आठ दिन कच्ची फिर होगी पक्की गणगौर पूजा
यह पर्व समाज में पारिवारिक सुख, सौभाग्य और सांस्कृतिक परंपराओं को सहेजने का संदेश देता है।
चैत्र मास की प्रतिपदा तिथि से गणगौर की पूजा शुरुआत हो चुकी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना को समर्पित है। इस दौरान विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और दां-पत्य सुख की कामना करती हैं, वहीं कुंवारी कन्याएं योग्य वर की प्राप्ति के लिए माता गौरी की पूजा करती हैं।
धार्मिक महत्व
मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप और व्रत किया था। उनकी इसी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। इसलिए गणगौर का पर्व पति-पत्नी के अटूट प्रेम, सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन का प्रतीक माना जाता है।
कच्ची और पक्की गणगौर की परंपरा
इस पूजा की एक विशेष परंपरा है- कच्ची और पक्की गणगौर। होलिका दहन के अगले दिन से ही महिलाएं कच्ची गणगौर की पूजा करती हैं। इस दौरान मिट्टी या होली की भस्म से बने शिव-पार्वती के स्वरूप की पूजा की जाती है। लगभग आठ दिनों तक कच्ची गणगौर की पूजा करने के बाद पक्की गणगौर की स्थापना की जाती है। पक्की गणगौर में शिव और गौरी की सुंदर सजी हुई प्रतिमाओं की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। महिलाएं पारंपरिक गीत गाकर उत्सव को उल्लासपूर्वक मनाती हैं।
पूजा की परंपराएं
धार्मिक मान्यताओं के विवाहित अनुसार, महिलाएं गणगौर का व्रत रखकर माता गौरी से अपने पति की लंबी आयु, सुख और समृद्धि की कामना करती हैं। वहीं कुंवारी कन्याएं अच्छे और योग्य वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत रखती हैं। इस दौ-रान महिलाएं प्रतिदिन स्नान के बाद गणगौर की पूजा करती हैं, जिसमें माता पार्वती को जल, फूल, कुमकुम, मेहंदी तथा श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करती हैं।
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कई स्थानों पर महिलाएं मिट्टी के पात्रों में गेहूं या जौ बोती हैं, जिन्हें जवारे कहते हैं। इन जवारे को समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है। इस दौरान महिलाएं और युवतियां समूह में गणगौर के पारंपरिक गीत गाती हैं और माता गौरी की आराधना करती हैं। कई स्थानों पर गणगौर की शोभायात्राएं भी निकाली जाती हैं, जिन-में शिव-गौरी की प्रतिमाओं को सजा-धजाकर नगर भ्रमण कराया जाता है। यह पर्व समाज में पारिवारिक सुख, सौभाग्य और सांस्कृतिक परंपराओं को सहेजने का संदेश देता है।
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