तमिलनाडु में चुनाव ब्लॉकबस्टर मूवी बनते जा रहे हैं

बहरहाल, सबकी निगाहें स्टालिन की तरफ हैं कि वह 2021 को दोहरा सकते हैं या नहीं जब उनकी द्रमुक ने 173 में से 133 सीटों पर जीत दर्ज की थी। लेकिन बिना सुपरस्टार के तमिलनाडु के चुनाव होते नहीं हैं, इसलिए दोनों गठबंधन विजय की टीवी के पार्टी को अपनी ओर खींचने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि विजय ने अपनी सियासत की नींव इस बात पर रखी है कि बीजेपी विचारधारा के आधार पर दुश्मन है और द्रमुक सियासी प्रतिद्वंदी, तो क्या तमिलनाडु में नया सितारा चमकेगा?

गृहमंत्री अमित शाह की सहमति से बीजेपी के एक प्रतिनिधि ने 8 जनवरी 2026 की शाम को पीएमके के संस्थापक एस. रामदास से उनके चेन्नई स्थित निवास पर मुल़ाकात की और उन्हें उनके बेटे अंबुमणि के पीएमके गुट से अधिक सीट देने की पेशकश की। ऐसा अनेक सूत्रों का दावा है। इसका अर्थ यह है कि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी हर संभव कोशिश कर रही है कि रामदास एनडीए में शामिल हो जाएं।

रामदास के बेटे अंबुमणि ने अपने पिता से अलग होकर अलग पीएमके गुट गठित कर लिया है, जिसे अन्ना द्रमुक व बीजेपी गठबंधन ने न सिर्फ स्वीकार कर लिया है बल्कि उसे उसकी पसंद की सीटें भी आवंटित कर दी हैं। इस बात से रामदास नाराज़ हैं। चूंकि तमिलनाडु के एक वर्ग में रामदास की अच्छी पकड़ है, इसलिए बीजेपी उन्हें अपने साथ लाने की कोई कसर नहीं छोड़ रही है।

पीएमके दो फाड़, अंबुमणि गुट को अन्ना द्रमुक ने मान्यता दी

पीएमके के साथ वही हुआ है, जो महाराष्ट्र में शिव सेना व एनसीपी के साथ हुआ था। पार्टी दो फाड़ हुई, असल पार्टी किसकी है और किसके साथ है इस पर क़ानूनी विवाद है, लेकिन अन्ना द्रमुक व बीजेपी ने अंबुमणि की पीएमके को असल के रूप में स्वीकार कर लिया है, जैसे महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे (शिव सेना) व अजित पवार (एनसीपी) को मान्यता प्रदान कर दी गई थी। रामदास, जिन्हें तमिलनाडु की राजनीति में अय्या कहकर पुकारा जाता है, इसी बात से नाराज़ हैं।

बहरहाल, बीजेपी के प्रतिनिधि ने अय्या से वायदा किया है, सूत्रों के अनुसार, कि उन्हें अंबुमणि से अधिक सीटें दी जायेंगी। अय्या से यह भी कहा गया है कि उन्हें न तो अपने बेटे के साथ मंच साझा करने के लिए कहा जायेगा और न ही अंबुमणि के प्रत्याशियों के लिए प्रचार करने को कहा जायेगा। इसके अतिरिक्त बीजेपी ने अय्या को विश्वास दिलाया है कि उनके प्रत्याशी पीएमके के मूल चुनाव चिन्ह आम पर चुनाव लड़ सकेंगे।

अय्या से यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इच्छा है कि वह एनडीए में शामिल हो जाएं। रामदास ने इस प्रस्ताव पर विचार करने के लिए चार दिन का समय मांगा है। पीएमके ने 2021 के विधानसभा चुनाव में एनडीए का हिस्सा रहते हुए 23 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें से उसने 5 पर जीत हासिल की थी, लेकिन 2024 के लोक सभा चुनाव में वह अपना खाता भी नहीं खोल पायी थी।

स्टालिन सरकार की तारीफ से गठबंधन बदलने के संकेत

सवाल यह है कि क्या रामदास एनडीए में लौटेंगे? मुश्किल लगता है। सबसे पहली बात तो यह है कि वह अपनी पार्टी तोड़े जाने व अन्य कारणों से अपने बेटे अंबुमणि से बहुत नाराज़ हैं। अन्ना द्रमुक व बीजेपी द्वारा अंबुमणि को नेता मानने ने आग में घी का काम किया है। रामदास यह भी जानते हैं कि किस तरह बड़ी मछली (बीजेपी) छोटी मछलियों (अकाली दल, शिव सेना आदि) को खा जाती है।

फिर रामदास ने हाल ही में स्टालिन के नेतृत्व वाली सरकार की तारीफ की है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वह पाला बदलने पर विचार कर रहे हैं, द्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन की ओर जिसमें कांग्रेस भी है। अय्या ने कहा, एमके स्टालिन का शासन अच्छा है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि उनके नेतृत्व में पीएमके ने 2006 में एम करुणानिधि की सरकार को बिना शर्त समर्थन दिया था, जब विधानसभा में उसके पास पर्याप्त बहुमत नहीं था।

