हृदय में सत्संग के उतरने से होती है गौ सेवा : राधाकृष्णजी
हैदराबाद, जिस हृदय में सत्संग उतरता है, वही व्यक्ति सेवा करने आगे आता है। जिनके गद्दे नोट से भरे हैं, वह सेवा नहीं करते। गौ माता की सेवा सत्संग के हृदय में उतरने पर होगी। उक्त उद्गार अत्तापुर स्थित एसएनसी कन्वेंशन हॉल में ध्यान फाउंडेशन श्याम बाबा नंदीशाला, ध्यान फाउंडेशन गौशाला के तत्वावधान में योगी अश्विनी गुरुजी की प्रेरणा से आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस कथा का रसपान कराते हुए कथाव्यास गोवत्स राधाकृष्णजी महाराज ने व्यक्त किए।
महाराज ने कहा कि जीवन में जो काम मिला है, उसे करते रहो, प्रभु का नाम जपते रहो। काम छोड़कर भगत बनने से बढ़िया है, काम करते-करते भक्ति करो। यही जीवन में सबसे बढ़िया है। जीवन में गोपाल की स्मृति बनी रहे। जब हम भगवान को भूल जाते हैं, तभी से जीवन में उलझने आरंभ हो जाती है। श्रीकृष्ण के चरण में जाने से दुःख समाप्त हो जाता है। इसलिए प्रभु के चरणों का आश्रय लो।महाराज ने कहा कि वर्तमान में गायों की सेवा बहुत ही आवश्यक है, क्योंकि गाय प्रभु को अत्यंत प्रिय है। जिनके पास करोड़ों रुपये तिजोरी में है, पर वह गाय को चारा देने के लिए टस से मस नहीं होंगे, क्योंकि उनके हृदय में सत्संग उतरा ही नहीं है।
गौ सेवा, सत्संग और शुद्ध आचरण का महत्व
जिसके हृदय में सत्संग उतरता है, वही सेवा करने आगे आता है। जिनके गद्दे नोट से भरे हैं, वह सेवा नहीं करते। भगवान कृष्ण की आयु तीन वर्ष थी, फिर भी वह गाय को चराने के लिए जाना चाहते हैं। माँ यशोदा ने कहा कि पहले बड़े हो जाओ, तो ठाकुरजी ने कहा कि घर में बैठने से बड़ा नहीं होऊँगा, बल्कि गाय चराने से बड़ा हो जाऊँगा।
महाराज ने कहा कि कई लोग बेटी के ब्याह, बेटे के धंधे की फिक्र कर रहे हैं, उनके भविष्य को लेकर चिंतित हैं, पर गाय को क्या खिलाना है, इसकी चिंता नहीं है। जो ध्यान फाउंडेशन कर रहा है, ऐसी पीड़ा कभी साधु में भी देखने को नहीं मिलती। वह धन्य है, जिन्होंने ऐसों को जन्म दिया, ऐसा हृदय बना कि वह सेवा करने के लिए आगे आये। इसलिए जिसके हृदय में प्रभु बैठे हैं, वह सेवा करेगा ही। पहले भगवान ने स्वयं गाय चराई, फिर गीता का संदेश दिया।
बिना कृपा के प्रभु के विराजे यह कार्य नहीं होता। महाराज ने कहा कि व्यासजी ने नारदजी से कहा कि सभी को धन लाभ चाहिए, धर्म लाभ नहीं। लोगों को भक्ति की, धर्म की नहीं, बल्कि धन की, आरोग्य की इच्छा है। पहले आचरण की अनिवार्यता, फिर अनुष्ठान होने चाहिए। आचरण का पता नहीं, लेकिन अनुष्ठान बड़े-बड़े करते हैं। सुबह यज्ञ में बैठे, शाम को पार्टी में बैठे। नारदजी ने कहा व्यासजी आप ऐसे ग्रंथ की रचना करें जो कामना पूर्ति नहीं, बल्कि कृष्ण की प्राप्ति के लिए हो, ताकि लोगों का चित शुद्ध हो और श्रीकृष्ण की प्राप्ति हो।
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भगवतप्राप्ति हेतु अंतःकरण की शुद्धि का संदेश
मन शुद्ध होगा, तो श्रीकृष्ण सामने बैठे दिखेंगे। ऐसी कोई भी जगह नहीं, जहाँ भगवान नहीं है। घट घट में बैठे हरि व्यापक हैं, सर्वत्र हैं। हृदय शुद्ध हो तो सामने ठाकुरजी नजर आयेंगे। ऐसा साधन हो कि हृदय शुद्ध हो और जल्दी से ठाकुरजी मिल जाएँ। महाराज ने कहा कि श्रीमद् भागवत से बहुत जल्दी प्रभु मिल जाते हैं। यह तो स्वयं राजा परीक्षित द्वारा आजमाई हुई है, इसका परीक्षण हो चुका है।
जगत का जिसे पुरस्कार मिलता है, वह साक्षात्कार देता है, लेकिन परमात्मा जिसे मिलता है वह साक्षात्कार नहीं देता। अंतकरण शुद्ध तो भगवान नजर आते हैं। तब नारदजी ने व्यासजी को चार श्लोक सुनाये और इनसे ही व्यासजी ने 18000 श्लोकों की रचना कर श्रीमद् भागवत कथा तैयार की, जो भागवत की प्राप्ति करवाती है।
अवसर पर मुख्य यजमान एवं प्रसाद यजमान पुरुषोत्तमदास प्रेमलता दीपक सीमा विजयवर्गीय, प्रसाद यजमान ओमप्रकाश प्रेमलता अग्रवाल, कथा स्थल (हॉल) यजमान चंद्रकांत लक्ष्मी डाकोतिया, महेश सरिता डाकोतिया, महेन्द्र आशा डाकोतिया, अलंकार यजमान जयप्रकाश दीपक आशीष विजयवर्गीय, दैनिक यजमान विजय राठी, सुनील गुप्ता, निशा गुप्ता, सुरेश चंद्र लाहोटी व अन्य उपस्थित थे।
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