सुंदर जीवन को नष्ट कर देता है अहंकार

मनुष्य में विद्यमान दिव्यता सर्वत्र होती है। यह सभी जीवित प्राणियों में समान विद्यमान होती है। इसलिए मनुष्य को यह बात समझनी चाहिए कि यदि दूसरों के कार्यों से आपको पीड़ा होती है, तो आपके द्वारा किए गए वैसे ही कार्यों से दूसरों को भी वैसी ही पीड़ा होती है। यदि आप चाहते हैं कि दूसरे आपका सम्मान करें, तो पहले स्वयं दूसरों का सम्मान करें। दूसरों के प्रति समान भाव प्रदर्शित किए बिना आप उनका सम्मान प्राप्त नहीं कर सकते।

इसलिए आपको यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आपके कार्य, आपकी दृष्टि और आपके शब्द सही हों। प्रत्येक मनुष्य के लिए विनम्रता और आदर अनमोल आभूषण हैं। विनम्रता सही शिक्षा की पहचान है। जब मनुष्य अहंकार या असंतोष से भर जाता है, तो विनम्रता खो जाती है। विनम्रता का पालन हर परिस्थिति में किया जाना चाहिए। यह हृदय से प्रकट होनी चाहिए। अहंकार बाहरी रूप से प्राप्त होता है। अहंकार के कारण हमारे अन्य सद्गुण भी दब जाते हैं।

यह एक ऐसा अवगुण है, जो हमारे जीवन-पथ को पूरी तरह से बर्बाद कर देता है। इसके कई प्रमाण पुरातन ग्रंथों में वर्णित हैं। कंस, रावण, दुर्योधन, सिकंदर आदि को अपने बल का अहंकार था, जो उनके विनाश का कारण बना। इसलिए तो कहा जाता है कि जब ज्ञान में अहंकार मिल जाता है, तो विवेक नष्ट हो जाता है और व्यक्ति नीति-अनीति का भेद भूलकर विनाश के मार्ग पर चल पड़ता है।

अहंकार पर विजय और विनम्रता से जीवन में संतुलन

अहंकार से बुद्धि भ्रष्ट होती है। इसके कारण हम अपने हितेषियों की उचित सलाह को भी ठुकरा देते हैं, जो हमारे पतन का कारण बनता है। इसलिए हमें सदा विनम्र रहना चाहिए। अहंकार हमारे मस्तिष्क को सीमित कर देता है, जो किसी भी व्यक्ति को भौतिकवादी और प्रतिस्पर्धा से परिपूर्ण इस दुनिया से ऊपर उठकर नहीं सोचने देता। एक विनम्र व्यक्ति कई बार बुरे से बुरे शब्दों और क्रियाओं को अपने भीतर ही रखता है।

वह जानता है कि इन्हें बाहर निकालना ठीक नहीं है। यह संबंधों पर आघात कर सकता है। ऐसे व्यक्तियों को ही ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त होता है। हमें प्रकृति विनम्र बने रहने के गुण सीखाती है, चाहे पृथ्वी हो या पेड़-पौधे। प्रकृति हमें विनम्रता, धैर्य और परोपकार का पाठ सिखाती है। फलों से लदे झुकते पेड़, निस्वार्थ बहती नदियाँ और अडिग पर्वत हमें सिखाते हैं कि सफलता और ताकत के बावजूद विनम्र रहना चाहिए। यह हमें अहंकार को तजकर सहजता और जीवन में संतुलन बनाए रखने का संदेश देती है।

प्रकृति से विनम्रता का पाठ

झुकते हुए पेड़ विनम्रता का संदेश देते हैं, जैसे फलों के पेड़ बोझ से झुक जाते हैं, वैसे ही सफलता मिलने पर इंसान को अहंकार के बजाय विनम्र होना चाहिए।

नदी और वृक्ष का परोपकार: नदी अपना जल स्वयं नहीं पीती और वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, जो निस्वार्थ सेवा का संदेश देता है।

मिट्टी की सहनशीलता: मिट्टी हमें सहनशील बनना और सभी के प्रति उदारता रखना सिखाती है।

पर्वत की दृढ़ता: पर्वत अडिग रहकर हमें कठिन परिस्थितियों में भी धैर्यवान और स्थिर रहने की शिक्षा देते हैं।

पतझड़ और परिवर्तन: पतझड़ सिखाता है कि अंत का अर्थ विनाश नहीं, बल्कि नई शुरुआत है, जो जीवन में संतुलन बनाए रखता है।

प्रकृति के सान्निध्य में रहने से हम सादगी और दूसरों के साथ सामंजस्य बिठाकर रहना सीखते हैं और यही हमारे जीवन की सफलता का मार्ग निश्चित करती है। श्रीमद्भागवत में भगवान कहते हैं,

अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोभ्यसूयकाः।।

पवन गुरू

अर्थात: जो लोग अहंकार, बल, घमंड, कामना और क्रोध के आश्रित हैं, वे दूसरों के शरीर में स्थित मुझ परमात्मा से द्वेष करते हैं और दूसरों के गुणों में दोष निकालते हैं। ऐसा घमंड विनाशकारी होता है।

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