गंगा नदी, जिसमें पानी नहीं सभ्यता प्रवाहित है
नदियां जीवनदायिनी होती हैं। नदियों के किनारे ही दुनिया की सभी सभ्यताएं व संस्कृतियां फली-फूली हैं। धरती में नदियों के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आबादी और नदियों के प्रति आम लोगों की उदासीनता के चलते धरती में जल संकट तो गहराया ही है,अब नदियों के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इसलिए नदियों का संरक्षण जरूरी और अपनी नई पीढ़ियों को इनके प्रति संवेदनशील बनाना जरूरी है। प्रस्तुत है गंगा नदी की गाथा-
देश की सबसे महत्वपूर्ण और पूजनीय नदी गंगा भारत की भौगोलिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवनरेखा है। गंगा नदी की उत्पत्ति हिमालय के गोमुख हिम नदी से होती है, जहां इसे भागीरथी कहा जाता है। अलकनंदा के भागीरथी में आ मिलने से दोनों नदियों का संगम गंगा कहलाने लगता है।
गंगा भारत की सबसे लंबी नदी है। इसकी लंबाई 2525 किलोमीटर है। गंगा के बेसिन में भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 26 प्रतिशत से ज्यादा आता है। गंगा जिन अपनी सहायक नदियों के चलते देश की सबसे महान नदी बनती है, उन सहायक नदियों में यमुना, घाघरा, गंडक, कोसी और सोन नदी प्रमुख हैं। गंगा उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से होकर बहती है तथा अंत में बांग्लादेश में प्रवेश कर पद्मा के रूप में बंगाल की खाड़ी में गिर जाती है।
गंगा घाटी भारत की सबसे उपजाऊ कृषि भूमि है। इस क्षेत्र में गंगा के जल से सिंचाई, जल परिवहन और पेय जल की लगभग समूची व्यवस्था बनती है, जो इसे एक जीवंत भौगोलिक संसाधन के रूप में बदलती है।
गंगा का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म गंगा को केवल जलधारा नहीं मानता बल्कि माता और मोक्षदायिनी का दर्जा देता है। गंगा के जल को अमृत के तुल्य माना जाता है। हर धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान में गंगा का जल इस्तेमाल होता है। यही नहीं, हर हिंदू की यह ख्वाहिश होती है कि वह जब मरे तो उसके मुंह में गंगा जल की कुछ बूंदें डाली जाएं और उसकी चिता की राख को गंगा नदी में प्रवाहित किया जाए।
गंगा नदी के किनारे ही हरिद्वार, ऋषिकेश, वाराणसी, प्रयागराज और गंगा सागर जैसे पवित्र तीर्थस्थल हैं, जो धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भारतीय सभ्यता के आधार हैं। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर ही कुंभ जैसा विशाल मेला लगता है। हिंदू मानते हैं कि जब तक उनकी अस्थियों का विसर्जन गंगा में नहीं होता, उनकी आत्मा को मोक्ष नहीं मिलता। इसलिए कहते हैं, गंगा में पानी नहीं सभ्यता प्रवाह मान है।
गंगा का आर्थिक महत्व

भारत का लगभग 40 फीसदी हिस्सा गंगा के बेसिन क्षेत्र में बसता है और यह क्षेत्र देश के कृषि उद्योग और व्यापार की दृष्टि से सबसे समृद्ध है। गंगा का जल उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल तथा झारखंड के एक बड़े हिस्से में सिंचाई का सबसे बड़ा स्रोत है। गंगा, यमुना के दोआब की भूमि गेहूं, गन्ना और दलहन की खेती के लिए मशहूर है।
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गंगा के किनारे बड़े औद्योगिक नगर कोलकाता, कानपुर, भागलपुर, वाराणसी और पटना आदि हैं, जहां चमड़ा, वस्त्र, खाद्य प्रसंस्करण, बिजली संयंत्र और कागज उद्योग चलते हैं। गंगा धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन का भी गढ़ है जहां से हर साल लाखों को रोजगार मिलता है। हल्दिया से वाराणसी तक जलपरिवहन के प्रोत्साहन के बाद गंगा सस्ते और एक पर्यावरण अनुकूल जल परिवहन का भी आधार बन गई है।
साहित्य, कला, संगीत में गंगा का प्रभाव
गंगा भारतीयता का पर्याय है। गंगा का नाम भारतीय साहित्य,कला, संगीत और लोककथाओं में व्यापक रूप से मिलता है। गंगा का उल्लेख हमारे राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों में मौजूद है। गंगा-जमुनी तहजीब भारतीय सभ्यता के एक नये युग की परिचायक है।
गंगा के समक्ष चुनौतियाँ अपार

दरअसल, गंगा पर दुनिया में सबसे ज्यादा जनसांख्यिकी दबाव है, जितने लोग गंगा नदी पर आश्रित हैं, उतने लोग दुनिया में किसी और नदी पर अपने जीवनयापन और सभी तरह की पहचान के लिए आश्रित नहीं हैं। इसलिए गंगा पर अतिरिक्त जन दबाव,औद्योगिक प्रदूषण, अपशिष्ट जल के साथ साथ धार्मिक कर्मकांडों के प्रदूषण की भी मार है। इन सबसे गंगा को मुक्ति दिलाने के लिए नमामि गंगे मिशन जैसी योजना चलायी जा रही है। अनेक जलशुद्धि सयंत्रों की स्थापना की गई है, सीवेज नेटवर्क का निर्माण किया गया है और जन जागरूकता अभियान जोर-शोर से जारी है ताकि गंगा का प्राचीन गौरव उसे फिर से हासिल हो। यह सूख गई, यह नष्ट हो गई तो भारतीय सभ्यता और भारतीयता की पहचान भी मिट जायेगी। भारत के अस्तित्व के साथ गंगा इस तरह जुड़ी हुई है।
-वीना गौतम
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