डेथ टेक्नोलॉजी इंडस्ट्रीज, उगता हुआ भविष्य या भावनात्मक व्यापार 

इन दिनों दक्षिण भारत का एक वीडियो खूब देखा जा रहा है, जो एक विवाह समारोह का है। उसमें दूल्हे के दिवंगत पिता को स्वर्ग से उतरते हुए दिखाया गया है। वह समारोह में अपनी पत्नी और बेटों से मिलकर भोजन करते नजर आते हैं। इसके बाद उन्हें स्वर्ग की ओर प्रस्थान करते दिखाया गया है। इस वीडियो को देखकर अनेक लोग हैरान हो रहे हैं। कई लोग इसे देखकर भावुक हो उठते हैं, पर इस वीडियो ने कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं।

दरअसल, यह वीडियो एआई तकनीक से बनाया गया है जिसने डिजिटल क्रांति की तेज लहरों में बहते हुए अब जीवन की अंतिम सीमा यानी मृत्यु को भी तकनीकी प्रयोगों का हिस्सा बना दिया गया है। ऐसे प्रयोग पश्चिमी देशों में खूब फल-फूल रहे हैं। इसकी बदौलत वहां बाकायदा एक बड़ा उद्योग खड़ा हो गया है, जिसे डेथ टेक्नोलॉजी इंडस्ट्रीज नाम दिया गया है। दक्षिण भारत के वीडियो से पता चलता है कि अब भारत में भी इसके अंकुर फूटने लगे हैं। सवाल है कि यह हमारे समाज में उगता हुआ भविष्य है या भावनात्मक व्यापार?

क्या एआई मानसिक भ्रम और दुख को बढ़ाता है?

एआई के शोर के बीच डेथ टेक्नोलॉजी इंडस्ट्रीज एक नया और तेजी से उभरता क्षेत्र है, जो मृत्यु, शोक, अंतिम संस्कार और स्मृतियों से जुड़ी पारंपरिक प्रािढयाओं को तकनीक की मदद से नया रूप दे रहा है। यह उद्योग मृत्यु से जुड़े अनुभवों को डिजिटल, व्यक्तिगत, टिकाऊ और तकनीकी रूप से उन्नत बनाने का प्रयास करता है। डिजिटल और वर्चुअल स्मृतियां इसके प्रमुख पहलू हैं। इसके तहत मृतकों की याद में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बनाए जाते हैं, जहां उनके जीवन की कहानियां, फोटो, वीडियो और श्रद्धांजलियां साझा की जाती हैं।

कुछ स्टार्टअप ऐसे हैं, जो वर्चुअल रियलिटी में अंतिम मुलाकात का अनुभव भी देने लगे हैं। इतना ही नहीं, यह उद्योग अब लोगों के शोक में शरीक होने का कारोबार भी करने लगा है। ऐसे कई चैटबॉट्स हैं, जो मृतक के बात करने के ढंग और यादों को समेटकर ऐसा अनुभव देते हैं, जैसे लोग अपने दिवंगत परिजन से ही बात कर रहे हों।विदेशों में यह खूब लोकप्रिय हो रहा है और इसने बाकायदा एक बड़े बाजार का रूप ले लिया है। अब भारत में इसके लिए कारोबारी संभावनाएं तलाशने के लिए काम हो रहा है। जिस घर में भी मृत्यु होती है, वहां के लोगों को सांत्वना की जरूरत होती है।

डेथ टेक्नोलॉजी: श्रद्धांजलि या व्यवसाय?

अपने परिजनों को खो देने वाले लोगों के घर जाकर सांत्वना देना हमारे समाज का स्थापित लोकाचार है, जिसमें अब तकनीक शामिल हो गई है। कई डिजिटल श्रद्धांजलि वेबसाइट्स, ऑनलाइन श्राद्ध और पूजा सेवाएं वगैरह पहले से हैं। यह ट्रेंड कोविड काल में पनपे और अब टिकने लगे हैं। अब इसमें नया अवतार है- होलोग्राफिक प्रोजेक्शन, जिसमें मृत व्यक्ति जीवित दिखाई देता है।  
इस उद्योग में अपार संभावनाएं हैं। इसी कारण यह एक उभरता हुआ उद्योग है। इस उद्योग की नजरें देश के उन घरों पर हैं, जहां हर साल लाखों मृत्यु होती हैं और  हर परिवार के पास अपने बिछुड़ चुके परिजन की एक कहानी होती है जिसे सहेजा जा सकता है। आंकड़ों के अनुसार भारत में हर साल 8.4 मिलियन लोग मरते हैं। किसी परिजन की मृत्यु जहां किसी व्यक्ति के लिए अपूर्णीय क्षति है, तो वहीं डेथ टेक्नोलॉजी इंडस्ट्रीज इसे बड़े बाजार के रूप में देख रही है।

