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‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ : वह दुर्बलता में नारी है !

भारत के हालिया विधानसभा चुनावों ने एक नई प्रवृत्ति को लगभग संस्थागत रूप दे दिया है – महिला मतदाताओं के बैंक खातों में सीधे नकद राशि का हस्तांतरण। तमिलनाडु से लेकर असम, पश्चिम बंगाल और केरल तक, चुनावी मौसम आते ही सरकारें और राजनीतिक दल महिलाओं के लिए विशेष कैश पैकेज घोषित कर रहे हैं। अनुमान है कि केवल चार राज्यों में ही करीब 24 हजार करोड़ रुपये सीधे महिलाओं के खातों में डाले जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल चुनावी रणनीति का केंद्र बन चुकी है, बल्कि लोकतंत्र के स्वरूप पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर रही है।

पहली नजर में यह पहल महिला सशक्तिकरण का प्रभावी माध्यम प्रतीत होती है। दशकों से आर्थिक रूप से हाशिये पर रही महिलाओं को प्रत्यक्ष नकद सहायता देना उन्हें घरेलू और सामाजिक निर्णयों में अधिक भागीदारी का अवसर देता है। तमिलनाडु में समर पैकेज, असम में बिहू बोनस और पश्चिम बंगाल में लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाएं इसी सोच का विस्तार हैं। कई राज्यों में इन योजनाओं ने महिलाओं को नियमित आय का एक आधार भी दिया है, जिससे उनके जीवन स्तर में कुछ सुधार देखा गया है। लेकिन यह तस्वीर का केवल एक पक्ष है।

चुनावी समय पर नकद योजनाओं का रणनीतिक राजनीतिक उपयोग

दूसरा और कहीं अधिक चिंताजनक, पक्ष यह है कि इन योजनाओं का समय और स्वरूप स्पष्ट रूप से चुनावी लाभ से जुड़ा हुआ है। चुनाव से ठीक पहले रकम बढ़ाना, बोनस देना या नई योजनाएं शुरू करना – ये सब एक सुनियोजित राजनीतिक संदेश का हिस्सा बनते जा रहे हैं। राजनीतिक दलों के बीच एक तरह की कैश ट्रांसफर प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है, जहाँ नीतिगत बहस और दीर्घकालिक विकास के बजाय तात्कालिक आर्थिक प्रलोभन हावी हो रहे हैं।

यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए कई स्तरों पर चुनौतीपूर्ण है। पहली चुनौती नैतिक है – क्या मतदाता को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ देकर उसके वोट को प्रभावित करना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है? भले ही इसे कल्याणकारी योजना का नाम दिया जाए, लेकिन चुनावी संदर्भ में इसकी मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। दूसरी चुनौती आर्थिक है – राज्य सरकारों पर इसका भारी वित्तीय बोझ पड़ता है।

उदाहरण के लिए, केवल पश्चिम बंगाल में ऐसी योजनाओं पर सालाना हजारों करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। यह खर्च दीर्घकाल में वित्तीय अनुशासन को कमजोर कर सकता है और विकास परियोजनाओं के लिए संसाधनों को सीमित कर सकता है। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण चुनौती राजनीतिक संस्कृति से जुड़ी है। जब चुनाव जीतने का सबसे आसान तरीका नकद हस्तांतरण बन जाए, तो शासन की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं।

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शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर नकद योजनाओं का प्रभाव

शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी ढाँचे जैसे मुद्दे पीछे छूटने लगते हैं। मतदाता भी धीरे-धीरे नागरिक से उपभोक्ता में बदल जाता है, जो नीतियों के बजाय तात्कालिक लाभ के आधार पर निर्णय लेने लगता है। वैसे मजे की बात यह है कि केवल नकद योजनाएं ही चुनावी जीत की गारंटी नहीं हैं। ऐसे टोटकों के बावजूद कई बार सरकारें हार भी चुकी हैं । यानी मतदाता पूरी तरह से खरीदे नहीं जा सकते। फिर भी, इन योजनाओं का प्रभाव नकारा नहीं जा सकता, खासकर तब जब महिला मतदाता कई राज्यों में निर्णायक भूमिका निभा रही हैं।

समाधान क्या है? सबसे पहले, चुनाव आयोग और न्यायपालिका को यह स्पष्ट करना होगा कि कल्याणकारी योजनाओं और चुनावी प्रलोभनों के बीच की सीमा क्या है। दूसरी ओर, राजनीतिक दलों को भी अल्पकालिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक नीतिगत दृष्टि विकसित करनी होगी। और अंततः, मतदाताओं – विशेषकर महिलाओं – को भी यह समझना होगा कि सशक्तिकरण केवल नकद राशि से नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसरों की समानता से आता है। बेशक, नकद हस्तांतरण की यह राजनीति लोकतंत्र को आसान तो बना रही है, लेकिन क्या यह उसे बेहतर भी बना रही है? यही वह प्रश्न है, जिसका उत्तर हमें आज नहीं तो कल अवश्य देना होगा।

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