हालांकि रामदास का खेमा द्रमुक के संपर्क में है, लेकिन उसके विकल्प सीमित हो सकते हैं; क्योंकि वहां थोई थिरुमावालावन की वीसीके मौजूद है, जिससे पीएमके की कट्टर प्रतिद्वंदिता है। थिरुमावालावन ने निरंतर दोहराया है कि वह उस गठबंधन का हिस्सा कभी नहीं हो सकते, जिसमें पीएमके और बीजेपी शामिल हों। लेकिन रामदास का कहना है कि राजनीति में कुछ भी हो सकता है, जिसकी उम्मीद नहीं की जा सकती वह भी। जब बाप बेटे आमने-सामने हो सकते हैं, अकोला (महाराष्ट्र) में बीजेपी व असदुद्दीन ओवैसी की एमआईएम गठबंधन कर सकते हैं तो सियासत में क्या नहीं हो सकता।

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जाति और सामाजिक न्याय की राजनीति चुनाव परिणाम तय करेगी

वैसे भी भारत में अब विचारधारा व सिद्धांतों की राजनीति तो रही नहीं है। अब सियासत में एकमात्र लक्ष्य सत्ता पाना रह गया है, न कोई दोस्त है और न कोई दुश्मन या प्रतिद्वंदी। कपिल मिश्रा ने दिल्ली विधानसभा में ऑन-रिकॉर्ड प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपमान की हद तक आलोचना की व आपत्तिजनक आरोप लगाये और अब वह दिल्ली की बीजेपी सरकार में मंत्री हैं। इसलिए रामदास भी किसी भी गठबंधन में जा सकते हैं।

यही कारण है कि तमिलनाडु के चुनाव ब्लॉकबस्टर फिल्म की तरह होते हैं- हंगामी, रंगीन, तीखे संदेश और एल्फा स्टार्स। भारत में तमिलनाडु के अतिरिक्त कोई अन्य राज्य नहीं है जहां राजनीतिक ऐक्टर्स अतिशयोक्तिपूर्ण हों यानी जो अपनी उपस्थिति से लोगों को मोहित कर लें और सामान्य से अधिक ऊर्जावान हों। यह सिर्फ इसलिए नहीं है कि अनेक पार्टियों की स्थापना फिल्मी सितारों ने की। विजय नवीनतम हैं बल्कि इस वजह से भी कि लोगों तक राजनीतिक विचार पहुंचाने में सिनेमा सशक्त माध्यम रहा है।

राजनीतिक विचारधारा जितनी स्पष्ट तमिलनाडु में परिभाषित है, उतनी किसी अन्य राज्य में नहीं है। इस राज्य की सामाजिक न्याय की राजनीति जाति आधारित है, जिसमें कहीं वाम तो कहीं दक्षिण पंथ का मिश्रण है, जोकि स्वर्ण जाति की सियासत के पुनर्जागरण से अधिक पैनी हो गई है। तमिलनाडु विधानसभा की 234 सीटों के लिए चुनाव बहुकोणीय होने के नाते अधिक दिलचस्प होते हैं, लेकिन इस बार हार-जीत इस बात पर निर्भर रहेगी कि जाति के धागे पहले से ज़्यादा मज़बूत हुए हैं या कमज़ोर। इसलिए छोटी-छोटी पार्टियों का महत्व बढ़ जाता है।

अन्ना द्रमुक, पीएमके और बीजेपी के बीच चुनावी मुकाबला

रामदास की पीएमके को अपनी ओर खींचने के प्रयासों की यही वजह है। इस बार एक नई बात यह हुई है कि थिरुमावालावन की वीसीके मान्यता प्राप्त राज्य पार्टी के रूप में चुनाव में उतर रही है, जोकि एक दलित पार्टी के लिए दुर्लभ उपलब्धि है और तमिलनाडु में तो ऐसा पहली बार हुआ है। लोकसभा 2024 चुनाव में वीसीके ने 2 प्रतिशत मतों के साथ 2 सीटें जीती थीं। हालांकि अभी गठबंधनों को अंतिम रूप दिया जा रहा है, लेकिन फिलहाल की स्थिति यह है कि एक तरफ द्रमुक (स्टालिन), वीसीके (थिरुमावालावन), एमएनएम (कमल हासन), एमडीएमके (वायको), वामपंथी व कांग्रेस हैं और मुकाबले पर अन्ना द्रमुक (ईपीएस), पीएमके (अंबुमणि) और बीजेपी हैं।

बीजेपी चाहती है कि एएमएमके (धिनाकरन) डीएमडीके (दिवंगत ऐक्टर विजयकांत की पार्टी) और पीएमके (रामदास) एनडीए में लौट आयें। ईपीएस अभी भी चुनाव आयोग द्वारा नियंत्रित चुनाव चिन्ह (दो पत्तियों) विवाद में ओपीएस से उलझे हुए हैं, जिन्हें पार्टी से निकाल दिया गया था। बीजेपी ओपीएस को वापस अन्ना द्रमुक में चाहती है, जिसे ईपीएस मानने के लिए तैयार नहीं हैं।

शाहिद ए चौधरी
शाहिद ए चौधरी

अन्नामलाई ईपीएस की खुलकर आलोचना कर रहे हैं, इसलिए ओपीएस की वापसी की संभावना है। बहरहाल, सबकी निगाहें स्टालिन की तरफ हैं कि वह 2021 को दोहरा सकते हैं या नहीं जब उनकी द्रमुक ने 173 में से 133 सीटों पर जीत दर्ज की थी। लेकिन बिना सुपरस्टार के तमिलनाडु के चुनाव होते नहीं हैं, इसलिए दोनों गठबंधन विजय की टीवी के पार्टी को अपनी ओर खींचने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि विजय ने अपनी सियासत की नींव इस बात पर रखी है कि बीजेपी विचारधारा के आधार पर दुश्मन है और द्रमुक सियासी प्रतिद्वंदी, तो क्या तमिलनाडु में नया सितारा चमकेगा?

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