हैं। हमेशा परमात्मा के दर्शन कर सकते हैं। परमात्मा हमें हमेशा दर्शन दे रहा है, केवल हमारी दृष्टि दोषपूर्ण है, इसलिए दृष्टि को परमात्ममय करने से बिना नाम जप, कर्म-कांड, पूजा-पाठ के भी हमें हमेशा उसके दर्शन होंगे।
परमात्मा कोई वस्तु नहीं है, जिसकी धन-दौलत, मकान-दुकान की तरह उसकी गिनती करें, वह तो चेतना है, ऊर्जा है।
जब चौबीस घंटे हमारी सांसें चल रही हैं, हृदय धड़क रहा है और हमारे शरीर के अंदर सभी अंग अपनी-अपनी ािढयाएं ठीक से कर रहे हैं तो इसका अर्थ हुआ कि हर कण में परमात्मा व्याप्त है और वही सब कर रहा है।
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परमात्मा असीम और अनंत है। इसीलिए वह हमसे असीम प्यार करता है तथा जब हम भी उसके हर रूप-रंग को असीम निस्वार्थ प्रेम करते हैं, प्रशंसा करते हैं और आभार प्रकट करते हैं तो वह अपनी उपस्थिति खुले रूप में प्रकट करता है।सांसारिक लेन-देन की तरह परमात्मा को चढ़ावा चढ़ाना, छप्पन भोग लगाना, गिन-गिन कर उसका नाम जपना आध्यात्मिकता नहीं है। स्वयं में और सबमें परमात्मा की अनुभूति करते हुए सबके साथ सद् व्यवहार करना और मस्ती में रहना ही परमात्मा से एक हो जाना है।
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