याचिका की सुनवाई योग्यता की जाँच आवश्यक

हैदराबाद, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट करते हुए कहा कि भद्राचलम श्रीराम मंदिर में वर्ष 2012 से पूजा पद्धतियों में परिवर्तन के संबंध में दायर याचिकाओं के गुण दोष पर निर्णय लेना आवश्यक है।

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस सूरेपल्ली नंदा ने सोमवार को श्रीराम विवाह के दौरान सीताराम के गोत्र और प्रवर में परिवर्तन को चुनौती देने वाली वर्ष 2022 में दायर याचिकाओं की फिर से सुनवाई शुरू की। उन्होंने कहा कि पहले इसी उच्च न्यायालय की खण्डपीठ द्वारा दिए गए आदेशों के अनुसार याचिकाओं के गुण दोष की जाँच किए बिना, साथ ही एकल न्यायाधीश के आदेशों के अनुसार, विशेषज्ञ समिति के गठन, रिपोर्ट के रिकॉर्ड में होने आदि की जाँच किए बिना कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता।

इस स्तर पर सरकारी अधिवक्ता बूक्या मांगीलाल नायक ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि महाधिवक्ता इस मामले पर दलील रखेंगे। वह वर्तमान में अनुपलब्ध हैं, इसीलिए वे अदालत से समय देने का आग्रह कर रहे हैं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए न्यायाधीश ने कहा कि महाधिवक्ता को आगामी 25 मार्च को याचिकाओं के गुण दोष पर अपनी दलील रखनी होगी। इसके साथ ही याचिकाकर्ताओं की दलील भी सुनी जाएगी।

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याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि मंदिर का संचालन मंदिर के संस्थापकों की मंशा के अनुसार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि पूजा-अर्चना परम्पराओं के अनुसार नहीं की जाती है, तो यह अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन है। इसीलिए यदि इनका उल्लंघन हुआ है, तो याचिकाएँ सुनवाई योग्य हैं। सरकार और प्रतिवादियों के तर्क के लिए याचिकाओं की सुनवाई 25 मार्च तक स्थगित कर दी गई।

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