श्रद्धा और तकनीक के बीच संतुलन की जरूरत

पुरोहित वर्ग इसका विरोध कर रहा है, पर कोरोना के बाद शहरी मध्यम वर्ग और एनआरआई समुदायों में मृत्यु से जुड़े संस्कारों से ऑनलाइन जुड़ने की मांग तेजी से बढ़ रही है।  हर भेड़चाल की तरह अब होलोग्राफिक प्रोजेक्शन के जरिए मृतकों को वर्चुअली देखने का चलन बढ़ेगा, पर बड़ा सवाल यह है कि इस उद्योग के फैलने का समाज पर असर क्या होगा? क्या यह वास्तव में भावनात्मक सुकून का जरिया है या मानवीय संवेदनाओं से खेलकर पैसा बनाने का धंधा? इस पर विशर्म की जरूरत है।

इस तकनीक का उद्देश्य श्रद्धा और स्मृति को बनाए रखना है, परंतु इसके दुष्परिणामों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। जहां एक ओर यह तकनीक प्रवासी भारतीयों, तकनीक प्रेमी पीढ़ी और भावुक परिजनों की पसंद बनकर उभर सकती है, वहीं दूसरी ओर इसके अति भावुकता का व्यापार, आर्थिक शोषण और मानसिक असंतुलन का कारण बनने का भी डर है।

क्या तकनीक मृत्यु को अस्वीकारने का साधन बन रही है?

 हमारे जीवन-दर्शन में मृत्यु एक स्वाभाविक चरण और शाश्वत सत्य है, जिसका घटना लाजिमी है। हमें मृत्यु को स्वीकार कर आगे बढ़ना सिखाया जाता है, फिर भी यदि हम अपने परिजनों को पुनर्जीवित होते देखते हैं तो सवाल उठता है कि क्या हम मृत्यु को स्वीकार कर पा रहे हैं? श्रद्धांजलि अर्पित करना अलग बात है, पर जब हम तकनीक से मृतकों को पुनर्जीवित करते हैं तो क्या हम सच में श्रद्धांजलि दे रहे हैं या अपने मोह और मृत्यु को अस्वीकार करने को तकनीकी जामा पहना रहे हैं? किसी परिजन की मृत्यु को स्मृतियों में सहेजना और उससे प्रेरणा लेना तो समझ में आता है, पर उस मृत्यु को न होने जैसा दिखाना एक घट चुके सच को भावनात्मक रूप से अस्वीकार करना ही तो कहा जाएगा।

लिहाजा, हमें देखना पड़ेगा कि यह उद्योग कहीं मृत्यु रूपी सत्य को अनदेखा करने का माध्यम तो नहीं बन रहा?  हम दिवंगत की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं, इसके लिए पारंपरिक धार्मिक विश्वासों के आधार पर क्रिया-कलाप भी करते हैं। उस आत्मा को मोक्ष मिले, इसके लिए प्रार्थनाएं की जाती हैं। जब किसी की मृत्यु के उपरांत हम उसकी आत्मिक शांति के पक्ष में हैं तो उसे बार-बार वर्चुअली बुलाना, एआई के जरिए उससे संवाद करना, क्या यह आत्मा को बांधने के क्रिया-कलापों में नहीं गिना जाएगा? क्या यह सब उस आत्मा की शांति में हस्तक्षेप नहीं होगा?

