कुछ याद है, आप पिछली बार लाइब्रेरी कब गये थे?

तेज रफ्तार से कम होती पाठकों की संख्या, पुस्तकालयों में पुरानी होती किताबें, किताबों में लगता फंगस, ये तमाम स्थितियां हमारी लाइब्रेरी के खत्म होने के शुरुआती संकेत हैं। कहीं ऐसा न हो कि हम डिजिटल दुनिया में इतने खो जाएं कि हम उनके अस्तित्व को भूल जाएं। याद रखें, किताबें खत्म नहीं हो रही, हमारी पढ़ने की और ज्ञान अर्जित करने की भूख खत्म हो रही है। आज भले ही डिजिटल प्लेटफॉम पर बहुत सी चीजें उपलब्ध हैं, इसके बावजूद किताबों का कोई विकल्प नहीं है।

साठ और सत्तर के दशक में पैदा होने वाली पीढ़ी के पास लाइब्रेरी जाकर घंटों पढ़ने बल्कि कहें तो परीक्षा के दिनों में अपने कॉलेज की या स्कूल लाइब्रेरी में पूरा दिन बैठकर तैयारी करने के बहुत अनुभव होंगे। यह वह दौर था, जब लोग अपने गली-मोहल्लों या अपनी लोकेलिटी या शहर के आसपास स्थित छोटी-बड़ी लाइब्रेरी में जाकर किताबों का अध्ययन किया करते थे या उन किताबों को एक सप्ताह या 15 दिन के लिए या एक महीने के लिए इश्यू करवाकर उन्हें घर पर पढ़ने के लिए लाया करते थे।

नमी और फंगस से खराब हो रहीं दुर्लभ किताबें

कॉलेज में भी ग्रेजुएशन या पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौरान या हायर स्टडीज के लिए कॉलेज या अपने कैंपस की लाइब्रेरी से किताबों को इश्यू करवाकर पढ़ना, पढ़ाई का यह एक अलग ही तरीका था। आज यह ट्रेंड काफी हद तक खत्म हो गया है। आज की पीढ़ी पढ़ने के लिए ज्यादातर डिजिटल माध्यमों पर ही निर्भर है। यही वजह है कि हमारी पुरानी पीढ़ी के पास देशी-विदेशी साहित्य और दूसरे विषयों का अच्छा ज्ञान है। आज की पीढ़ी जिस ज्ञान को अब धीरे-धीरे खो रही है। पिछले कुछ माह पहले मुंबई की एशियाटिक लाइब्रेरी जहां पर सैकड़ों दुर्लभ किताबें पाठकों को पढ़ने के लिए उपलब्ध है।

इस लाइब्रेरी की खस्ता हालत पर समाचार पत्र-पत्रिकाओं में बदहाली का रोना रोया गया था और बताया गया था कि एक जमाने में ज्ञान अर्जित करने वाले स्कॉलर और विद्यार्थी जिनके लिए कभी यह विद्या का मंदिर हुआ करता था, अब यह बेहद खस्ता हाल में है। यहां पर दुर्लभ पांडुलिपियां और पुरानी किताबें नमी की वजह से दीमक खा गई है। ये बेशकीमती किताबें फंगस लगने के कारण खराब हो गई हैं। यह अकेले मुंबई की एक बड़ी लाइब्रेरी की हालत नहीं है, दिल्ली की बड़ी-बड़ी लाइब्रेरी, कलकत्ता की एशियाटिक लाइब्रेरी का कमोबेश यही हाल है।

कम पाठकों के कारण लाइब्रेरी के राजस्व में गिरावट

जिन भवनों में यह बड़ी-बड़ी लाइब्रेरी हैं, उन भवनों की छतें और दीवारें खस्ता हाल हैं। इन सबको मरम्मत की जरूरत है। जर्जर और खस्ता हाल इमारतों के कारण महंगी और दुर्लभ पुस्तकें भी काफी खराब स्थिति में हो गई हैं। सवाल है इन खस्ता हाल लाइब्रेरीज में किताबों की बुरी स्थिति और इन्हें पढ़ने के लिए आने वालों लोगों की संख्या में कमी के चलते इनके रेवेन्यू में भी काफी कमी आयी है। इसके लिए सरकारी रख-रखाव को तो जिम्मेदार माना ही जा सकता है। हम आम लोग भी इसकी जर्जरता के लिए कम जिम्मेदार नहीं है।

