डर और खुशी
कहानी
हैलो, भाई साहब! मैं आपसे मिलना चाहता हूं। किसी अजनबी का फ़ोन था, लेकिन स्वर में आत्मीयता थी। जी, आप कौन? आदमी ने पूछा। आदमी उस वक्त शीशे के सामने खड़ा होकर शेव कर रहा था। जी, मैं डर बोल रहा हूं। आवाज़ में विनम्रता और मधुरता थी, आदर भाव भी। मोबाइल फ़ोन में यही आफत है, कोई भी, कभी भी, कहीं भी कॉल कर देता है। उसे झुंझलाहट हुई। संयत होकर उसने कहा, अरे! भाई सुबह ही सुबह मज़ाक मत कीजिए। बताइए न आप कौन?
उसकी बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि उधर से आवाज आई, जी भाई साहब! मैंने कहा न डर हूं। अच्छा मैं आपसे मिलने आ रहा हूं। कहते हुए उसने कॉल ड्रॉप कर दी। अजीब आदमी है! उसने सोचा। ऑफिस का कोई दोस्त या पड़ोसी आवाज़ बदलकर मज़ाककर रहा होगा। थोड़ी देर बाद ही उसके घर की डोर बेल बजी। उसने खुद जाकर दरवाज़ा खोला। देखा सामने एक सुंदर-सा युवक खड़ा था। उसने प्रश्नवाचक मुद्रा में आगंतुक की ओर देखा। सुंदर गोरा रंग। शानदार ब्राण्डेड कपड़े। कीमती जूते। एकदम चमकता सुदर्शन चेहरा।
जी नमस्ते! मैंने ही आपको फोन किया था। म़ाफ करना। मैं ही डर हूं। कहते हुए वह अत्यंत विनम्रता से झुका। आदमी चक्कर में पड़ गया, क्या यह कोई सिरफिरा है या ऐसे ही मज़ाक कर रहा है। वारदात करने वाले गिरोह का कोई कोई नया तरीका तो नहीं है। आप परेशान न हों। एक कप चाय मिलेगी? कहते हुए उसने आदमी की तऱफ बेतकल्लुफी से हाथ बढ़ाया।
डर भी कभी मेहमान बनकर आया था
ढीले हाथ से आदमी ने उस अजनबी से हाथ मिलाया और अनमने भाव से हां में सिर हिलाते हुए कहा, क्यों नहीं, आइए! आदमी के अंदर संशय और गाढ़ा हो रहा था। चलो आज देखें क्या होता है, इस भाव के साथ वह उस सुदर्शन युवक को ड्राइंग रूम में ले आया। जो अपने आप को डर बता रहा था, वह मुस्कुराते हुए इत्मीनान के साथ सोफे पर बैठा था। आदमी को डर नहीं लग रहा था, बल्कि आश्चर्य हो रहा था।
आदमी ने पत्नी को दो कप चाय लाने के लिए बोल दिया। यार! तुम भी कैसे डर हो? तुम्हें देखकर कोई डर ही नहीं सकता! आदमी ने मज़े लेते हुए खेल भाव से उसे छेड़ा। फिर झेंपते हुए अपने मन की बात कही, डर तो बहुत भयानक-सा होता है। एकदम डरावना। राक्षसों जैसा। काला रंग, बड़े-बड़े दांत, सिर पर सींग। पूरे शरीर पर घने बाल। बड़ी-बड़ी लाल-लाल आंखें। भद्दे होंठ। विद्रूप और खूंखार चेहरे पर बेतरतीब बड़ी-बड़ी मूंछें। आड़े-तिरछे कान..।
अब मैं इसी तरह रहता हूं। संजीदा होकर डर ने कहा। और मुस्कुराकर बोला, मैं किसी को डराता नहीं हूं। अगर यह सचमुच डर है तो कितना भला और मज़ेदार है! आदमी ने सोचा। अब मैं आपके साथ ही रहूंगा। डर ने हंसते हुए कहा। मज़ाक समझकर आदमी ने भी कह दिया, हां-हां क्यों नहीं, ये घर आपका ही है।
अब डर आदमी के साथ रहने लगा।
अब आदमी को अपने चारों ओर डर ही डर दिखाई देने लगा। ऑफिस में मुस्कुराते हुए खूबसूरत ऑफिसर का चेहरा उसे डर का ही चेहरा लगता। खेलते हुए बच्चों के हाथों में क्रिकेट की बॉल उसे बम दिखाई देने लगी। आदमी जब बाज़ार जाता तो बड़े-बड़े मॉल और सजे हुए बाज़ार ऐसे लगते मानो इनमें डर ही सजाकर रखा हुआ है। वह अखबार पढ़ता, राष्ट्राध्यक्ष ने शांति की अपील की है।
घर के एक कोने में बैठा डर उसकी ओर देखकर मुस्कुराता।टेलीविजन समाचार में किसी शांति स्तूप प्रांगण में रक्षामंत्री घूमने गए हैं, डर सामने बैठा उसकी ओर देखने लगा। वह कहीं जाता और रास्ते में कोई दोस्त मिलता हाल-चाल पूछता तो महसूस होता कि दोस्त नहीं डर है, जो कैसे हो प्यारे! -बोल रहा है। मोबाइल फ़ोन पर कोई कॉल आती तो लगता डर का कॉल है। व्हाट्स अप पर मैसेज का संकेत आता तो लगता डर का मैसेज है।