मृत आत्मा की शांति बनाम डिजिटल पुनरागमन

जिस व्यक्ति के मोक्ष की हम कामना कर चुके, उसे इस प्रकार रूबरू कर लेना क्या पुन: आह्वान नहीं कहलाएगा? एक शोकाकुल परिवार जब एआई के जरिए आत्मा से बात करता है तो क्या ऐसा करना यथार्थ से दूर भागने की शुरुआत नहीं है? दिवंगतों के होलोग्राम को बार-बार देखना क्या वियोग के दु:ख को बढ़ाएगा नहीं?

 हमारे देश में जहां मानसिक बीमारियों को बीमारी ही नहीं माना जाता है, यह तकनीक परेशानी को बढ़ाने का सबब बन सकती है। यह ऐसी तकनीक है, जिसके जरिए भ्रांतियों और मानसिक भ्रम का खतरा मंडराने से इनकार नहीं किया जा सकता है। इससे अनेक वृद्धों, भावुक व्यक्तियों, मानसिक रूप से संवदेनशील और दिमागी तौर पर अस्वस्थ लोगों की समस्याएं बढ़ सकती हैं। होलोग्राम पर मृतकों को बार-बार देखना और चैटबॉट्स के जरिए उनसे बातें करना ऐसे लोगों को भ्रमित कर सकता है।

क्या डेथ टेक्नोलॉजी आत्मा की मुक्ति में बाधा है?

 डेथ टेक्नोलॉजी इंडस्ट्रीज भारत में अपने आरंभिक चरण में है, लेकिन इसके बीज  बोए जा चुके हैं। कोई भी तकनीक अपने आप में न तो बुरी है और न ही अच्छी, लेकिन इस पर विमर्श होना चाहिए कि उसका उपयोग किस दिशा में होना है। भारत जैसे भावनात्मक, सांस्कृतिक और धार्मिक देश में यह उद्योग जितना लाभदायक हो सकता है, उतना ही संवेदनशील भी। आवश्यकता है कि इसे एक मूल्य आधारित दिशा देने की। यह तकनीक श्रद्धा की सहायक बने, पर उसका विकल्प नहीं।

मृत्यु शाश्वत सत्य है और हमारे यहां इसे स्वीकार करके आगे बढ़ने पर जोर दिया जाता है, पर बड़ा सवाल है कि क्या ये उद्योग इस विचार के विरुद्ध नहीं है? क्या यह उद्योग अपने पर भावनात्मक निर्भरता और भ्रम का एक डिजिटल संस्करण प्रस्तुत नहीं करता?  निश्चित रूप से यह उद्योग मृत्यु का बाजारीकरण है। बाजारवाद के कंधों पर सवार तकनीक के जरिए श्रद्धा का अर्थ ही बदल जाएगा। जब कोई व्यक्ति नहीं रहेगा एवं एआई के जरिए उसकी उपस्थिति दर्ज की जाएगी और उसके लिए पैसा लिया जाए तो यह श्रद्धा नहीं, एक उत्पाद ही तो कहलाएगा।

तकनीक श्रद्धा की सहायक बने, विकल्प नहीं

यह उद्योग उस विचार के विपरीत है जो कहता है कि मिट्टी में मिल जाना ही जीवन की पूर्णता है। क्या यह आत्मा की मुक्ति के विरुद्ध नहीं है? तो फिर क्या इस उद्योग को नकार देना चाहिए? जरूरी नहीं कि हम पूरी तरह से इसे नकारें। नकारने के बजाय हमें श्रद्धा और तकनीक के बीच संतुलन बनाना चाहिए। इस तकनीक को संवाद तक पहुंचाने के बजाय श्रद्धांजलि तक सीमित रखना चाहिए। स्मृतियों को सहेजना गलत नहीं है पर बीती बातों से वर्तमान का भ्रम नहीं पैदा होना चाहिए।

अगर यह तकनीक मृत्यु को सम्मान देती है तो सही है पर मृत्यु को नकारने या मिटाने वाली तकनीक को स्वीकार करते वक्त सोचा जाना चाहिए। यह उद्योग हमें एक नई दुनिया की ओर ले जा रहा है पर हमें यह याद रखना होगा कि मृत्यु को स्वीकारना ही सबसे बड़ी परिपक्वता है। तकनीक श्रद्धा की सहायक बने, लेकिन श्रद्धा का स्थान न ले, यह सुनिश्चित करना जरूरी है।  

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