तिथि व्रतपितरों की तृप्ति के लिए करें तर्पण

तिथि मुहूर्त

विक्रम पंचांग के अनुसार, पौष माह की अमावस्या तिथि अंग्रेजी कैलंडर की 19 दिसंबर, शुक्रवार की सुबह 4 बजकर 59 मिनट से प्रारंभ हो रही है, जो 20 दिसंबर, शनिवार की सुबह 7 बजकर 12 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर पौष अमावस्या 19 दिसंबर, पावार को मानी जाएगी। इसी दिन स्नान, दान तथा अमावस्या से जुड़े सभी शुभ कार्य किए जाएंगे।

शुभ काल

इस दिन अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11 बजकर 58 मिनट से 12 बजकर 39 मिनट तक रहेगा।

अशुभ काल

राहुकाल मध्याह्न 11 बजकर 1 मिनट से 12 बजकर 18 मिनट तक है। इस अवधि में कोई भी शुभ या नया कार्य करने से बचना चाहिए।

शुभ योग और नक्षत्र

सुबह से दोपहर 3 बजकर 47 मिनट तक शूल योग सक्रिय रहेगा, जिसके बाद गण्ड योग शुरू हो जाएगा। सुबह से रात 10 बजकर 51 मिनट तक ज्येष्ठा नक्षत्र प्रभावी रहेगा। इसके बाद मूल नक्षत्र का आरंभ होगा।

पितर पूजा

दोपहर 11 बजकर 30 मिनट से 2 बजकर 30 मिनट तक।

स्नान-दान और पितृ शांति का विशेष पर्व

पौष माह की अमावस्या तिथि को पौष अमावस्या कहा जाता है। इस दिन स्नान और दान करना अत्यंत शुभ माना गया है, क्योंकि इससे विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। यह तिथि पितरों को याद करने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर देती है। इसी दिन लोग पितृ शांति के उपाय भी करते हैं ताकि जीवन में आशीर्वाद, समृद्धि और मानसिक शांति बनी रहे। कहा जाता है कि पितृ-दोष से जीवन में कई बाधाएं आती हैं।

पौष अमावस्या पर निर्धारित समय के अनुसार, पितरों को तर्पण, स्नान और दान करने का विशेष महत्व है। इस दिन का शुभ मुहूर्त, स्नान-दान का समय और पितरों को प्रसन्न करने की सही विधि जानना बेहद जरूरी माना जाता है। ब्रह्म मुहूर्त को स्नान और धार्मिक कर्मों के लिए सबसे शुभ माना जाता है। यदि किसी कारणवश ब्रह्म मुहूर्त में स्नान नहीं कर पाएँ, तो सूर्योदय के बाद भी कर सकते हैं।

दान और तर्पण से पितरों की कृपा का मार्ग

स्नान के बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र या जरूरत की अन्य चीजों का दान करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। अमावस्या का दिन पितरों की शांति और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इस दिन पितर धरती पर आते हैं और अपने वंशजों द्वारा किए गए तर्पण, श्राद्ध और दान को स्वीकार करते हैं। इसलिए सुबह स्नान करने के बाद तर्पण करना सबसे उत्तम माना जाता है।

इसके अलावा श्राद्ध, पिंडदान, पंचबलि कर्म और पितर तृप्ति से जुड़े अन्य कार्य भी किए जाते हैं। यह समय पितरों को प्रसन्न करने के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। जब पितर संतुष्ट होते हैं, तो पितफ-दोष समाप्त होता है, घर में सुख-समृद्धि आती है और जीवन की रुकावटें दूर होने लगती हैं। पितरों की कृपा से परिवार में शांति, सौभाग्य और उन्नति बनी रहती है।

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