दरअसल, पढ़ने और सीखने की हमारी भूख का स्थान अब दूसरी गतिविधियों ने ले लिया है। मोबाइल फोन ने हमारे जीवन में इतनी ज्यादा दखलअंदाजी कर ली है कि उसे अगर हम एक बार हाथ में लेकर बैठ जाते हैं तो अपना कीमती समय यूं ही गंवा देते हैं। हमें तो यह याद भी नहीं है कि किताबों के पन्नों से आने वाली खुश्बू कैसी होती है। लाइब्रेरी के उत्थान के लिए भले ही बड़े-बड़े वायदे किए जाएं और इन खस्ता हाल लाइब्रेरी के भवनों को दुरुस्त कर लिया जाए, लेकिन हमारी आने वाली पीढ़ी क्या इसके लिए सचमुच चिंतित है? ऐसे कितने जेन जेड और मिलेनियल्स हैं जो जाकर लाइब्रेरी में पठन-पाठन करते हैं।

ज्ञान के मंदिर लाइब्रेरी से दूर होती नई पीढ़ी

कहीं ऐसा न हो कि हमारी आने वाली पीढ़ियों को इन पुस्तकालयों के खंडहर ही देखने को मिलें। भले ही हम इसका ठीकरा राज्यों व सरकारों के माथे पर फोड़ें। हममें से कितने ऐसे लोग हैं, जो दशकों से कभी लाइब्रेरी की सीढ़ियां नहीं लांघे। ईश्वर की आराधना के लिए भले ही हम यहां से कहीं मीलों दूर की यात्रा कर लें और दर्शन के लिए घंटों लाइन में लगकर इंतजार करें, भले ही हम प्रसिद्ध मंदिरों की यात्रा के लिए कितना कड़ा श्रम कर लें। क्या कभी हमने सोचा है कि अपने आसपास की इस विद्या के मंदिर यानी लाइब्रेरी में जाकर हम कुछ घंटे सुकून से बैठकर कोई किताब ही पढ़ लें?

क्यों हमारे लिए मंदिर, मस्जिद या गिरजाघर आराधना के स्थल है, जहां हमें प्रतिदिन जाना जरूरी लगता है और लाइब्रेरी जाना जरूरी नहीं लगता? लाइब्रेरी एक ऐसी जगह जहां हमें दिमागी सुकून मिलता है और वहां की शांति में बैठकर हम बिना पैसा खर्च किए ज्ञान अर्जित कर सकते हैं। हमारे पास गली के कुत्तों को खिलाने के लिए काफी समय है, लेकिन घर के कोने में ही रखी किताबों की धूल झाड़कर हमारे पास पढ़ने के लिए फुर्सत ही नहीं है।

मोबाइल और सोशल मीडिया ने कम किया किताबों से जुड़ाव

सरकारी खर्च पर चलने वाली इन बड़ी-बड़ी लाइब्रेरी में ज्ञान का खजाना है, जिसे हम वहां जाकर पा सकते हैं। लेकिन इस मशीनी युग में जहां हम दिनभर अपने मोबाइल से ही दूसरों के साथ मैसेजिंग में व्यस्त हैं, व्हाट्सऐप चैट में बिजी हैं, ऐसे में भला लाइब्रेरी जाकर किताब पढ़ने का विचार हममें कैसे आ सकता है? वहां जाकर पढ़ना हमने खुद छोड़ा है। क्योंकि हममें से किसी को भी वहां जाकर पढ़ने की जरूरत ही नहीं महसूस होती।

यह भी पढ़े: कोफोर्ज पब्लिक लाइब्रेरी उद्घाटन, हैदराबाद

तेज रफ्तार से कम होती पाठकों की संख्या, पुस्तकालयों में पुरानी होती किताबें, किताबों में लगता फंगस, ये तमाम स्थितियां हमारी लाइब्रेरी के खत्म होने के शुरुआती संकेत हैं। कहीं ऐसा न हो कि हम डिजिटल दुनिया में इतने खो जाएं कि हम उनके अस्तित्व को भूल जाएं। याद रखें, किताबें खत्म नहीं हो रही, हमारी पढ़ने की और ज्ञान अर्जित करने की भूख खत्म हो रही है। आज भले ही डिजिटल प्लेटफॉम पर बहुत सी चीजें उपलब्ध हैं, इसके बावजूद किताबों का कोई विकल्प नहीं है।

-विवेक कुमार

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