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अहंकार और असंतोष है भीतर की सबसे बड़ी बीमारी

विश्व के अधिकांश सफल लोग इस एक बात को दृढ़ता से मानते हैं कि बिना कष्ट किये फल नहीं मिलता। अतः जो व्यक्ति समृद्ध होना चाहता है, उसे पीड़ा या दर्द सहना ही पड़ता है। दुनिया में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं होगा, जिसे दर्द का एहसास हुआ ना हो। ज़ाहिर है कि हम सभी इस मर्ज़ के अनुभवी हैं, किंतु हममें से अधिकांश लोग मानसिक दर्द और शारीरिक दर्द के बीच के विशाल अंतर से अनभिज्ञ रहते हैं। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में हुई विशाल प्रगति के कारण आज विविध प्रकार की उपलब्ध दवाओं से शारीरिक पीड़ा से मनुष्य से कुछ समय का आराम मिल जाता है, किन्तु मानसिक पीड़ा का इलाज नहीं हो पाता है।

हम उसके इलाज के बारे में सोचे, उससे पूर्व हमें इस मर्ज़ के कुछ मुख्य कारणों को जानना होगा। हममें से ज्यादातर लोग इस तथ्य से इंकार करते हैं कि उनकी मानसिक पीड़ा का मुख्य कारण उनका ही अपना अहंकार है। अहंकार वश व्यक्ति ऐसा अंधा हो जाता है कि पूर्ण रूप से अपने मूल अस्तित्व को भूला देता है, अपनी अंतरात्मा से विमुख हो जाता है। इस अवस्था से बाहर निकलने का मात्र एक ही रास्ता है- आत्मनिरीक्षण करना।

भौतिक प्रगति के बावजूद आंतरिक संतुष्टि की कमी

दुर्भाग्यवश इस रास्ते पर कोई भी चलना नहीं चाहता है, क्योंकि उसके लिए अपने भीतर जाने की विधि किसी को भी आती नहीं है। ‘असंतोष’ भी अहंकार के समान मानसिक पीड़ा देने का अन्य महत्वपूर्ण कारक है। हालांकि वह बहुत सूक्ष्म है, परंतु हमारा भीतरी रूप से बहुत नुकसान करता है। हम सभी एक प्रतिस्पर्धात्मक दुनिया में जी रहे हैं। हम लगातार अनेक प्रकार की जटिलताओं का सामना कर रहे हैं। परिणाम स्वरूप उत्तरजीविका एक चुनौती गई है। इसलिए हम कितनी भी भौतिक प्रगति कर लें, लेकन आंतरिक संतुष्टि की अनुभूति करने में असफल रहते हैं। इसका मूल कारण मुख्य रूप से एक बात है- ‘जो स्वयं से संतुष्ट नहीं, वह सारी दुनिया से असंतुष्ट रहेगा।’

-राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंज

अतः मूल बात है- पहले स्वयं से संतुष्ट रहना। इसके लिए सबसे सरल उपाय है- अपने आंतरिक खुशी के खजाने की तरफ नज़र करना। जी हाँ, यहाँ-वहाँ बाहरी खुशी को प्राप्त करने के बजाय जो अपने अंदर छुपी हुई ख़ुशी है, उसे आत्मनिरीक्षण की विधि द्वारा बाहर लाना, उसे दूसरों के साथ बांटना। फिर देखो, कैसे आपका और अन्यों का दर्द बिल्कुल गायब हो जाएगा। तो चलिए, खुद को आज से अहंकार रहित करके स्वयं संतुष्टि द्वारा आंतरिक खुशी के ख़जाने को बाहर निकालें और उसे बाँटकर सभी के दुःख-दर्द मिटाने का नेक कार्य करें।

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