दरवाजे की घंटी बजती तो लगता डर ही घंटी बजा रहा है। अखबारों की खबरों में डर लिखा हुआ है। विज्ञापनों के रंगीन चित्रों में भी डर मुस्कुरा रहा है। महंगाई, युद्ध, शांति वार्ताओं में भी डर की छाया है। डॉलर की तस्वीर पर डर छपा है। टेलीविज़न के पर्दे पर नाचती अर्धनग्न लड़की.. शान्ति की अपील करता कोई नेता, मंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति.. सब डर के चेहरे लगने लगे थे। वह समाचारों में देखता कि शांति वार्ताओं की मेज़ों पर राष्ट्राध्यक्षों के बगल में मुस्कुराता डर भी बैठा हुआ है।
डर के बदलते चेहरे और जीवन की एकरसता
अब तो आदमी को डर के साथ रहने की आदत हो गई। अपनी खूबसूरती के साथ डर आदमी के पूरे घर में फैला रहता। धीरे-धीरे डर के साथ रहते-रहते आदमी को अपने जीवन में एकरसता आने लगी। वह परेशान-सा रहने लगा। उसे नया कुछ देखने और करने को चाहिए था। उसने अपनी इच्छा डर को बताई। डर अब अपने साथ आदमी को बाहर घुमाने ले जाने लगा। उसने देखा खूबसूरत स्त्रियों के सौंदर्य का रहस्य डर है।
उसने देखा मुस्कुराते, गोलमटोल, लाल चेहरों वाले राजनेताओं की भव्यता का रहस्य डर ही है। उसने देखा पूरा बाजार सुंदर माया लोक है और उसका स्वामी डर है। उसे लगता हर बार डर नये-नये चेहरे और वस्त्र बदलकर उसके सामने आ खड़ा होता है। बिम्ब बदलते रहे, वह देखता रहा। टेलीविजन के पर्दे पर कोई ऊल-जुलूल-सा गीत चल रहा है। डरावने मुखौटे लगाए। लड़के-लड़कियां तरह-तरह की व्यायामिक मुद्राओं में अश्लील नफत्य कर रहे हैं।
वे अर्द्ध नंगे हैं और डर को हास्यास्पद बना रहे हैं। वह चैनल बदलता है। समाचार दिखाए जा रहे हैं। रंगीन कपड़े पहने एक अर्द्धनग्न लड़की की लाश पड़ी है। कैमरा उसके बहते रक्त पर फ़ोकस है। सम्भ्रांत हत्यारे युवक का इंटरव्यू चल रहा है। वह मुस्कुरा रहा है। उसके चेहरे पर भय और पश्चाताप का कोई भाव नहीं है। तभी विज्ञापन आया, जो गोरा बनाने वाली किसी क्रीम का था, वह फिर चैनल बदलता है।
डर से दोस्ती और खुशी की आखिरी दस्तक
युद्ध के बीच शांति वार्ता में दो बड़े देशों के राष्ट्राध्यक्ष आमने-सामने बैठे हैं। दोनों के चेहरों पर मुस्कुराहट है। इंसेट में युद्ध के दृश्य हैं। मारे जा रहे सैनिकों और निर्दोष नागरिकों की लाशें हैं तभी ब्रेकिंग न्यूज आती है कि किसी देश में आतंकी वारदात हुई है। एक आतंकी गुट ने इसकी जिम्मेदारी ली है। आतंकियों के आका का मुस्कुराते हुए बयान अता है। इसी बीच महंगी चमचमाती कार का विज्ञापन!! उसने फिर चैनल बदला। सेंसेक्स का ग्ऱाफ बढ़ा..डर मुस्कुराकर आदमी का हाथ दबाने लगा।
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जब वह एकांत में होता तो डर आता और बातें करता, लेकिन पत्नी और बेटी के आते ही हवा में विलुप्त हो जाता। पत्नी ने कई बार पूछा, इस तरह आप किससे बातें करते रहते हो? वह क्या कहता? वह चुप बना रहता। एक रात पत्नी के बहुत पूछने पर उसने सारी बात बताई। पत्नी बोली, आपका वहम है। इस तरह आप कब तक डर के साथ जीओगे। उसका आथ छोड़ दीजिए। हम लोग आपसे दूर होते जा रहे हैं।
आप हम लोगों के बीच घुल-मिल नहीं पाते हैं। वह मान गया। अचानक अगले दिन सुबह आदमी मर गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आया कि आदमी डर से मरा है। उसकी छ साल की बेटी ने बताया, डर तो पापा का दोस्त था। मैंने देखा था, सुबह खुशी आई थी खिड़की पर। कांच की खिड़की के पार से खुशी ने पापा को छुआ था!
हरि मोहन
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